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विशेषज्ञों के हाथों में न थमाएं कृत्रिम बुद्धिमत्ता की लगाम 

कनीक संबंधी फैसले कौन लेता है? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे हम साल 2024 में अक्सर टकराएंगे। चैटजीपीटी की शानदार शुरुआत के साथ, 2023 वह साल था, जिसमें एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस...

विशेषज्ञों के हाथों में न थमाएं कृत्रिम बुद्धिमत्ता की लगाम 
Pankaj Tomarजसप्रीत बिंद्रा, तकनीक विशेषज्ञMon, 08 Jan 2024 12:04 AM
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कनीक संबंधी फैसले कौन लेता है? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे हम साल 2024 में अक्सर टकराएंगे। चैटजीपीटी की शानदार शुरुआत के साथ, 2023 वह साल था, जिसमें एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) की खूब चर्चा रही और लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) आम बहस के केंद्र में रहा। एआई डीपफेकसे चुनावों को आसन्न खतरा, युद्ध में एआई संचालित ड्रोन व हथियारों के इस्तेमाल का भय और कंपनियों में कर्मचारियों की जगह एआई से काम लेने की तैयारी को देखते हुए आने वाले दिनों में एआई संबंधी नैतिकता और सुरक्षा की बहस और तेज हो जाएगी। 
आज सभी बड़े देश व वैश्विक समूह एआई पर कब्जा करने की दौड़ में कूद पड़े हैं, हालांकि, तमाम तरह के प्रस्तावों, सिद्धांतों और दिशा-निर्देशों के चलते ऐसी कोई नियामक संस्था फिलहाल दूर की कौड़ी जान पड़ती है। वैसे, सभी इस बात से सहमत हैं कि तेजी से अपना आकार बदलने वाली इस तकनीक को नियंत्रित करने और सुरक्षित बनाने की दरकार है, मगर यह साफ नहीं कि किसके नजरिये को मंजूर किया जाएगा?
मेरा मानना है कि बहस सिर्फ एआई संबंधी सुरक्षा या नैतिकता की नहीं है, बल्कि इससे भी ऊपर है। यह इस बारे में है कि हम अपने लिए किस तरह का भविष्य चाहते हैं। तकनीकें आई और गई हैं, पर एआई उन सबसे अलग है। गार्टनर का उचित ही कहना है कि एआई महज तकनीक नहीं है, बल्कि यह बुनियादी बदलाव का ऐसा वाहक है, जो इंसान और मशीन के संबंधों को प्रभावित करेगा। 
देखिए, तो सही कि कितना कुछ बदल गया है। मोबाइल फोन आने के साथ हम अपने प्रियजनों के फोन नंबर भूल गए हैं। गूगल मानचित्र ने हमारे दिशा-बोध को बिगाड़ दिया है, रास्ते अब पहले की तरह याद नहीं रहते। ई-बुक व चैटबॉट ने हमें पुस्तकालयों से दूर कर दिया है। क्या पता, एक दिन स्वचालित गाड़ियों की वजह से हम गाड़ी चलाना ही भूल जाएंगे। क्या हम अपना समय वीडियो गेम खेलने या ऑनलाइन सामग्रियों के उपभोग में जाया करेंगे, जबकि एआई रोबोट हमारे लिए काम करेंगे? क्या हम ऐसा भविष्य बना रहे हैं? इसलिए, बहस केवल एआई को नियमों के अधीन लाने की नहीं, बल्कि उस भविष्य के बारे में है, जो हम अपने लिए चाहते हैं। 
हॉलीवुड के पटकथा लेखकों की हालिया हड़ताल को याद करें। एआई से अपनी नौकरियां खोने के डर से उन्होंने विरोध का बिगुल बजा दिया। मगर जैसा कि जेमी सुस्किंड ने फाइनेंशियल टाइम्स में पूछा है, क्या सिनेमाई कला का मकसद फिल्म उद्योग में लोगों को रोजगार देना है या अपने दर्शकों का मनोरंजन करना? उनके मुताबिक, साहित्य की दुनिया में भी ऐसी ही बहस चल रही है। किसी लेखक की मौत के बाद एआई की मदद से उसके जैसा लेखन जारी रह सकता है। अमेरिकी रैपर टुपैक शकूर की मौत के 15 साल बाद, 2012 में स्नूप डॉग और डॉ ड्रे ने जब शकूर का होलोग्राम तैयार किया, तो क्या उसने उन लोगों को रोमांचित नहीं किया, जो चाहते थे कि शकूर लौट आए? जब एआई कुछ बेहतर तैयार कर सकती है, तो सारी रचनात्मकता और अभिव्यक्ति इंसानों के अधीन ही क्यों रहनी चाहिए? 
यह तमाम बहस मेरे जेहन में फिर से आने लगी, जब मैंने रत्नों में हालिया क्रांति देखी। प्रयोगशाला में बने सस्ते हीरे से बाजार में उथल-पुथल मच गई है, जो खनन से निकले हीरे के समान हैं। क्या यह अच्छी बात है कि अब हर कोई इन खूबसूरत कृत्रिम रत्नों को खरीद सकता है, या बुरी बात है कि हम हजारों वर्षों से प्रकृति द्वारा तैयार किसी चीज को कृत्रिम रूप से तैयार पत्थर से बदल रहे हैं? जवाब आसान नहीं है और इसे केवल ‘सुरक्षा’ के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। ये बहस मूल्यों को लेकर हैं। यह ‘सही और सही’ के बीच चयन करने को लेकर है। इसे तय करने का अधिकार सिर्फ एआई कंपनियों के पास नहीं होना चाहिए या सरकारों और नियामक संस्थाओं के पास भी नहीं। हमें ऐसे लोगों की जरूरत है, जो एआई प्रौद्योगिकी से परे सोचते और काम करते हों। जो लोग एआई तकनीक में जीते हैं, वे हमारे भविष्य का फैसला करने के लिए सही नहीं हैं। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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