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भूटान और अन्य पड़ोसियों को अपने साथ रखिए

मोहन भंडारी, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड)Naman Dixit
Fri, 15 Oct 2021 11:29 PM
भूटान और अन्य पड़ोसियों को अपने साथ रखिए

भूटान एक स्वतंत्र राष्ट्र है, वह अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। भूटान ने चीन के साथ अपने सीमा विवाद सुलझाने केलिए समझौता किया है। ये विवाद पुराने हैं और इस पर भारत में भी चिंता शुरू हो गई है। चीन ने जब तिब्बत को 1950-51 में हथियाया था, तभी यह चिंता शुरू हो गई थी कि चीन कहीं भूटान के रास्ते भारत की चुंबी वैली तक न आ जाए। तब हमारी सोच दूरदर्शी नहीं थी। हमें यही बताया गया था कि चीन हमारा मित्र है और हमारे खिलाफ कुछ भी नहीं करेगा। तिब्बत के लोग भी गुहार लगाते रहे भारत से कि हमारी मदद कीजिए।

अफसोस, जितने भी हमारे सीमावर्ती राज्य हैं, चीन की ओर से कुछ न कुछ समस्या रही है। हो सकता है भूटान आने वाले दिनों में चीन से गुप्त मंत्रणा करे। उसे अपना राष्ट्रीय हित देखना ही है, लेकिन वह कहीं दबाव में चीन से अंधाधुंध ऋण न ले, उसका हाल पाकिस्तान या श्रीलंका की तरह न हो। आज सवाल कई हैं। क्या भूटान और चीन के बीच भूमि का लेन-देन भी होगा? क्या चीन की पहुंच चुंबी वैली के करीब तक हो जाएगी? चीन की ओर से हमारे लिए यह कमजोर बिन्दु है। जो भी हमारे आवागमन के साधन हैं, सब इस 25 किलोमीटर चौड़े गलियारे से जाते हैं। इस गलियारे से ठीक ऊपर चुंबी वैली है और उसके ऊपर तिब्बत अर्थात चीन है। यहां चीन का विस्तार हमारे लिए सामरिक चिंता का विषय है। तथ्य यह है कि विगत वर्षों से भूटान भी चीन के साथ बातचीत करता रहा है। भूटान ऐसा कर सकता है, लेकिन भूटान को भारत की चिंताओं का भी ध्यान रखना चाहिए। भूटान कभी गरीब था, उसे भारत आर्थिक मदद देता रहा है। अत: भूटान को भी सचेत रखना होगा।
वैसे इस क्षेत्र को लेकर हमारी चिंता पुरानी है। नवंबर 1962 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी को एक चिट्ठी लिखी थी, उसमें उन्होंने इस क्षेत्र का जिक्र करते हुए लिखा था, चीन की फौज भूटान और सिक्किम सीमा पर लगी हुई है, जो चुंबी वैली के जरिए आकर भारत के पूर्वी क्षेत्र को काटने को तैयार है, तो हमारी मदद कीजिए। दुर्भाग्य से हमारी कूटनीति परिपक्व नहीं रही, जिसका खामियाजा हम भुगतते हैं।
आज अमेरिका कमजोर लगता है, अत: अपने स्तर पर ही भारत को सचेत रहना चाहिए कि भूटान कहीं कोई ऐसा समझौता न कर ले, जिससे भारत की मुसीबत बढ़ जाए। अपने अनुरूप समझौते के लिए चीन दबाव बनाने में जुटा हुआ है और भूटान भी यह जानता है कि वह चीन के साथ बैर नहीं ले सकता। 
मुझे लगता है, भारत को इस मोर्चे पर सजग व आक्रामक कूटनीति करनी चाहिए। अपने हित के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए। भूटान सहित आस-पास के सहयोगी देशों के लिए हमारे पास धन की कोई कमी नहीं होनी चाहिए। हमें ध्यान रखना चाहिए कि चीन ने 1950 के दशक में ही कह दिया था कि तिब्बत उसकी हथेली है और इसकी पांच उंगलियां हैं, लद्दाख, सिक्किम, भूटान, नेपाल और अरुणाचल प्रदेश। उसने कहा था कि जब हथेली साथ है, तो पांच उंगलियां भी साथ जुड़ जाएंगी। चीनी मीडिया में यह चर्चा होती रही है कि ताइवान को वर्ष 2025-30 के बीच लेना है और अरुणाचल प्रदेश को 2035 से 2040 के बीच लेना है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स  ने इस पर खुलकर छापना शुरू कर दिया है। 
आज चीन पूरी दुनिया को अपने हिसाब से चलाना चाहता है। भूमि से समुद्र तक हर जगह वह विस्तार की कोशिश कर रहा है। हमें हर तरह से सावधान रहना चाहिए। आज चीन की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। 1962 में जो लड़ाई हुई थी, उसका एक कारण यह भी था चीनियों के दिमाग को भटकाना था। चीन की नीतियों के कारण वर्ष 1959-1961 के बीच भयंकर अकाल की वजह से चार करोड़ से अधिक चीनी मारे गए थे और चीनियों का ध्यान भटकाने के लिए चीनी सेना ने भारत पर हमला किया था। आज फिर चीन की आंतरिक स्थिति बहुत खराब है। शी जिनपिंग गद्दी छोड़कर कहीं बाहर नहीं जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें तख्ता-पलट का भय है। आशंका है, चीन कुछ न कुछ जरूर करेगा। भले युद्ध न हो। लेकिन आज जरूरी है कि संजीदगी के साथ भूटान की पूरी मदद की जाए और अपने साथ रखा जाए। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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