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नजरियाइंसानियत के प्रति फर्ज की याद दिलाता त्योहार

एम शाफे किदवई, प्रोफेसर, जनसंचार विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालयPublished By: Naman Dixit
Thu, 13 May 2021 11:34 PM
इंसानियत के प्रति फर्ज की याद दिलाता त्योहार

प्राचीन काल से नरक को सबसे क्रूर अभिशाप समझा जाता रहा और मनुष्य सदैव स्वर्ग का सपना देखता रहा। संसार के समस्त धर्मों ने नरक और स्वर्ग के माध्यम से मनुष्य को इस दुनिया में जीने का रास्ता दिखाया है। नरक का हमारे संसार से बाहर कोई वजूद है या नहीं, अथवा स्वर्ग भी मानवीय कल्पना का दूसरा नाम है- यह बहस बहुत पुरानी है। अलबत्ता, जन्नत के अस्तित्व पर मिर्जा गालिब की एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी बड़ी मशहूर हुई है- 
हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है।
ख्यात रूसी उपान्यासकार दोस्तोएवस्की ने नरक की नई परिभाषा देते हुए लिखा है कि ‘नरक प्रेम करने से वंचित रहने के भाव का नाम है।’विश्व के समस्त धर्म मनुष्य को घृणा और क्रूरता से दूर रहने की शिक्षा देते हैं। धार्मिक त्योहारों के आयोजन प्रेमभाव बढ़ाने के लिए ही किए जाते हैं। हर्ष और उल्लास को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने के लिए भी त्योहारों का आयोजन किया जाता है। मगर धार्मिक त्योहारों का मूल भाव आत्मीयता और एक-दूसरे के प्रति आदर व प्रेम के एहसास को जगाना होता है। इसके लिए सबका एक जगह पर इकट्ठा होना आवश्यक नहीं। जरूरी यह है कि त्योहार के अवसर पर यह समझा जाए कि पूरा विश्व एक परिवार है, जिसमें हर एक का महत्व है। मुसलमानों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार ईद-उल फितर है, जो रमजान के तीस रोजों के बाद मनाया जाता है। रोजा इंसान के केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, यह तो इंसान को अपनी आंतरिक विसंगतियों को दूर करने का प्रशिक्षण देता है। ईद हमेशा से हर्षोल्लास और सार्वजनिक मेल-मिलाप को इंगित करती रही है। इससे यह भी पता चलता है कि इस्लाम अपने अनुयायियों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करता। प्रेमचंद की कहानी ईदगाह  में ईद की नमाज का चित्रण इसी परिप्रेक्ष्य में किया गया है। नमाज के तुरंत बाद बाजार के क्लास वर्गीकरण को भी यह कहानी हमारे सामने रखती है। मेले में गरीब हामिद और संपन्न वकील के बेटे की खरीदारी यही फर्क हमें बताती है। ईद संकट के समय में पहले भी मनाई गई और लोगों ने सिर्फ नमाज पढ़कर त्योहार मना लिया। लेकिन मानवता के इतिहास में धार्मिक त्योहारों को सार्वजनिक रूप से न मनाने और उसे एक गहन व्यक्तिगत अनुभव के तौर पर स्वीकार करने के उदाहरण नहीं मिलते। कोरोना महामारी ने त्योहारों को गहन आंतरिक अनुभव के तौर पर मनाने का अवसर प्रदान किया है। हर्ष और उल्लास को सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त करना मनुष्य की भावुकता का प्रमाण है, उसके आध्यात्मिक होने का यह साक्ष्य नहीं है। धर्म का सार्वजनिक रूप सदैव अच्छे परिणाम का द्योतक नहीं होता, जब तक कि वह व्यक्तिगत धरोहर न बन जाए। कोरोना महामारी ने इंसानों के बीच शारीरिक दूरी को अनिवार्य बना दिया है। यह समय ईद की सामूहिक नमाज, एक-दूसरे के गले मिलकर खुशियां मनाने और एक-दूसरे के घर जाकर बधाई देने का नहीं है। यह दूरी मनुष्य के अस्तित्व को बचाने के लिए आवश्यक है। वोल्टेयर ने लिखा था- धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य केवल धर्म के लिए नहीं! इसका आशय यह है कि धर्म हमेशा मानवता को बचाने का काम करता है और तमाम धार्मिक संस्कार इंसान की जान के आगे गौण हैं। पिछले दो वर्षों से दुनिया भर के मुसलमानों के लिए ईद का त्योहार सार्वजनिक उल्लास के बजाय आत्म-निरीक्षण और दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वाह का अवसर बन गया है। इंसान का सबसे बड़ा कर्तव्य नफरत को मिटाना और भाईचारा बढ़ाना है। ईद यह अवसर देती है कि हम महसूस करें, दुनिया के तमाम मनुष्यों की आशाएं और खुशियां एक जैसी हैं। ईद के अवसर पर जो खर्च किया जाता था, पिछले साल से उसका एक बड़ा हिस्सा गरीबों की झोली में जा रहा है। इस तरह, एक नया सामाजिक पहलू उभर रहा है। आदमी अक्सर सोचता है कि मिलकर उसे कहना क्या है? इस भाव को किसी शायर ने खूबसूरती से कहा है। इस ईद पर जब किसी से मिलना संभव नहीं, तब यह भाव और सार्थक हो गया है-
ईद जब आती है तो मिलने का इमकान रहता है
मिलकर क्या कहेंगे, सोचकर दिल परेशान रहता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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