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Hindi News ओपिनियन नजरियाआतंकियों के खिलाफ क्या भारत ने बदल ली रणनीति

आतंकियों के खिलाफ क्या भारत ने बदल ली रणनीति

अमेरिकी अखबार द वाशिंगटन पोस्ट  की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि गुरपतवंत सिह पन्नू की हत्या की कथित साजिश एक भारतीय खुफिया अधिकारी ने रची थी। पन्नू वही आतंकी है, जिसे अमेरिका और कनाडा ने...

आतंकियों के खिलाफ क्या भारत ने बदल ली रणनीति
Pankaj Tomarप्रशांत झा, हिन्दुस्तान टाइम्स संवाददाता, अमेरिकाWed, 01 May 2024 09:13 PM
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अमेरिकी अखबार द वाशिंगटन पोस्ट  की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि गुरपतवंत सिह पन्नू की हत्या की कथित साजिश एक भारतीय खुफिया अधिकारी ने रची थी। पन्नू वही आतंकी है, जिसे अमेरिका और कनाडा ने अपनी नागरिकता दे रखी है। यह रिपोर्ट पश्चिम के नजरिये से इस मामले के कई अन्य पहलुओं पर भी रोशनी डालती है। मसलन, उनका आकलन है कि भारत सरकार ने यह माना कि इन चरमपंथियों ने भारत की सुरक्षा के सामने सीधा खतरा पैदा किया है। अपनी राजनीतिक प्रवृत्ति या खालिस्तानी गतिविधियों में वृद्धि के कारण; या 2020-21 के किसान आंदोलन के बाद सुरक्षा के मद्देनजर बचाव के लिए उसने कदम उठाने का फैसला किया। शायद सरकार विरोधी-प्रदर्शन के बाद विदेशी सरजमीं पर रहने वाले खालिस्तानियों ने घरेलू राजनीतिक घटनाओं को आकार देने की क्षमता हासिल कर ली थी या पश्चिमी एजेंसियों की उदासीनता से निराश होकर या इस पूर्व धारणा के तहत कदम उठाया कि पश्चिमी एजेंसियां कोई कार्रवाई नहीं करेंगी। एक अनुमान है कि भारत के खुफिया विभाग के एक गुट ने अन्य कूटनीतिक विकल्पों पर गौर किए बिना अलगाववादी खतरे का जवाब देने का फैसला किया। 
हालांकि, इन आरोपों में अतिरेक है। अमेरिका-भारत की बहुमूल्य रणनीतिक साझेदारी की कीमत पर एक खालिस्तानी आतंकी को मारने की साजिश को कोई उचित नहीं ठहरा सकता। सेवारत और सेवानिवृत्त खुफिया अधिकारियों ने निजी बातचीत में बताया है कि योजना व क्रियान्वयन, दोनों स्तरों पर यह ऑपरेशन उनके गले नहीं उतर रहा है। 
हां, यह सही है कि पश्चिम के अनेक देश ऐसा ही आक्रामक कदम अपने कथित दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए उठाते रहे हैं, पर ऐसे मामलों में दुराव-छिपाव अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की एक बुनियादी विशेषता रहा है। यदि आपके पास ताकत है, तो नियमों के पालन के मद्देनजर आपकी कथनी और करनी अलग हो सकती है। हालांकि, बहुत से लोग यह मानते हैं कि विश्व स्तर पर भारत अभी इतना मजबूत नहीं बन सका है कि वह विदेश में ऐसा कुछ कर सके। इसी आधार पर कुछ विशेषज्ञ भारत की कथित कार्रवाई का आकलन करते हैं। इस प्रकरण के तीन पहलू उल्लेखनीय हैं।
पहला, न तो वाशिंगटन और न नई दिल्ली ने इस मुद्दे के बहाने द्विपक्षीय संबंधों को बेपटरी करने की कोशिश की है। यह भारत-अमेरिकी रिश्ते की ताकत, शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के आपसी विश्वास, खुलेपन के साथ वार्ता और दोनों सरकारों की चीन के रूप में मौजूदा वक्त की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती पर एकमत रहने की मंशा का उल्लेखनीय प्रमाण है। इस घटनाक्रम की खास बात यह नहीं है कि अमेरिका नाराज है, उसने इसे बाकी मसलों से अलग रखने का फैसला किया। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और उनकी टीम ने भारत की कूटनीतिक योजनाओं पर अभी भी पूरा भरोसा बनाए रखा है।
दूसरा, इससे यह भी आशंका होती है कि शायद अमेरिका इससे वाकिफ है कि भारत में इस ऑपरेशन के बारे में कौन-कौन जानता था। बहरहाल, चंद अमेरिकी अधिकारियों की मानें, तो यह योजना जून में उस वक्त बनाई गई थी, जब भारतीय सुरक्षा सलाहकार अपने अमेरिकी समकक्ष जेक सुलिवन के साथ द्विपक्षीय कूटनीतिक रिश्तों को मजबूत बनाने में जुटे थे। जाहिर है, अमेरिका और भारत के बीच आपसी भरोसा बना हुआ है। खास यह भी कि अमेरिका ने भारत में बनी एक जांच समिति को भी मान लिया है। 
तीसरा, इस मामले में फिलहाल कानूनी जवाबदेही तय करने की अमेरिका की मांग घरेलू कार्रवाई करने संबंधी भारत की स्वेच्छा से टकरा रही है, पर बात शायद इससे आगे नहीं बढ़ेगी। मौटे तौर पर, पश्चिम के सार्वजनिक विमर्शों में भारत की प्रतिष्ठा बनी रहेगी, लेकिन जो महत्वपूर्ण बात है, वह यह है कि भारत आगे के लिए कोई बदलाव करता है या नहीं? खासकर ऐसे समय में, जब नई दिल्ली पर दुनिया भर की नजर है। यह देखना प्रासंगिक होगा कि भारत खुफिया सुधारों की तरफ कितना बढ़ता है?  सीमा पार के खतरों से निपटने में कितनी अधिक समझदारी का परिचय देता है?