फोटो गैलरी

Hindi News ओपिनियन नजरियालाइब्रेरी में सेंधमारी से झलकी साइबर युद्ध की भयावहता

लाइब्रेरी में सेंधमारी से झलकी साइबर युद्ध की भयावहता

किताबों की चोरी पुस्तकालयों के लिए कोई नई बात नहीं है। आप किसी भी लाइबे्ररियन से मिलें, वह इसके बहुत से किस्से सुना देगा। पुस्तकालयों के सदस्य और पाठक मौका मिलते ही अपनी पसंदीदा किताब को पार कर लेते..

लाइब्रेरी में सेंधमारी से झलकी साइबर युद्ध की भयावहता
Pankaj Tomarहरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकारMon, 12 Feb 2024 12:01 AM
ऐप पर पढ़ें

किताबों की चोरी पुस्तकालयों के लिए कोई नई बात नहीं है। आप किसी भी लाइबे्ररियन से मिलें, वह इसके बहुत से किस्से सुना देगा। पुस्तकालयों के सदस्य और पाठक मौका मिलते ही अपनी पसंदीदा किताब को पार कर लेते हैं। ऐसी चोरियां अक्सर फुटकर स्तर होती हैं और पुस्तकालय की पूरी संपदा पर होने वाला उनका नुकसान बहुत बड़ा नहीं होता।
ऐसा नहीं होता कि चोर बड़ी संख्या में आएं और ढेर सारी किताबें उठाकर ले जाएं। इतिहास में पुस्तकालय को जला देने का जिक्र तो कई बार आता है, पर उन्हें लूट ले जाने का जिक्र शायद ही कभी आया हो। दरअसल, किताबों में जो ज्ञान पाया जाता है, वह लुटेरों के किसी काम का नहीं होता। इसीलिए दुनिया के विशाल, भव्य और ऐतिहासिक पुस्तकालयों में भी बहुत ज्यादा सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत नहीं महसूस की जाती। इसीलिए लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में पिछले दिनों हुई सेंधमारी बहुत चौंकाती है। यह दुनिया का सबसे बड़ा पुस्तकालय न भी हो, तब भी  सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकालय तो है ही। यह उस देश का पुस्तकालय है, जिसने कभी दुनिया के बडे़ हिस्से पर राज किया था और किताबों के अलावा उस दौर के करोड़ों दस्तावेज इसमें सहेजे गए हैं। अनुमान है, इसकी किताबों व दस्तावेजों की कुल संख्या 20 करोड़ के आस-पास होगी। 
यह पुस्तकालय उस ब्रिटिश संग्रहालय का हिस्सा है, जिसकी स्थापना सन् 1753 में हुई थी। तब से दुनिया भर के शोधार्थियों की यह पसंदीदा जगह है। 19वीं सदी के लगभग एक ही दौर में दो प्रसिद्ध विचारकों ने यहीं बैठकर अध्ययन किया था और दुनिया को दो अनमोल ग्रंथ दिए थे। एक थे कार्ल मार्क्स, जिन्होंने यहीं बैठकर दास कैपिटल की तैयारी की थी। दूसरे थे दादा भाई नौरोजी, जिन्होंने यहीं पर बैठकर किताब पोवर्टी ऐंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया लिखी थी। ये दोनों किताबें आधुनिक दौर में आर्थिक शोषण के दो पक्षों को उजागर करती हैं। 
ब्रिटिश लाइब्रेरी की इस महिमा से अलग हम बात कर रहे थे चोरी की। कुछ समय पहले ‘रायसिदा’ नामक एक साइबर गिरोह ने इस लाइब्रेरी के वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क में सेंध लगा दी, यानी आईटी की भाषा में कहें, तो उसे हैक कर लिया। पुस्तकालय के कंप्यूटर सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया। रायसिदा की ओर से मांग की गई कि अगर छह लाख पौंड के बिटक्वाइन उनके हवाले कर दिए गए, तो वह सिस्टम को बहाल कर देगा, वरना लाइबे्ररी का 600 गिगा बाइट डाटा या करीब पांच लाख फाइलें इंटरनेट के बदनाम तहखाने डार्क वेब में पहंुचा दी जाएंगी, जहां से कोई भी उन्हें डाउनलोड कर सकेगा।
लाइब्रेरी के महत्व को देखते हुए छह लाख पौंड की यह रकम बड़ी नहीं थी। निजी कंपनियां तो चुपचाप ऐसे हैकर्स को रकम देकर छुटकारा पा लेती हैं। मगर ब्रिटिश लाइब्रेरी जैसे सरकारी संस्थान के लिए यह आसान नहीं था। उसने फिरौती देने से इनकार कर दिया और उसका बहुत सा डाटा काले कारोबार की दुनिया के हवाले हो गया। सेंधमारी की इस घटना को तीन महीने बीत चुके हैं और अभी भी पुस्तकालय का सारा कामकाज पहले की तरह सामान्य नहीं हो पाया है। 
बहरहाल, ब्रिटिश लाइब्रेरी में जो हुआ, वह साइबर अपराध का मामला तो है ही, साथ ही हम इससे यह अंदाज लगा सकते हैं कि रक्षा विशेषज्ञ जिस साइबर युद्ध की आशंका जता रहे हैं, उसका स्वरूप कैसा हो सकता है। परंपरागत युद्धों में तो सैन्य हमलों के जरिये महत्वपूर्ण नागरिक और सैनिक बुनियादी ढांचे को तहस-नहस करके ठप्प किया जाता था। पर अब यह काम एक साइबर हमले से हो सकता है और आपकी किसी भी व्यवस्था का कंप्यूटर नेटवर्क में सेंध लगाकर ही ठप्प किया जा सकता है। जिस तरह से एक लाइब्रेरी को ठप्प किया गया, वैसा ही निशाना किसी शहर की बिजली व्यवस्था, जल आपूर्ति व्यवस्था या यातायात व्यवस्था पर भी साधा जा सकता है। 
यानी हम अचानक ही एक ऐसे दौर में पहंुच गए हैं, जहां युद्ध के पुराने खतरे अभी बिल्कुल टले नहीं हैं; एक और विश्व युद्ध का खतरा अभी भी हमारा दु:स्वप्न बना हुआ है। इसी बीच साइबर युद्ध के नए खतरे खड़े हो गए हैं। ऐसे में, सुरक्षा तैयारियों को अब कई तरह से विस्तार देने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें