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सियासी दलों को बेदाग बनाने की नई राह खोजिए

पारदर्शितापूर्ण चुनाव की खातिर अब देश के राजनीतिक दलों के लिए भी चुनाव में खर्च की एक सीमा तय होनी चाहिए। अभी तक यह व्यवस्था सिर्फ उम्मीदवारों के लिए हीचुनावी बॉन्ड को निरस्त करने संबंधी सुप्रीम...

सियासी दलों को बेदाग बनाने की नई राह खोजिए
Monika Minalओम प्रकाश रावत, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त Fri, 16 Feb 2024 10:16 PM
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चुनावी बॉन्ड को निरस्त करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट का फैसला चुनाव सुधार का शुरुआती बिंदु बन सकता है। मुमकिन है, अब देश में राजनीतिक चंदे की कहीं अधिक पारदर्शी व्यवस्था शुरू हो सकेगी, जिसमें मतदाता यह जान सकेगा कि किस पार्टी को किससे पैसे मिल रहे हैं, ताकि उसे अपने फैसले लेने में ज्यादा आसानी होगी। इससे चुनाव-प्रक्रिया भी कहीं अधिक बेदाग हो सकेगी।
दरअसल, जिस नेकनीयती के साथ चुनावी बॉन्ड की शुरुआत की गई थी, उस पर जल्द ही आशंकाएं मंडराने लगीं। इसकी वजह भी थी। राजनीतिक दलों को दो हजार रुपये से कम की राशि बिना नाम बताए चंदे में दी जा सकती है, लेकिन इससे बड़ी रकम देने पर पार्टी को दानकर्ता का नाम जाहिर करना होता है। ‘एडीआर’ जैसी संस्था इसका विश्लेषण करके मतदाताओं को यह बताती रही है कि किसी पार्टी को किसने चंदा दिया है। चुनावी बॉन्ड ने मानो इस व्यवस्था को खत्म कर दिया था। इसमें भले ही बॉन्ड खरीदने वाले की बैंक केवाईसी (ग्राहक को जानें) करते थे, लेकिन यह सार्वजनिक नहीं किया जाता था कि किस व्यक्ति अथवा कंपनी ने किस दल के लिए बॉन्ड खरीदा है। चुनाव आयोग ने इसी अपारदर्शिता को लेकर आपत्ति जताई थी। फिर, आयकर, कंपनी और लोक-प्रतिनिधित्व से जुड़े कानूनों में किए गए बदलाव से घाटे की या शेल कंपनियां (छद्म कंपनी) भी चुनावी बॉन्ड खरीदने की अधिकारी हो गई थीं। इसी के बाद इन कंपनियों के बहाने काला धन को सफेद करने का डर सताने लगा था।
चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था किसी देश में नहीं है। भारत ने ही इसकी शुरुआत की थी, जिसका मुख्यत: दो मकसद था- पहला, चंदे के रूप में राजनीतिक दलों को मिलने वाला काला धन रुके, और दूसरा, नाम सार्वजनिक न होने के कारण उद्योगपतियों के लिए पसंदीदा राजनीतिक दल को चंदा देना आसान हो और उनको विरोधी पार्टी से अहित का खौफ न रहे। दूसरा मकसद भले ही चुनावी बॉन्ड से पूरा हो रहा था, लेकिन काले धन की आमद रोकने की मजबूत व्यवस्था नहीं बन पा रही थी।
राजनीतिक चंदे का एक विकल्प राज्य-पोषित चुनाव को बताया जाता है। इसकी शुरुआत अमेरिका में हुई है। वहां चूंकि राज्य अपना कानून खुद बनाते और लागू करते हैं, इसलिए कुछ राज्यों ने ‘स्टेट फंडिंग’ को शुरू किया, ताकि प्रत्याशी सिर्फ राज्य के खर्चे पर चुनाव लड़ सके। इसके शुरुआती नतीजे काफी अच्छे आए। जिन-जिन राज्यों ने इसकी शुरुआत की, वहां करीब 80 फीसदी ऐसे उम्मीदवारों को जीत मिली, जिन्होंने चुनाव लड़ने के लिए राज्य से पैसे लिए थे। मगर 2010 में वहां की शीर्ष अदालत ने इसे ‘उम्मीदवारों की अभिव्यक्ति में राज्य का दखल’ माना। हालांकि, अपने देश में कुछ हद तक ऐसी ही व्यवस्था है, क्योंकि चुनाव आयोग मुफ्त में मतदाता सूची मुहैया कराता है और आकाशवाणी व दूरदर्शन पर दलों को अपने प्रचार का जरूरी वक्त नि:शुल्क मुहैया कराता है, फिर भी, हम अचानक राज्य-पोषित चुनाव की तरफ नहीं बढ़ सकते, क्योंकि फिलहाल यह अव्यावहारिक है।
हां, चुनाव सुधार को लेकर कुछ अन्य प्रयास जरूर कर सकते हैं। मसलन, अब राजनीतिक दलों के लिए भी चुनाव में खर्च की सीमा तय होनी चाहिए। अभी यह व्यवस्था सिर्फ उम्मीदवारों के लिए है। वह विधानसभा चुनाव में अधिकतम 40 लाख रुपये और लोकसभा चुनाव में 95 लाख रुपये खर्च कर सकता है। मगर सियासी दलों के लिए ऐसा कोई प्रावधान न होने के कारण हम किसी भी क्षेत्र में चुनाव के दौरान 40-50 करोड़ रुपये खर्च होते देखते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी कहा था कि यह विडंबना है कि अपने देश में कोई भी सांसद या विधायक अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत झूठ से करता है, क्योंकि चुनाव आयोग के पास चुनाव-खर्च का जो ब्योरा पेश किया जाता है, वह झूठ का पुलिंदा होता है। इस कटु सत्य का अब हमें सामना करना ही चाहिए। इसी तरह, चुनाव अभियान की जो व्यवस्था चुनाव आयोग ने तय कर रखी है, उसका भी ईमानदारी से पालन होना चाहिए। मतदाताओं को कई बार लगता है कि आचार संहिता का उचित पालन नहीं हो रहा और आयोग की छवि नख-दंत विहीन संस्था की बनती जा रही है। इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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