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19 सितम्बर, 2020|11:29|IST

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कोरोना के साये में बिगड़ी श्वेत क्रांति की सेहत

भारत में हर दिन करीब 50 करोड़ लीटर दूध का उत्पादन होता है, इसमें से 20 करोड़ लीटर दूध किसान अपने इस्तेमाल के लिए खुद के पास रखता है, जबकि 10 करोड़ लीटर दूध विभिन्न सहकारी समितियों के माध्यम से बेचता है। शेष 20 करोड़ लीटर दूध को किसान सीधे   गली-मुहल्ले की चाय की दुकानों, होटलों, मिठाई बनाने वालों को बेचता है। इससे उसके रोजमर्रा के घरेलू खर्च निकलते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि कोरोना महामारी के कारण ग्राहकों तक दूध की पहुंच प्रभावित हुई है। बाजार पूरी तरह बंद हैं। जाहिर है, जिस 20 करोड़ लीटर दूध पर किसानों की दैनिक आय टिकी थी, उसका बाजार अब साफ हो चुका है। मोटा अनुमान है कि बीते एक महीने में दुग्ध उत्पादक किसानों को करीब 60 अरब रुपये का घाटा लग चुका है। 
भारत में दुग्ध उत्पादन दुनिया का लगभग 20 फीसदी है। इस दूध का कोई 30 प्रतिशत हिस्सा हर दिन मिठाई, दही आदि में इस्तेमाल होता है। कुछ दूध का पाउडर बनता है। लगभग सात लाख करोड़ रुपये के सालाना व्यवसाय वाले दूध पर कोरोना की काली छाया ऐसी पड़ी है कि इससे देश में पौष्टिक आहार की उपलब्धता प्रभावित हुई है। आवारा मवेशियों की समस्या बढ़ी है। दूध के कारोबार में लगे करीब दस करोड़ लोगों के सामने जीविका और भोजन का संकट पैदा हो गया है। देश में दूध देने वाले करीब 12.53 करोड़ गाय-भैंस हैं और बगैर कमाई के इन मवेशियों का पेट भरना छोटे किसानों के लिए बेहद कठिन होता जा रहा है। 
उत्तर प्रदेश देश में सबसे ज्यादा किसानों और दूध देने वाले पशुओं का पालक राज्य है। फरवरी महीने तक यहां एक नंबर का दूध 40 से 50 रुपये प्रति लीटर था, जो आज 15 से 20 रुपये लीटर बड़ी मुश्किल से बिक रहा है। लॉकडाउन और उसी दौरान असमय बरसात के चलते फसल कटाई में देरी हो रही है, सो नया भूसा भी नहीं आ पा रहा। ऐसे में, मवेशियों को भरपेट चारा नहीं मिल पा रहा है। सनद रहे कि उत्तर प्रदेश पहले से ही आवारा पशुओं की समस्या से परेशान है और कोरोना की आपदा ने इस समस्या को दोगुना कर दिया है। 
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छोटे-छोटे गांवों में खोया बनाने की भट्ठियां लगी हैं, जो हर दिन कई हजार लीटर दूध लेती हैं। शामली-बागपत से चार बजे सुबह कई ट्रक-टेंपों चलते थे, जिनमें केवल खोये की टोकरियां लदी होती थीं। ऐसे सभी गांवों में इस समय सन्नाटा और भुखमरी की चहलकदमी है। उधर, पंजाब और हरिद्वार के पास दूध बहा देने की भी खबरें हैं। झारखंड में सामान्य दिनों में दूध की खरीदी एक लाख पैंतीस हजार लीटर होती है, जो आज घटकर 70 से 72 हजार लीटर रह गई है। लॉकडाउन होने से पशु आहार, कुट्टी, चोकर, दाना के न केवल दाम बढे़ हैं, इनका मिलना भी मुश्किल हो गया है। सबसे ज्यादा परेशानी तो तब हो रही है, जब मवेशी बीमार पड़ रहे हैं।
हालांकि कुछ राज्यों ने डेयरी उद्योग के लिए कई सकारात्मक कदम भी उठाए हैं, जैसे कर्नाटक सरकार ने अन-बिके दूध को शहरी गरीबों में नि:शुल्क बांटने के लिए 200 करोड़ की योजना लागू की है। महाराष्ट्र में सहकारी समितियों को प्रति दिन दस लाख लीटर दूध को पाउडर में बदलने की परियोजना के लिए 180 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। बिहार में आंगनबाड़ी के जरिए दूध पाउडर बांटा जा रहा है। उत्तराखंड सरकार ने भी बीस हजार आंगनबाड़ी के जरिए ढाई लाख बच्चों को दिन में दो बार दूध बंटवाने का काम शुरू किया है। 
भारत में कुपोषित बच्चों की संख्या करोड़ों में है, यहां दूध का फेंका जाना बहुत चिंताजनक है। सरकार को इन दुग्ध उत्पादकों की सुध लेनी चाहिए। पंचायत स्तर पर दूध खरीदकर कुपोषित बच्चों, आंगनबाड़ी, मिड-डे मील में इस्तेमाल करना एक अच्छा तरीका हो सकता है। ग्रामीण स्तर पर शुद्ध घी बनाना भी फायदेमंद होगा। घी की हर समय मांग रहती है, इसे बनाने के लिए किसी मशीन की जरूरत भी नहीं होती और घी को लंबे समय तक घर में भी सुरक्षित रखा जा सकता है। किसी भी प्रकार के नुकसान से बचने की कोशिश करने के साथ ही आज यह मानवीयता साबित करने का समय है। हमारे जीवन संघर्ष को आसान बनाने वाले श्वेत क्रांति के हमारे भागीदार पालतू मवेशी हमारी ओर उम्मीद से देख रहे हैं।
      (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan nazariya column 2 may 2020