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पाकिस्तान में पाबंदियों की दिखावटी सियासत

अशोक बेहुरिया, सीनियर फेलो, मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस ऐंड एनालिसिसPublished By: Manish Mishra
Thu, 15 Apr 2021 10:42 PM
पाकिस्तान में पाबंदियों की दिखावटी सियासत

इमरान खान की सरकार ने आखिरकार तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है, जिसे तहरीक लब्बैक या रसूल अल्लाह के नाम से भी जाना जाता है। इस पार्टी ने रमजान के उपवास की शुरुआत की पूर्व संध्या पर 12 अप्रैल से देशव्यापी विरोध शुरू किया था। आंतरिक मंत्री (गृह) शेख राशिद के अनुसार, 14 अप्रैल की शाम तक 48 घंटे के भीतर हिंसा में तीन पुलिसकर्मियों की मौत हो गई थी और लगभग 340 घायल हुए थे। ऐसी हिंसा ने सरकार को संगठन पर प्रतिबंध लगाने पर विचार के लिए मजबूर कर दिया। प्रतिबंध के खतरे से अप्रभावित प्रदर्शनकारी उपद्रव में लगे हुए थे, जबकि सरकारी सूत्रों का कहना था कि टीएलपी पर प्रतिबंध लगाने वाला सरकारी परिपत्र अगले 24 घंटों के भीतर आएगा। सरकार ने अब इस पर प्रतिबंध लगाने का फैसला क्यों किया है? इसे पिछले चार वर्षों से सरकार को निर्देशित करने की अनुमति क्यों थी? क्या पाकिस्तान में यह मिलता-जुलता ढर्रा नहीं है? इस तरह के संगठन शुरू किए जाते हैं और एक दिन आता है, जब लगता है, पानी सिर के ऊपर से जा रहा है, तब संगठन दुष्ट करार दिया जाता है। क्या यह अकेला ऐसा शैतान है, जिसे राज्य ने खड़ा होने दिया है?  
पृष्ठभूमि देखें, तो टीएलपी एक कट्टर बरेलवी संगठन के रूप में सामने आया था, जिसकी स्थापना 2015 में खादिम हुसैन रिजवी द्वारा की गई थी, जो धर्म रक्षा के नाम पर उग्र भाषणों के लिए जाना जाता है। चुनाव कानूनों में कथित बदलाव के खिलाफ इस्लामाबाद के बाहरी इलाके में नवंबर 2017 में आयोजित विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर टीएलपी प्रकाश में आई थी। यह अफवाह थी कि चुनाव लड़ने से पहले पैगंबर के नाम पर ली जाने वाली शपथ में बदलाव किया जा रहा है। इस पार्टी का धरना 20 दिन तक जारी रहा। जिसे तुड़वाने के लिए सेना और खुफिया विभाग को आगे आना पड़ा। जो समझौता हुआ, उसके तहत कानून मंत्री जैद हामिद को इस्तीफा देना पड़ा और सरकार ने पहले की शपथ को ही बरकरार रखने का वादा किया। इससे पहले भी ईशनिंदा अधिनियम का बचाव करते हुए इस पार्टी ने फरवरी 2016 में मुमताज कादरी की फांसी के खिलाफ प्रदर्शन किए थे। मुमताज कादरी ने 2011 में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या की थी। सबसे हालिया मामले में टीएलपी ने विदेशी सरकारों के नेताओं द्वारा की जा रही निंदा का मुद्दा उठाया है और विशेष रूप से फ्रांस को निशाने पर ले रखा है। टीएलपी ने फ्रांसीसी राजदूत के निष्कासन के लिए नवंबर 2020 में अपने आंदोलन की शुरुआत की थी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन की टिप्पणी के बाद फ्रांसीसी उत्पादों पर प्रतिबंध की मांग की थी। उसी महीने मृत्यु से कुछ पहले खादिम हुसैन ने एक समझौते के जरिए आश्वासन दिया था कि सरकार तीन महीने के भीतर उचित कार्रवाई करेगी, अच्छी तरह से यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान के लिए ऐसा करना कभी संभव नहीं होगा। फरवरी 2021 में टीएलपी ने सड़कों पर उतर आरोप लगाया कि सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान नहीं किया। सरकार ने 20 अप्रैल तक यह काम करने का आश्वासन देकर टीएलपी से एक और समझौता किया। खादिम हुसैन के बेटे साद हुसैन, जो अब आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, शायद अपने पिता के नक्शे कदम पर ही चलना चाहते हैं। टीएलपी समर्थकों ने आंदोलन तेज कर दिया है। जब आंदोलन हिंसक हो गया, तब सरकार को इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने का बहाना मिल गया। क्या इस प्रतिबंध के साथ टीएलपी का अंत हो जाएगा? शायद नहीं। क्या पाकिस्तानी सेना टीएलपी-अनुभव से सीख लेगी और सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए धर्म का इस्तेमाल करना बंद कर देगी? ऐसी उम्मीद नहीं है। पाक सेना अपने साये तले ऐसे संगठनों को पोसती है, उसका रिकॉर्ड रहा है। सेना ऐसा इसलिए करती है, ताकि पाकिस्तानी राजनीति और समाज पर सेना की पकड़ का अंदाजा रहे। सेना ने समय-समय पर भारत के खिलाफ भी मोहरे के रूप में भी ऐसे संगठनों का इस्तेमाल किया है। हो सकता है, अपने हाथ जलते देख सेना ने इस संगठन से पीछा छुड़ा लिया हो, लेकिन जिस तरह से सेना पाकिस्तान में बरेलवी उग्रवाद को बढ़ावा देती रही है, उससे टीएलपी की वापसी की आशंका है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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