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नजरियाछोटी-बड़ी कामयाबियों से सीखकर करें मुकाबला 

किरण मजूमदार शॉ, उद्यमी व अध्यक्ष, बायोकॉनPublished By: Manish Mishra
Tue, 11 May 2021 11:41 PM
छोटी-बड़ी कामयाबियों से सीखकर करें मुकाबला 

कोरोना महामारी की दूसरी लहर भारत को तबाह करने में लगी है। हमारी स्वास्थ्य व चिकित्सा व्यवस्थाओं की कमियां उजागर हो रही हैं और हम जीवन व आजीविका के स्तर पर बड़ी कीमत चुका रहे हैं। हमें इस लहर से मुकाबले के लिए पूरी गति और समझदारी से कदम उठाने की जरूरत है। साथ ही, यह सुनिश्चित करने के लिए विकेंद्रीकरण भी जरूरी है। स्थानीय प्रशासन को खुद की रणनीति तैयार करने की आजादी देना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल से निपटने में सुविधा होती है, जानकारी, निगरानी व तत्काल कार्रवाई से लाभ होता है। विकेंद्रीकरण स्वामित्व और जिम्मेदारी के बंटवारे को प्रोत्साहित करता है। सामुदायिक भागीदारी महत्वपूर्ण है। दूसरी लहर का मुकाबला करने के लिए सरकार कोविड-रोधी व्यवहार और टीकाकरण की वकालत कर रही है। यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो देश भर में सामुदायिक स्तर पर सबकी सक्रिय भागीदारी की जरूरत पड़ेगी। ऐसे प्रकोपों से प्रभावी ढंग से निपटने में सामुदायिक भागीदारी का प्रभाव 17वीं शताब्दी के गांव आईम के उदाहरण से जाहिर होता है, जो इतिहास में ‘क्वारंटीन’ के सबसे उल्लेखनीय मामलों में से एक बन गया था। 1665-66 के बुबोनिक प्लेग के दौरान आईम के निवासियों ने प्लेग के प्रसार को रोकने के लिए खुद को तैयार किया। गांव के लोग अपने पड़ोसियों द्वारा छोड़े गए भोजन और दवा का भुगतान करने के लिए छह छेदों में पैसा डालने आते थे। लगभग 1,000 की आबादी वाले गांव के एक चौथाई से अधिक लोग प्रकोप के अंत तक जान गंवा चुके थे, पर बाकी सब उस त्रासदी से लड़ने में कामयाब रहे।आईम के उदाहरण से पता चलता है, स्थानीय समुदाय मिलकर कोविड-रोधी व्यवहार लागू कर सकते हैं। वे घर के पास या कॉलोनी में कोविड टीकाकरण का आयोजन कर सकते हैं, जैसे कई आवासीय कल्याण संघ (आरडब्ल्यूए) बेंगलुरु में वृहत बेंगलुरु महानगर पालिका के सहयोग से कर रहे हैं। 

स्थानीय निकायों के सहयोग से टीकाकरण शिविरों की योजना बनाने के अलावा, समुदाय की भागीदारी से कमजोर घरों की पहचान करने, बुजुर्गों और क्वारंटीन लोगों की सहायता करने और संक्रमण शृंखला का पता लगाने में अहम मदद मिल सकती है। लोग ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर व दवा जैसी मेडिकल आपूर्ति का ऑर्डर देने के लिए एक साथ आ सकते हैं। सफलता की कहानियों से सबक लेना भी जरूरी है। यह स्पष्ट है कि जिला-स्तरीय कोविड प्रबंधन सबसे अच्छा काम करता है। पहली लहर के दौरान केंद्र सरकार ने राज्यों का सहयोग करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश दिए थे, जिससे स्थानीय जरूरतों के मुताबिक, जिला स्तरीय पहल की रणनीतियां बनीं। इस विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण ने ही ‘केरल मॉडल, ‘भीलवाड़ा मॉडल, ‘धारावी मॉडल या ‘कर्नाटक मॉडल जैसी सफलता की कहानियां रचीं। इनमें से कई विकेंद्रीकृत प्रयास दूसरी लहर में हाशिए पर चले गए हैं। आज केंद्र व राज्यों, दोनों में अधिक तालमेल की जरूरत है। केंद्रीकृत कोविड टास्क फोर्स और वॉर रूम आश्वस्त तो करते हैं, पर मौके पर तेजी से पहल करने में प्रभावी नहीं होते हैं। दूसरों की सफलता से सीखना आज से ज्यादा महत्वपूर्ण कभी नहीं रहा था। ऐसे समय में, जब मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी से दिल्ली और उत्तर प्रदेश हांफ रहे हैं, तब केरल में अतिरिक्त ऑक्सीजन है। पहले केरल ऑक्सीजन के लिए पड़ोसी राज्यों पर ज्यादा निर्भर था, परे पिछले एक वर्ष में नए संयंत्र स्थापित कर उसने अपनी ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता बढ़ा ली। ऑक्सीजन आत्मनिर्भरता के ‘केरल मॉडल’ का अन्य राज्यों द्वारा अनुकरण आवश्यक है।

वैक्सीन मूल्य निर्धारण भी महत्वपूर्ण है। टीकाकरण की धीमी गति से केंद्रीकृत योजना का संकट स्पष्ट है। अलग-अलग कीमत पर वैक्सीन खरीदने की नीति सही नहीं है। इससे वैक्सीन खरीद की गति धीमी पड़ सकती है। अगले कुछ दिनों में उद्योग संघों, कॉरपोरेट संस्थाओं, स्वयं सहायता समूहों, आरडब्ल्यूए,व राजनीतिक दलों को कोरोना विरोधी बल में शामिल होना होगा और वार्ड,  पंचायत स्तर पर कार्रवाई करनी होगी, अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर वायरस से लड़ाई जीतना चाहते हैं।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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