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परमाणु से बिजली बनाना कहीं ज्यादा कारगर

संदीपन देब, वरिष्ठ पत्रकारNaman Dixit
Mon, 18 Oct 2021 11:25 PM
परमाणु से बिजली बनाना कहीं ज्यादा कारगर

बीते एक महीने से, पूरी दुनिया बिजली और ऊर्जा संकट से जूझ रही है। हालांकि मुल्क-दर-मुल्क इसके कारण अलग-अलग हैं, लेकिन कमोबेश गुहार यही है कि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम की जाए और मुख्यत: सौर व पवन जैसी अक्षय ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाया जाए। हर समझदार इंसान निस्संदेह जीवाश्म ईंधन से बचने की ही सलाह देगा, पर हरित ऊर्जा के मौजूदा स्वरूप की गंभीर पड़ताल भी आवश्यक है। मसलन, सौर व पवन ऊर्जा के चरित्र में एकरूपता नहीं है। चूंकि सबसे आदर्श स्थिति में भी सौर व पवन ऊर्जा चौबीसों घंटे बिजली पैदा नहीं कर सकतीं, इसलिए बैक-अप के लिए जीवाश्म ईंधन की दरकार रहेगी ही। यह तस्वीर तब तक नहीं बदलेगी, जब तक हम व्यापक पैमाने पर काम करने वाली कम लागत की ऐसी तकनीक विकसित नहीं कर लेते, जो इनके द्वारा उत्पादित बिजली को जमा कर सके।

ब्रिटेन का उदाहरण हमारे सामने है। वहां के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन कहते हैं कि वह अपने देश को ‘पवन ऊर्जा में सऊदी अरब’ बनाना चाहते हैं। आज ब्रिटेन 24 फीसदी बिजली हवा से पैदा करता है। मगर इस साल उसने ‘हवाहीन गरमी’ देखी, जो ब्रिटेन के बिजली संकट के कारणों में से एक है। आज जर्मनी की 30 फीसदी जरूरत सौर व पवन ऊर्जा से पूरी होती है, लेकिन पिछले महीने जब कोयला और प्राकृतिक गैस की कमी से उसका वास्ता पड़ा, तो उसे एहसास हुआ कि अक्षय ऊर्जा पर आधा ट्रिलियन डॉलर के निवेश के बाद भी मौसम-आधारित स्वच्छ ऊर्जा की भंडारण क्षमता इतनी नहीं हो सकी है कि जीवाश्म-ईंधन से मुक्त कुछ घंटे वह मुहैया करा सके। पूरे यूरोपीय संघ में जर्मनी में ही घरेलू खपत के लिए बिजली सबसे महंगी (0.37 डॉलर प्रति किलोवाट) है। फ्रांस में इसकी कीमत 0.19 डॉलर प्रति किलोवाट है। साल 2019 में जर्मनी प्रति किलोवाट बिजली उत्पादन के लिए 350 ग्राम कार्बन डाई-ऑक्साइड उत्सर्जित करता था, जबकि फ्रांस छह गुना कम 56 ग्राम। फ्रांस में बिजली आखिर सस्ती व स्वच्छ क्यों है? इसका जवाब है, परमाणु ऊर्जा। फ्रांस ने 2020 में कुल उत्पादन में 78 फीसदी बिजली परमाणु से और 19 फीसदी अक्षय माध्यमों से पैदा की। जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी तीन प्रतिशत थी। मगर परेशानी यह है कि हर बार जब ‘परमाणु’ शब्द का उच्चारण किया जाता है, तो तर्कपूर्ण तथ्य-आधारित रवैया दिखाने के बजाय नकारात्मक रुख अपनाया जाता है। जबकि, परमाणु ऊर्जा मौजूदा समय में सबसे सस्ता, हरित और सुरक्षित ऊर्जा-स्रोत हो सकता है।
फ्रांस और स्वीडन व बुल्गारिया जैसे अन्य देश, जहां परमाणु ऊर्जा से कहीं अधिक बिजली पैदा की जाती है, इसके सस्ते होने की पुष्टि करते हैं। रही बात हरित की, तो परमाणु ऊर्जा में कार्बन-उत्सर्जन नहीं होता। अमेरिका के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1,000 मेगावाट पवन ऊर्जा फॉर्म के लिए समान क्षमता वाली परमाणु सुविधा वाले फॉर्म की तुलना में 360 गुना अधिक भूमि की जरूरत होती है, और सौर संयंत्रों के लिए 75 गुना अधिक। अमेरिका में पवन टर्बाइनों से टकराकर हर साल पांच लाख पक्षियों की मौत भी हो रही है। फिर, हम परमाणु ऊर्जा के विकिरण जोखिमों से भी अवगत हैं और परमाणु कचरे के निपटान के सुरक्षित तरीके हमारे पास हैं। लिहाजा, तमाम निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों के बीच हमें सही का चुनाव करना होगा।
इस मामले में सबसे साहसिक फैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लिया था। उन्होंने अमेरिका के साथ परमाणु समझौते किया। लेकिन राजनीतिक किंतु-परंतु के कारण ऐसा लगता है कि अब तक बहुत कुछ नहीं हुआ है। भारत आज भी महज तीन प्रतिशत बिजली परमाणु से पैदा करता है। पिछले महीने सरकार ने घोषणा की कि भारत अगले 10 वर्षों में परमाणु ऊर्जा क्षमता को तिगुना कर लेगा। पर भारत जितने यूरेनियम का इस्तेमाल करता है, उसका ज्यादातर हिस्सा आयात करता है। यह महंगा तो है ही, भू-राजनीतिक रूप से मुश्किल प्रक्रिया है। हमारे पास पर्याप्त थोरियम है। लिहाजा, हमें ऐसी परियोजनाओं में निवेश करना चाहिए, जो थोरियम को यूरेनियम में बदल दें, ताकि बिजली पैदा हो। दिक्कत यह है कि परमाणु ऊर्जा को लेकर वैश्विक व घरेलू, दोनों सियासत अमूमन अतार्किक रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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