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युद्ध की बरसी से पहले सीमा पर फिर बढ़ी तनातनी

सी उदय भास्कर, निदेशक, सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीजPublished By: Naman Dixit
Mon, 11 Oct 2021 11:38 PM
युद्ध की बरसी से पहले सीमा पर फिर बढ़ी तनातनी

अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी तवांग सेक्टर में चीन और भारत के सैनिकों के बीच की भारी धक्का-मुक्की की खबरों ने जून, 2020 में गलवान में हुई हिंसा जैसी आशंका बढ़ा दी है। हालांकि, अब मामला संभलता दिख रहा है, पर इसने एक बार फिर भारत और चीन के नाजुक रिश्ते को बेपरदा किया है। तवांग में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (चीन की सेना) ने जो घुसपैठ की, वह अगस्त में ऐसी ही एक अन्य घटना की अगली कड़ी है। तब करीब 100 पीएलए सैनिकों ने उत्तराखंड के बाराहोती में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को पार किया था। जाहिर है, राजनयिकों और सैन्य कमांडर स्तर पर पिछले एक साल में हुई कई दौर की बातचीत के बाद भी दोनों देशों के बीच विवादित एलएसी पर स्थिति नाजुक बनी हुई है। सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे तो यह भी मानते हैं कि पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में चीन द्वारा बढ़ाई जा रही सैन्य गतिविधियां चिंतनीय हैं, और अगर यह मामला नहीं सुलझ सका, तो एलएसी भी एक तरह की एलओसी (भारत और पाकिस्तान की सीमा-रेखा) बन जाएगी।

आपसी तनातनी के ये गंभीर हालात 20 अक्तूबर से पहले बन रहे हैं। यह वही तारीख है, जो हमारे सैनिकों को 1962 की याद दिलाती है, जब चीन ने हम पर जंग थोप दी थी। आज भी वह युद्ध एशियाई भू-राजनीति को लेकर और व्यापक सत्ता संघर्ष की वैश्विक पृष्ठभूमि में कई स्तरों पर हमारे लिए ऐतिहासिक सबक है। अक्तूबर, 62 में चीनी फौज ने एलएसी तब पार किया था, जब अमेरिका और सोवियत संघ क्यूबाई मिसाइल संकट को लेकर खतरनाक रूप से आमने-सामने थे। कहा जाता है कि महाशक्तियों के बीच इसी परमाणु टकराव का फायदा बीजिंग ने उठाया था। उस समय प्रधानमंत्री नेहरू ने अमेरिका और सोवियत संघ से मदद मांगी थी और अमेरिका से मदद की पेशकश के बावजूद, कई हिस्सों में भारत को अपने दम पर चीनी हमले से निपटना पड़ा था। करीब छह दशक के बाद इतिहास की वह धुन कहीं अधिक विविध तरीके से सुनी जा सकती है, विशेषकर प्रौद्योगिकी, वैश्वीकरण व भू-राजनीति की अनिवार्यता को देखते हुए। भारत और चीन सीमा विवादों का स्थायी निपटारा होने तक किसी अस्थाई व्यवस्था पर सहमति नहीं बना सके हैं, जो एशियाई राजनीति में वर्चस्व की जंग का प्रकटीकरण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अपनी प्राथमिकताएं हैं, क्योंकि वे अपने-अपने देश को क्रमश: 2022 और 2024 में आजादी की 75वीं वर्षगांठ की ओर ले जा रहे हैं। 
उधर, चीन ने रूस से अमेरिका के प्रमुख प्रतियोगी का स्थान छीन लिया है। अफगानिस्तान मसले के अंत के बाद अमेरिका का ध्यान अब बीजिंग पर है। गत 7 अक्तूबर को सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) ने घोषणा की है कि वह चीन मिशन सेंटर की स्थापना करेगी और अमेरिका के सामने आने वाली नई चुनौतियों पर गौर करेगी। फिर भी, चीन को ‘खतरा’ मानने के बावजूद, अमेरिका द्विपक्षीय बातचीत के लिए उत्सुक है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन व शी जिनपिंग इस वर्ष के अंत तक एक वर्चुअल मीटिंग में आमने-सामने हो सकते हैं। इसी 6 अक्तूबर को अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य व विदेशी मामलों के आयोग के निदेशक यांग जिची (जो भारत के साथ सीमा-वार्ता को भी देख रहे हैं) के बीच हुई मुलाकात की यह अगली कड़ी होगी। साफ है, अमेरिका-चीन संबंधों की दशा-दिशा जहां तमाम बड़ी वैश्विक ताकतों के लिए मायने रखेगी, वहीं यह भारत व रूस, और उनके अपने द्विपक्षीय रिश्तों के लिए कहीं ज्यादा प्रासंगिक है। प्रमुख ताकत के रूप में आज बेशक रूस का रुतबा कमजोर हुआ है, लेकिन चीन-अमेरिकी रिश्ते के निर्धारण में यह एक बड़ा कारक है, ठीक उसी तरह, जैसे बीजिंग शीत युद्ध के दौरान था और मुख्य मुकाबला वाशिंगटन और मास्को के बीच था। चूंकि, भारत और रूस के संबंधों का अपना इतिहास रहा है और इसमें लचीलापन भी है, जो दोनों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। यह अमेरिका-भारत द्विपक्षीय रिश्ते को असहज बना सकता है। इसलिए, ताइवान के प्रति शी जिनपिंग के रुख, गलवान के अनुभव व 20 अक्तूबर, 1962 के सबक हमारी आंखें खोलने के लिए काफी हैं। हमें खुद के प्रति ईमानदार होना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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