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नजरिया

आईटी कंपनियों के सामंती ढर्रे पर जरूरी है लगाम 

अभिनव प्रकाश सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्सPublished By: Naman Dixit
Wed, 09 Jun 2021 11:36 PM
आईटी कंपनियों के सामंती ढर्रे पर जरूरी है लगाम 

तकनीकी बाधाएं अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति में दूरगामी हलचल पैदा कर रही हैं। आईटी नियमों को लेकर भारत और विदेशी कंपनियों के बीच पनपा ताजा विवाद दुनिया भर में जारी चलन का ही एक हिस्सा है। यह तकनीकी कंपनियों की बढ़ती ताकत का संकेत है, जो राष्ट्र की शक्ति को निरर्थक बना देना चाहती हैं। इतिहास में असल क्रांतियां तो तकनीकी क्रांतियां ही मानी जाएंगी, जो किसी समाज के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संस्था में बदलाव लाती हैं। औद्योगिकीकरण, व्यापारिक शहरों के उदय, श्रम की गतिशीलता व जमींदार वर्ग से आर्थिक ताकत के खिसककर औद्योगिक-मध्य वर्ग की तरफ जाने के कारण जो सामंतवाद पनपा है, पिछली कुछ सदियों में, तकनीकी प्रगति ने उसको काफी कमजोर कर दिया है। राष्ट्र व राष्ट्र-राज्य के साथ-साथ एक संघीय सरकार के उदय के रूप में यह हमारे सामने आया, जो सामंती और कुलीन ताकतों पर अंकुश लगाने में मजबूती से सक्षम है।
मगर अब यही तकनीकी प्रगति एक नए तकनीक-सामंत वर्ग को जन्म दे रही है, और राष्ट्र की ताकत को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है। इस घटना को तकनीकी-सामंतवाद कहा जा सकता है। इसके तीन स्तंभ हैं- विशुद्ध कंप्यूटिंग ताकत, कुछ निजी हाथों में अभूतपूर्व आर्थिक शक्ति और समाज को आकार देने में तकनीक-अभिजात वर्ग की क्षमता। पुराने सामंतवाद में जमीन पर अधिकाधिक नियंत्रण अहम था, जबकि तकनीक के सामंतवाद में डिजिटल रियल एस्टेट पर कब्जा किया जाता है। पुराने सामंतवाद की तरह, तकनीक-सामंतवाद भी कानून व सरकार के तमाम अंगों को इस हद तक भ्रष्ट व बेकार बना देता है कि सरकारों के लिए ऐसा कोई कदम उठाना मुश्किल हो जाता है, जो सामंतियों के क्रूर व्यवहार को नियंत्रित करने में सक्षम हो। इतना ही नहीं, पुराने सामंतवादियों की तरह नया तकनीक-अभिजात वर्ग भी अधिक से अधिक डिजिटल रियल एस्टेट पर कब्जा करने और कृत्रिम बुद्धिमता, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों को अपने काबू में रखने की जंग में शामिल है। इसमें कई बड़ी तकनीकी कंपनियां ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी लगती हैं। बड़ी और धनाढ्य तकनीकी कंपनियां न सिर्फ भ्रष्टाचार करती हैं और व्यवस्थाएं तोड़ती हैं, बल्कि संप्रभु राष्ट्र के कानूनों का पालन करने या करों के भुगतान से भी हीला-हवाली करती हैं। यह वर्ग समाज को नया आकार दे सकता है। इतने कम लोगों के पास जनता से अलग रहते हुए भी जनमत तैयार करने की इतनी ताकत इतिहास में कभी नहीं रही। इस तकनीक-अभिजात वर्ग के पास इतनी ताकत है कि वह स्थानीय राजनीति में दखल दे सके और डाटा व संचार के साधनों पर अपने नियंत्रण का लाभ उठाकर राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल दे और सरकार को सत्ता से बेदखल कर दे। इस वर्ग ने अपना वैचारिक ब्रांड और तकनीकी रूप से दक्ष रणबांकुरे तैयार किए हैं। बहरहाल, तकनीक-अभिजात वर्ग को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मनमानी शक्तियां हासिल हैं। यह अपने समान संकीर्ण सोच को दुनिया भर में थोपने का प्रयास करता है। इनकी मुखालफत सेंसरशिप, मानहानि, प्रतिबंध जैसी कार्रवाइयों को न्योता दे सकती है, जो आज की दुनिया में जंगल में अलग-थलग रहने जैसा है। यहां संविधान द्वारा मिले अधिकार व अपील करने या न्यायिक निवारण की मांग जैसे अधिकारों को निरर्थक बनाया जा रहा है, क्योंकि नया तकनीक-अभिजात वर्ग अपना कानून खुद बना रहा है, और खुद ही वकील, जज व जल्लाद की भूमिका निभा रहा है। यह दुनिया भर में फिर से मध्ययुगीन सामंतवाद के दौर जैसा माहौल लाना चाहता है। हमें समझना होगा कि आज नौकरियां खत्म हो रही हैं। मध्य वर्ग को निचोड़ा जा रहा है। और, अधिकाधिक लोग गिग इकोनॉमी (स्थाई नौकरी के बजाय अनुबंध के काम को तवज्जो देने वाले श्रम बाजार) से बाहर निकलने की जद्दोजहद में हैं, क्योंकि यह उन्हें एक नए तरीके से गुलाम बना रही है। तकनीकी बदलाव रोके नहीं जा सकते। मगर अकादमिक व बौद्धिक रूढ़िवादिता और संकीर्ण राजनीतिक विवादों से परे इस पर गंभीर चर्चा करना एक सकारात्मक कदम हो सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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