DA Image
Sunday, December 5, 2021
हमें फॉलो करें :

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

हिंदी न्यूज़ ओपिनियन नजरियाऊर्जा और कोयले पर मंडराते संकट का पूरा सच

ऊर्जा और कोयले पर मंडराते संकट का पूरा सच

राहुल टोंगिया, सीनियर फेलो, सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकोनॉमिक प्रोग्रेसNaman Dixit
Thu, 14 Oct 2021 11:30 PM
ऊर्जा और कोयले पर मंडराते संकट का पूरा सच

अभूतपूर्व। अप्रत्याशित। तेज मांग, वैश्विक कीमतों में वृद्धि और मानसून की लंबी अवधि के इकट्ठे हमलावर होने से बना ‘एक गंभीर संकट’। ये सभी इस बात के सामान्य विवरण हैं कि कैसे भारत में बिजली संयंत्रों के पास महज चार दिनों का कोयला बचा था। निस्संदेह, ये सभी सुविधाजनक व्याख्याएं हैं, लेकिन आधी-अधूरी हैं। इन सबसे कहीं बड़ी वजह थी, योजना, समन्वय और जोखिम भरे कदमों में एकमत का अभाव। हालांकि, यह समस्या भी रातोंरात या एकाध मास में पैदा नहीं हुई है।

आखिर हुआ क्या? कोयले की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ गईं? मगर, भारत के बिजली संयंत्र इतना कोयला आयात ही नहीं करते; जिनमें कोयले का संकट है, उनमें से ज्यादातर तो बिल्कुल नहीं करते। तो, क्या बिजली की मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई? यह भी गलत तर्क है कि पिछले साल से इस वर्ष 15 से 20 फीसदी मांग बढ़ गई है, क्योंकि अगस्त में अप्रैल की तुलना में कोयला से बिजली-उत्पादन 10 फीसदी कम हुआ था। लिहाजा, सामान्य गुणा-भाग यही दिखेगा कि बिजली संयंत्रों ने प्राप्त कोयले की तुलना में कहीं अधिक खपत की है। तो क्या समस्या आपूर्ति की थी? नहीं, असली मुद्दा भंडार की कमी था। आपूर्ति की मात्रा तो वर्ष के दौरान बदलती ही रहती है और बिजली संयंत्रों को अपना भंडार बनाकर रखना पड़ता है। कोल इंडिया लिमिटेड हर तिमाही में एक समान आपूर्ति नहीं करती। बरसात के मौसम (यानी, तीसरी तिमाही) में करार की गई वार्षिक मात्रा का महज 22 फीसदी संयंत्रों को मिल पाता है। इससे पहले और बाद की तिमाही में 25-25 फीसदी मिलता है, लेकिन जनवरी-मार्च तिमाही में आगामी गरमी में मांग बढ़ने की संभावना के मद्देनजर उनको 28 फीसदी दिया जाता है। कई कारणों से कोयले की यह मात्रा मंगवाने में बिजली संयंत्र विफल रहे।
कोविड-19 (वित्त वर्ष 2021) के दौरान मांग कम रहने के कारण कोयला आधारित बिजली उत्पादन कम हुआ। मीडिया खबरों की मानें, तो इससे कोयले का ‘रिकॉर्ड भंडारण’ हो गया। अप्रैल तक तो ऐसी चिंताएं जताई जाने लगीं कि कोयला ब्लॉक की नीलामी और निजी क्षेत्र के कोयला खनन की जरूरतों की योजनाओं पर इससे पानी फिर जाएगा। मगर ऐसी रिपोर्टों में यह नहीं बताया गया कि कुल भंडार बेशक बहुत अधिक हो सकता है, मगर इनमें से अधिकांश खनिक, यानी कोल इंडिया लिमिटेड के पास था। बिजली संयंत्रों का भंडार तो वित्त वर्ष 2021 में आधा घटकर करीब 30 मिट्रिक टन हो गया था। दरअसल, कई कारणों से संयंत्र पर्याप्त कोयले की खरीदारी नहीं कर रहे थे। वे नकदी की तंगी से जूझ रहे थे, जो आगे भी बनी रहेगी। संयंत्रों तक नकदी पहुंचने का तंत्र कमजोर है, क्योंकि उपभोक्ता डिस्कॉम (बिजली वितरण करने वाली कंपनियों) को देरी से भुगतान करते हैं और इसलिए ये कंपनियों समय पर संयंत्र को पैसा नहीं देतीं। मांग की अनिश्चितता बढ़ने के साथ वित्त वर्ष 2021 में संयंत्रों के लिए स्थानीय भंडारण का इस्तेमाल अस्थाई ‘रीति’ हो गई। 
बिजली संयंत्रों ने कोयले की अधिक मांग तब शुरू की, जब कोल इंडिया खुद उत्पादन बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रही थी। विस्तारित मानसून में यह शोचनीय था, और कई खदानों में पानी भी भर गया था। भंडारण ऐसी मुश्किलों से पार पाने के लिए ही किया जाता है, लेकिन हमारे पास पर्याप्त भंडार नहीं था। यात्री गाड़ियां कम होने से रेलवे से कोयले की ढुलाई में पहले की तुलना में आधा समय जरूर लगता है, लेकिन डिलिवरी बढ़ाना तब भी आसान नहीं, क्योंकि एक बड़े बिजली संयंत्र को हर दिन दो पूरी ट्रेनलोड (रैक) कोयले की जरूरत हो सकती है। जाहिर है, हमें पूरा का पूरा रैक जोड़ना होगा। दिक्कत यह भी है कि हमने ऐसा तंत्र नहीं बनाया कि उपभोक्ता अपनी मांग खुद कम कर सकें। ऐसी व्यवस्था आपूर्ति बढ़ाने की तुलना में कहीं तेजी से कारगर होगी। स्वैच्छिक कटौती से संकट का देर से हल निकल सकता है, हालांकि इसे भी कमतर नहीं समझना चाहिए। और, अगर ये सब नहीं किए जाएंगे, तो लोड-शेडिंग का विकल्प है। कुछ क्षेत्रों में यह शुरू भी हो गया है। तो क्या हमें खुद अपनी खपत कम करनी चाहिए? यह कोयले की अधिक आपूर्ति का विकल्प तो नहीं है, पर अभी हमारा यही प्रयास होना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सब्सक्राइब करें हिन्दुस्तान का डेली न्यूज़लेटर

संबंधित खबरें