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8 मई, 2021|6:44|IST

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क्या बंगाल में चुनावी हिंसा का ‘खेला’ अभी बाकी है?

prabhakar mani tewari

वैसे तो पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा की परंपरा बहुत पुरानी रही है, पर मौजूदा विधानसभा चुनाव में जैसी हिंसा हो रही है, वैसी पहले कभी नहीं हुई थी। यह पहला मौका है, जब शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए तैनात केंद्रीय सुरक्षा बलों की फार्यंरग में ही चार लोगों की मौत हुई हो। चौथे चरण की चुनावी हिंसा के दौरान कुल पांच लोगों की मौत हुई है, इनमें आनंद बर्मन नामक वह 18 साल का युवक भी था, जो जीवन में पहली बार मतदान के लिए कूचबिहार जिले की शीतलकुची विधानसभा सीट के 126 नंबर मतदान केंद्र पर पहुंचा था। उसके कुछ घंटे बाद केंद्रीय बल के जवानों ने उसी मतदान केंद्र के बाहर फार्यंरग की।
मौजूदा विधानसभा चुनाव के पहले तीनों चरण भी हिंसा से अछूते नहीं रहे। पहले चरण में कई नेताओं के काफिले पर हमले हुए, तो दूसरे चरण में नंदीग्राम में भी मतदान केंद्रों पर कब्जा करने और हमले के आरोप सामने आए। इस दौरान तृणमूल कांग्रेस और भाजपा से जुडे़ कुछ लोगों की रहस्यमय हालत में मौतें भी हुईं।  लेकिन चौथे चरण ने अब तक की तमाम हिंसा को पीछे छोड़ दिया है। इससे यह बात साबित हो गई है कि राज्य के चप्पे-चप्पे पर केंद्रीय बलों की तैनाती के बावजूद  हिंसा पर लगाम लगाना संभव नहीं है। कहा जाता है, जब बाड़ ही खेत खाने लगे, तो उसकी रखवाली कौन करे? हिंसा की आशंका को निर्मूल करने के लिए रिकॉर्ड संख्या में जिन केंद्रीय बल के जवानों को तैनात किया था, उनकी गोली से ही चार बेकसूर लोगों की मौत हो गई। बीते तीन-चार दशकों के दौरान शायद ही ऐसा कोई चुनाव हो, जब हिंसा न हुई हो। यहां सरकार बदलने के बावजूद हिंसा की परंपरा में कोई बदलाव नहीं आया है। लेफ्ट के सत्ता में आने के बाद कोई एक दशक तक राजनीतिक हिंसा का दौर चलता रहा। बाद में विपक्षी कांग्रेस के कमजोर पड़ने की वजह से टकराव धीरे-धीरे कम हो गया था, लेकिन वर्ष 1998 में तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद वर्चस्व की लड़ाई ने हिंसा का नया दौर शुरू किया। उसी साल हुए पंचायत चुनाव के दौरान कई इलाकों में भारी हिंसा हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि हिंसा के लिए तमाम दल अपनी कमीज को दूसरों से सफेद बताते हुए उसे कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। पहले ममता के मजबूत होने की वजह से जो हालात पैदा हुए थे। वही हालात बीते पांच वर्षों में बंगाल में भाजपा की मजबूती की वजह से बने हैं। कांगे्रस और सीपीएम के हाशिए पर पहुंचने की वजह से तृणमूल कांग्रेस व भाजपा के बीच वर्चस्व की बढ़ती लड़ाई राजनीतिक हिंसा की आग में लगातार घी डाल रही है।
असली चिंता मतदान के दौरान होने वाली हिंसा अब नहीं है, बल्कि चुनावी नतीजों के बाद पैदा होने वाले हालात को लेकर आशंकाएं घनी हो रही हैं। वर्ष 2011 में ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद अगले नौ महीनों के दौरान राज्य के विभिन्न इलाकों में सीपीएम के 56 नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या हुई थी। माना जाता है कि बंगाल में सत्ता की चाबी ग्रामीण इलाकों से ही निकलती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डर और आतंक इस कदर हावी है कि लोग मुंह नहीं खोलना चाहते। यह सब उस राज्य में होता रहा है, जहां के लोगों को देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले राजनीतिक रूप से ज्यादा सजग माना जाता है। मैंने अपने नंदीग्राम दौरे के दौरान दूरदराज के गांवों में लोगों को कहते सुना कि अभी तो केंद्रीय बल तैनात हैं, पर जब वे लौट जाएंगे, तब क्या होगा? हमें रहना तो यहीं है। गांवों में आतंक का जो माहौल है, उसकी कहीं कोई खास चर्चा नहीं हो रही है। राज्य के ग्रामीण इलाकों में जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर पहले भी हिंसा होती रही है, लेकिन इस बार सत्ता के दावेदारों का बहुत कुछ दांव पर होने की वजह से बड़े पैमाने पर हिंसा का अंदेशा जताया जा रहा है, इसलिए राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह मांग उठ रही है कि चुनावी नतीजों के बाद भी कुछ दिनों तक संवेदनशील इलाकों में केंद्रीय बलों को तैनात रखा जाना चाहिए, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि चुनाव के संचालन को लेकर लगातार सवालों के घेरे में खड़ा चुनाव आयोग क्या इस पहलू पर ध्यान देगा? 2 मई के बाद पश्चिम बंगाल में हालात क्या मोड़ लेंगे, यह इस सवाल के जवाब पर ही निर्भर है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan nazariya column 12 april 2021