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किसानों को नहीं लुभाएगी समर्थन मूल्य में यह वृद्धि

सोमपाल शास्त्री, पूर्व कृषि मंत्रीPublished By: Naman Dixit
Thu, 10 Jun 2021 11:13 PM
किसानों को नहीं लुभाएगी समर्थन मूल्य में यह वृद्धि

बाजार वर्ष 2021-22 के लिए खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा करते हुए कहा गया कि केंद्र सरकार किसानों की आय दोगुनी करने को लेकर प्रतिबद्ध है और एमएसपी में औसतन 50 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी की गई है, जिससे देश के करोड़ों किसान लाभान्वित होंगे। मगर आंकडे़ इस दावे की कलई खोल रहे हैं। पिछले साल की तुलना में इस बार तिल के मूल्य में 6.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है, जबकि मूंगफली के दाम 5.2 प्रतिशत, अरहर दाल व उड़द पांच प्रतिशत, बाजरा 4.6 प्रतिशत, ज्वार 4.5 प्रतिशत, कपास 3.8 प्रतिशत और धान के मूल्य 3.8 प्रतिशत बढ़ाए गए हैं। सबसे कम बढ़ोतरी मक्का और मूंग में की गई है, जो है महज 1.1 प्रतिशत। इसका अर्थ यह है कि तिल को छोड़कर बाकी सभी फसलों की कीमतों में 1.1 प्रतिशत से लेकर 5.2 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, जबकि पिछले साल खुदरा महंगाई दर छह फीसदी के करीब थी। साफ है, एमएसपी बढ़ाने के बावजूद किसानों की वास्तविक आमदनी में कमी आई है, क्योंकि उनकी लागत बढ़ गई है।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि ‘सी2’ पर 50 फीसदी लाभ देते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का भाजपा का 2014 का चुनावी वायदा अब तक अधूरा ही है। सी2 में फसल उत्पादन-कार्य में किए गए तमाम नकदी और गैर-नकदी खर्चों के साथ जमीन पर लगने वाला किराया और अन्य कृषि पूंजियों पर लगने वाला ब्याज भी शामिल होता है। नए समर्थन मूल्य से किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही, तो भला उन्हें 50 फीसदी लाभ कहां से मिल पाएगा? लागत का मसला यह है कि पिछले एक साल में खेती-बाड़ी से जुड़ी सभी चीजों के दाम बेतहाशा बढ़ गए हैं। खाद की कीमत प्रति बैग 1,200 रुपये बढ़ी है, तो डीजल के दाम में तीन गुना तेजी आई है। बीज के लिए भी किसानों को कहीं अधिक रकम चुकानी पड़ रही है। इसलिए कोरे दावे के बजाय कहीं अच्छा होता कि सरकार ईमानदारी से यह स्वीकार करती कि संसाधनों की कमी की वजह से वह 2014 के लोकसभा चुनाव का अपना वायदा (जो उस वक्त भी दिवास्वप्न की तरह था और आज भी है) पूरा नहीं कर पा रही है। मगर हां, सी2 प्लस 50 फीसदी स्तर पर पहुंचने के लिए वह संजीदा प्रयास करेगी, और हर साल महंगाई दर के अतिरिक्त समर्थन मूल्य में कम से कम पांच फीसदी की वृद्धि करती रहेगी। इससे यह उम्मीद बनी रहती कि अगले चार-पांच साल में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश वास्तविक अर्थों में जमीन पर उतर सकेगी। यही वजह है कि अंदोलनरत किसानों को भी खरीफ फसलों का यह मूल्य नहीं लुभा रहा। केंद्र अगर सोचता है कि इस एमएसपी से किसान खुश हो जाएंगे, तो वह जमीनी हकीकत से अनजान है। एक-एक किसान जानता है कि उसका खर्च कितना बढ़ गया है और फसल की कितनी कीमत उसे मिल रही है। बल्कि इस एमएसपी से किसानों में रोष ही बढ़ेगा। वे यही चाह रहे होंगे कि उनकी जितनी लागत है, कम से कम उतना मूल्य तो उन्हें मिल जाए। नाराज किसान कितने असरदार होते हैं, यह हमने पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में देखा है, जबकि हिंदीभाषी किसानों के लिए बांग्लाभाषियों को प्रभावित करना मुश्किल था। अब तो चुनावी जंग उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब में होने वाली है, और मौजूदा समय के सबसे बडे़ किसान नेता राकेश टिकैत का गृह राज्य उत्तर प्रदेश है। ऐसे में, एमएसपी के रूप में किसानों को भाजपा के खिलाफ एक और मुद्दा मिल गया है। यहां एक मसला गन्ना किसानों का बकाया पेमेंट भी है। आंकडे़ बता रहे हैं कि दो हफ्ते पहले तक गन्ना किसानों की करीब 13 हजार करोड़ रुपये की राशि चीनी मिलों पर बकाया थी। ऐसे में, जरूरी था कि किसानों को फसलोत्पाद पर उचित लाभ दिया जाता। न्यूनतम समर्थन मूल्य में मामूली बढ़ोतरी किए जाने से किसानों की बुनियादी मांगें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। जब खुद सरकारी आंकडे़ ही इसकी तस्दीक करते हों कि देश के करीब छह फीसदी किसान ही सरकारी खरीद एजेंसी को अपनी फसल बेच पाते हैं, तब ऐसी व्यवस्था जरूर बननी चाहिए कि सभी किसानों को लाभाकारी मूल्य मिले। सरकारों को इसी दिशा में सक्रिय होना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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