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नजरियाआपदा के प्रहार से बढ़ रही असमानता और गरीबी

हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयूPublished By: Manish Mishra
Sun, 09 May 2021 10:28 PM
आपदा के प्रहार से बढ़ रही असमानता और गरीबी

भारत में प्रतिदिन कोविड संक्रमण 4,00,000 के आंकड़े को पार कर गया है। इस दूसरी लहर के शिखर की भविष्यवाणी करना मुश्किल है। एक साल से अधिक समय से इस महामारी ने अधिकांश भारतीयों के जीवन और आजीविका पर कहर बरपा रखा है। टीकाकरण को जब गति मिलेगी, तब महामारी से कुछ राहत की संभावना है, लेकिन महामारी के दीर्घकालिक प्रभावों को देश की आबादी के विभिन्न वर्ग समान रूप से साझा करेंगे, इसकी संभावना नहीं है। कई संस्थानों और साथ ही, निजी सर्वेक्षणों ने पिछले साल आर्थिक गतिविधियों में गिरावट और आय में कमी के परिणामस्वरूप गरीबी में वृद्धि का अनुमान लगाया था। वैसे, गरीबी पर संभावित प्रभाव के अनुमान अलग-अलग हैं। वैसे इसमें कोई विवाद नहीं कि निचले स्तर पर अधिकांश लोगों की आय को झटका लगा है। फरवरी के अंत तक देखी गई आर्थिक सुधार की गति धीमी हो गई है, दूसरी लहर के बाद से वाणिज्यिक गतिविधियों पर नए सिरे से अंकुश लगा है, लेकिन यह असमानता और अंतर-पीढ़ी गतिशीलता है, जहां यह आपदा भारतीय विकास के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हो सकती है। 

यह वायरस अमीर और गरीब के बीच अंतर नहीं करता है, लेकिन इसका असर परिवारों के आर्थिक स्तर पर निर्भर करता है। अनेक परिवार अपने कमाऊ  सदस्य की मृत्यु से पीड़ित हो सकते हैं। लेकिन यहां जो लोग इस तरह के दुख से बचे हुए हैं, उन्हें असहनीय रूप से एक भारी स्वास्थ्य खर्च का सामना करना पड़ेगा। इस तरह का बोझ पहले से ही गरीबी में पड़े परिवारों के माथे आ पड़ा है। इस दौर में गरीबी रेखा के नीचे या आसपास के लोगों के लिए बहुत कुछ बुरा घटित हो रहा है। सबसे बदतर बात यह कि इस साल संक्रमण बड़े पैमाने पर ग्रामीण जिलों, विशेषकर उत्तरी राज्यों में फैल रहा है। गरीबों के उच्च घनत्व वाले राज्यों के इन जिलों में से अधिकांश पिछले साल कोरोना से कम प्रभावित हुए थे, पर अब संकट में हैं। देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पिछले पांच वर्षों से गहरे संकट में है, ऐसे में यह और भी दुखद है। हालांकि, अर्थव्यवस्था के कुछ बिंदुओं पर सुधार की संभावना है, लेकिन सुधार  सबके लिए समान नहीं होगा। महामारी ने न केवल अर्थव्यवस्था को बाधित किया है, बल्कि शिक्षा तक पहुंच में व्यवधान में भी योगदान दिया है। ग्रामीण और शहरी इलाकों के गरीब घरों के अधिकांश बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह बाधित हुई है। जो परिवार ठीकठाक स्थिति में हैं, उन्होंने ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से पढ़ाई को किसी तरह संभाला है, लेकिन समाज के निचले स्तर और उच्च स्तर के बीच शिक्षा का जो बड़ा अंतर पैदा होगा, उसके गंभीर परिणाम होंगे। 
इसी तरह स्वास्थ्य की पहुंच की बात करें, तो ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है। सभी तक टीकों की पहुंच भी असमान है। गरीब परिवारों को राज्य की दया पर छोड़ दिया गया है। एक बड़ी आबादी तक टीका पहुंचाने की चुनौती है, सरकार द्वारा मुफ्त टीकाकरण के वादे के बावजूद गरीबों के टीके से वंचित रह जाने की आशंका है। साथ ही, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, पोषण, आजीविका के साधनों के मामले में भी असमानता के कारण देश में समग्र समानता और भविष्य के आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। किसी भी मामले में पिछले तीन दशकों में अर्थव्यवस्था में विकास के बावजूद, लगभग सभी आयामों पर असमानता में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। जबकि शुरू में तेजी से हो रहे विकास ने गरीबी में कमी लाने में योगदान दिया था, हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि इनमें से कुछ लाभ इस आपदा के चलते खत्म हो गए हैं। साथ ही, गरीबी भी बढ़ रही है। टीकाकरण व स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का विकास करके दूसरी लहर को जवाब दिया जा सकता है, लेकिन अर्थव्यवस्था और गरीबों के जीवन को ठीक करने के लिए उनकी आय व आजीविका की रक्षा के लिए नीतियों की जरूरत पड़ेगी। हमें अब स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाओं तक सबकी पहुंच को प्राथमिकता देनी चाहिए। देश की बड़ी आबादी को पोषण व आजीविका का संबल देना चाहिए। यह न सिर्फ महामारी के झटके से निपटने के लिए जरूरी है, बल्कि दीर्घकाल में समानता सुनिश्चित करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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