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नजरियामहिला रोजगार पर मंडराते फिर संकट के बादल

ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्रीPublished By: Manish Mishra
Wed, 12 May 2021 10:51 PM
महिला रोजगार पर मंडराते फिर संकट के बादल

हाल ही में बिल ऐंड मेलिंडा फाउंडेशन की एक रिपोर्ट ने यह खुलासा किया कि महामारी ने विश्व भर की स्त्रियों पर गंभीर असर डाला है। सबसे ज्यादा नुकसान नौकरी-पेशा महिलाओं को हुआ है। महामारी की वजह से पिछले एक वर्ष में 6.4 करोड़ महिलाओं को नौकरी गंवानी पड़ी है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि अमेरिका, कनाडा, स्पेन और ब्राजील शीर्ष दस देशों में हैं। यह सहज कल्पनीय है कि जब महिला सशक्तीकरण के दौर में विकसित देशों का यह हाल है, तो वे देश किस स्थिति में होंगे, जहां महिलाएं दशकों से बराबरी के लिए संघर्ष कर रही हैं।
 
इस संदर्भ में भारत की बात की जाए, तो ‘एक्शन एड एसोसिएशन’ नामक संस्था द्वारा बीते साल 20 राज्यों में किया गया अध्ययन बताता है कि असंगठित क्षेत्र में 79.20 प्रतिशत औरतों की नौकरी चली गई। जिसके पीछे स्पष्ट कारण है कि भारत की अर्थव्यवस्था में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं असंगठित क्षेत्रों में काम कर रही हैं, जहां उनके पास नौकरियां बचाए रखने के विकल्प न के बराबर होते हैं। कुछ अध्ययन यह बता रहे हैं कि धीमे-धीमे उन नौकरियों को भी खत्म किया जा रहा है, जो संगठित क्षेत्र के तहत आती हैं। इनमें आईटी सेक्टर, स्टार्टअप, मीडिया, पर्यटन और निर्यात उद्योग शामिल हैं। ये वे क्षेत्र हैं, जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा है। भारत में स्त्रियों को काम करने केलिए सामाजिक व पारिवारिक, दोनों स्तरों पर संघर्ष करना पड़ता है और जब भी अर्थव्यवस्था डगमगाती है, तब औरतों को विवश किया जाता है कि वे नौकरी छोड़ दें। लैंगिक समानता पर अपनी पीठ थपथपाने वाले देश भी यही मानसिकता रखते हैं कि पुरुषों के आर्थिक सुदृढ़ीकरण के कथित अधिकार पर महिलाएं अधिग्रहण के प्रयास करती हैं, क्योंकि उनके लिए यह आवश्यक नहीं कि वे धनार्जन करें। उनका प्राथमिक और मौलिक दायित्व घर और परिवार की देखभाल करना है। यह मिथक दशकों से कायम हैं, जिसकी पुष्टि अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर की प्रकाशित एक रिपोर्ट से भी होती है। इस शोध के मुताबिक, कई देशों में यह धारणा है कि महिलाएं तुलनात्मक रूप से नौकरी की कम हकदार हैं। 

महामारी से पूर्व भारत में स्त्रियों की श्रम बाजार में भागीदारी दर (एलएफपीआर) लगातार गिर रही है। यह 2017-18 में 23.5 प्रतिशत थी। महिलाओं की कम एलएफपीआर का मतलब है कि अधिकतर महिलाएं न तो काम कर रही हैं, न काम की तलाश कर रही हैं। यह तथ्य पीड़ादायक इसलिए है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता महिला सशक्तीकरण की पहली शर्त है, क्योंकि धनार्जन उनके आत्मबल में ही बढ़ोतरी नहीं करता, उनके भीतर निर्णय-क्षमता भी विकसित करता है। पितृ-सत्तात्मक समाज की जड़ें आज भी इसीलिए कायम हैं, क्योंकि श्रम बाजार में पुरुषों का वर्चस्व है और अपने इस वर्चस्व को बनाए रखने में वे कोई चूक नहीं करते हैं। चाहे इसके लिए उन्हें महिलाओं पर किसी भी तरह का मानसिक और भावनात्मक दबाव ही क्यों ना बनाना पड़े। प्रथम विश्व युद्ध के समय जब पुरुषों के युद्ध में जाने के कारण महिलाओं ने उन तमाम जोखिम भरे क्षेत्रों में काम किया, जहां पुरुषों का वर्चस्व था, तब भी उन्हें प्रतिकूल स्थितियों का सामना करना पड़ा था। जहां 1919 में ब्रिटेन ने ‘द सेक्स डिसक्वालिफिकेशन’ अधिनियम पारित कर महिलाओं को हक दिया कि लिंगभेद के कारण उन्हें नौकरी से बाहर नहीं निकाला जा सकता। ठीक उसी समय ‘द रेस्टरैशन ऑफ प्री वॉर प्रैक्टिस एक्ट 1919’ की बहाली कर अधिकांश महिला श्रमिकों को अपनी युद्धकालीन भूमिकाएं छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। जिन महिलाओं ने नौकरी ना छोड़ने की इच्छा जाहिर की, उन पर दबाव बनाने के लिए 1919 में ‘द इलस्ट्रेटेड संडे हेराल्ड’ में प्रश्न किया गया, क्या आधुनिक महिलाएं फूहड़ हैं? इस तरह के तमाम दबावों के बीच महिलाओं ने आत्मसमर्पण कर दिया और वह अपने घर तक सीमित हो गईं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भी महिलाओं के साथ फिर वही इतिहास दोहराया गया।  द फेमिनिन मिस्टिक  में बेट्टी फ्रीडम लिखती हैं, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद महिलाओं पर भावानात्मक दबाव बनाया गया कि वे पुरुषों के लिए अपनी नौकरियां छोड़ दें, और ऐसा हुआ भी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से आज तक यह स्थिति यथावत है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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