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बलूचियों की आवाज कुचलने का सिलसिला कब रुकेगा

कुलदीप तलवार , वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Rohit
Wed, 14 Oct 2020 11:42 PM
बलूचियों की आवाज कुचलने का सिलसिला कब रुकेगा

पाकिस्तान में एकजुट होता विपक्ष अब मांग करने लगा है कि पाकिस्तानी जमीन चीन को अब नहीं बेचने देंगे। खासतौर पर बलूचिस्तान की जमीन पर चीनी वर्चस्व पाकिस्तान सरकार की मंजूरी से दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। दुनिया जानती है कि बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का कब्जा अवैध है और वहां अब चीन का हावी होते जाना ज्यादा खतरनाक है। वर्ष 1947 के बंटवारे से पहले बलूचिस्तान पर कलात के खान का शासन था, जिनको जबरन बंदूक की नोंक पर कराची लाकर विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराए गए। इस निर्णय की पुष्टि नेशनल असेंबली के दोनों सदनों द्वारा की जानी थी, जो पाकिस्तान में विलय को मान्यता देती। 12 अगस्त, 1947 को पाक की स्वतंत्रता के दो दिन पहले सदनों ने इस विलय को नामंजूर कर दिया और इसे स्वतंत्र राज्य बनाने का फैसला किया। बलूच राष्ट्रवादी उसी समय से  इस कब्जे को समाप्त कराने के लिए व पाक से आजादी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक इसमें सफलता नहीं मिली है। 
दरअसल, बलूच पाकिस्तान से पूरी तरह जुड़ ही नहीं सके, क्योंकि बलूचों और पाकिस्तानियों की संस्कृति, सामाजिक व्यवहार, मूल्य एकदम अलग हैं। नतीजतन, बलूच राष्ट्रवादियों द्वारा पाकिस्तान में कई आंदोलन चलाए गए हैं और अब भी पाकिस्तान के चंगुल से निकलने के लिए उनका संघर्ष जारी है। एक अनुमान के मुताबिक, बीते एक दशक में बलूचिस्तान में 18,000 से अधिक बलूच युवकों को पाक सेना मार चुकी है। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता होगा, जब बलूची राष्ट्रवादियों को पाक सेना निशाना न बनाती होगी। स्वयं पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, 80,000 बलूच राष्ट्रवादी, जिन्हें पाकिस्तान सरकार बागी मानती है, पिछले कुछ वर्षों से लापता हैं। जो भी बलूच इनकी तलाश करके सामने लाने की बात करते हैं, उनकी हत्या कर दी जाती है। 
बलूच राष्ट्रवादियों की पाकिस्तान से आजादी हासिल करने की मांग अब तो सरहद पार करके अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य देशों में फैल गई है। पाकिस्तान सरकार के उत्पीड़न से तंग आकर हजारों की संख्या में बलूची वहां से पलायन करके विदेश में बस गए हैं। हाल ही में गायब कराए गए पीड़ितों के लिए गठित बलूच वायस एसोसिएशन के अध्यक्ष मुनीर मेंगल, जो पेरिस में रह रहे हैं, ने एक आयोजन में भारत से बलूचिस्तान के मामले में सक्रिय होने की अपील की। इनकी भारत से मदद की अपील बहुत पुरानी है। 
बलूचिस्तान प्रांत पाकिस्तान के हिसाब से सबसे बड़ा है। पाक का 40 फीसदी हिस्सा यह प्रांत घेरे हुए है, पर आबादी सिर्फ एक करोड़ के करीब है। प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से यहां के लोग बाकी पाकिस्तानियों से ज्यादा मालामाल हैं। मगर इसका फायदा बलूचिस्तान को न मिलकर पाकिस्तान में सबसे अधिक आबादी वाले पंजाब प्रांत को मिल रहा है। पाकिस्तान का घनिष्ठ मित्र चीन इस क्षेत्र को अपनी कॉलोनी बनाना चाहता है। चीनी और बलूचियों के बीच अक्सर खूनी झड़पें होती रहती हैं। मसूद अजहर जैसे दुर्दांत आतंकवादी को बचाने में पाकिस्तान की मदद करने वाला चीन अब चाहता है कि बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को ग्लोबल आतंकवादी संगठन घोषित कराने के लिए पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव रखे। असल में, करीब 62 अरब डॉलर की अपनी महत्वाकांक्षी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की सुरक्षा के मद्देनजर चीन यह चाहता है। यह गलियारा बलूचिस्तान से होकर गुजरता है और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी इसके खिलाफ है। इधर चीन ने एक नई चाल चली है, वह ग्वादर के पास नौसैनिक अड्डा भी बना रहा है। इन दिनों चीनी इंजीनियर ग्वादर, कराची, बंदरगाह के आसपास इसके निर्माण में जुटे हैं। दुनिया को सतर्क हो जाना चाहिए, बलूचिस्तान में यदि चीन की योजना सफल होती है, तो इसका असर व्यापक होगा। 
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अगर बलूची राष्ट्रवादियों पर पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और ग्वादर इलाके में चीन द्वारा किए जा रहे अत्याचारों पर विराम नहीं लगा, तो बलूचिस्तान के हालात और खराब होंगे। विश्व बिरादरी का भी कर्तव्य है कि इसमें हस्तक्षेप करे और बलूचों को न्याय दिलाए। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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