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उत्तराखंड के जलते जंगल और कृत्रिम बारिश की आस

उत्तराखंड के जंगलों के सुलगने का सिलसिला जारी है। दावानल इतना भयावह है कि सेना के हेलीकॉप्टरों की मदद से पानी का छिड़काव किया जा रहा है। अब आग मुख्य राजमार्गों व सहायक मार्गों, खेतों, आवासों और...

उत्तराखंड के जलते जंगल और कृत्रिम बारिश की आस
Pankaj Tomarवीरेंद्र कुमार पैन्यूली, पर्यावरण वैज्ञानिक व सामाजिक कार्यकर्ताSun, 12 May 2024 10:04 PM
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उत्तराखंड के जंगलों के सुलगने का सिलसिला जारी है। दावानल इतना भयावह है कि सेना के हेलीकॉप्टरों की मदद से पानी का छिड़काव किया जा रहा है। अब आग मुख्य राजमार्गों व सहायक मार्गों, खेतों, आवासों और गांवों को जोड़ने वाले पैदल मार्गों तक आ-जा रही है। पिछले पांच वर्षों में सबसे सूखा गुजरा अप्रैल माह ही था। फिर, चारधाम यात्रा भी शुरू हो गई है, जिसमें अभी ही 15 लाख से ज्यादा यात्रियों का पंजीकरण हो चुका है। पारंपरिक ग्रीष्मकालीन फायर सीजन अभी 40-50 दिन और चलेगा, जिसके बाद ही मानसून राज्य में पहुंचेगा। मगर जाड़ों में मौसमी बदलाव से वनाग्नि का चक्र फिर से शुरू हो जाएगा, जिसकी तस्दीक सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड के उप-महाधिवक्ता जतिंदर कुमार सेठी के इस उद्धरण से भी होती है कि नवंबर, 2023 से अब तक तक 398 बार जंगल सुलगे हैं। इसी सुनवाई के दौरान में यह भी बताया गया कि राज्य सरकार क्लाउड सीडिंग, यानी कृत्रिम बारिश से वनाग्नि को काबू करने का विचार कर रही है, जिस पर अदालत ने कहा कि जंगल की आग बुझाने के लिए केवल कृत्रिम बारिश या बरसात पर भरोसा न किया जाए। यह बिल्कुल सही सीख थी कि हम बरसात के इंतजार में ही नहीं बैठे रह सकते हैं। वनाग्नि को रोकने के उपाय जल्द ही करने होंगे।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया था कि उत्तराखंड की भयावह वनाग्नि की स्थिति पर वह तत्काल सुनवाई करे। 8 मई को उसी सुनवाई के दौरान कृत्रिम बारिश पर टिप्पणी आई, जिस पर राज्य सरकार को गंभीरता से अमल करना चाहिए। बताया जाता है कि जंगल में आग लगाने के अपराध में 350 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं, जिनमें 62 आरोपियों को नामजद किया गया है, किंतु 8 मई को सुप्रीम कोर्ट में जब याचिका सुनी जा रही थी, उस दिन भी उत्तराखंड में आग लगने की 15 बड़ी घटनाएं घटीं! इस दावानल से वन्य जीव अभयारण्य, संरक्षित दुर्लभ वानस्पतिक प्रजातियां, ग्लेशियर आदि सभी संकट में हैं। धुएं के कारण यहां दृश्यता कम हो गई है, जिसके कारण हवाई सेवाएं भी स्थगित की जा रही हैं। होटल की बुकिंग भी रद्द की जा रही हैं, यानी राज्य को पर्यावरणीय ही नहीं, आर्थिक नुकसान भी हो रहा है।
उल्लेखनीय है कि क्लाउड सीडिंग से बारिश ही नहीं कराई जाती, हिमपात भी कराया जा सकता है। विश्व में पहली बार 1946 में न्यूयॉर्क में कृत्रिम बारिश कराई गई थी। इसका जनक भी एक अमेरिकी रसायन वैज्ञानिक और मौसम वैज्ञानिक था। आज कई देश इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें चीन सबसे आगे है। ऑस्ट्रेलिया में भी इसका खासा उपयोग किया जाता है। इससे संघर्ष-काल में शत्रु क्षेत्रों में बाढ़ और सूखे की स्थितियां पैदा की जा सकती हैं। अपने देश में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक जैसे राज्यों में इसका उपयोग हुआ है। जलाशयों में पानी की कमी होने पर, जल भंडारण की संभावनाओं को बढ़ाने, स्मॉग-वायु प्रदूषण से निपटने और लैंडफिल्स की आग को रोकने के लिए इसके इस्तेमाल पर विचार होता रहा है। 2009 में तानसा झील में पानी की कमी से निपटने के लिए महाराष्ट्र ने इसी तकनीक का उपयोग किया था। माना जाता है कि क्लाउड सीडिंग का खर्च अब करीब एक लाख रुपये प्रति वर्ग किलोमीटर तक आ सकता है। आईआईटी, कानपुर के वैज्ञानिकों की इस पर विशेषज्ञता हासिल है।
जंगलों की आग अक्सर जन-सतर्कता और बरसात से ही रोकी जाती रही है। मगर दिक्कत यह है कि सरकारी अकर्मण्यता, पौधारोपण में अनियमितताएं, भ्रष्टाचार, आपराधिक तत्वों की जंगलों में उपस्थिति आदि कमियों को दूर करने की तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, जिसके कारण दावानल की भयावहता साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले राजीव दत्त यह भी बताते हैं कि उत्तराखंड सरकार को वनाग्नि पर दिशा-निर्देश देने की मांग करने वाली कई याचिकाएं वर्षों से शीर्ष अदालत में लंबित हैं। साल 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी था कि वह सारी याचिकाओं को सुनेगा, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो सका है। अब नई तारीख 15 मई है, जिस दिन शीर्ष अदालत इस मामले को सुनेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)