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नजरिया

उतना ही मिले-जुलें, जितना जीने के लिए बहुत जरूरी

मनु जोसेफ, पत्रकार और उपन्यासकारPublished By: Naman Dixit
Mon, 07 Jun 2021 11:39 PM
उतना ही मिले-जुलें, जितना जीने के लिए बहुत जरूरी

झुंड में रहने वाले लोग मेल-जोल के पूरे सर्कस को फिर शुरू कर रहे हैं। लॉकडाउन के नियमों में थोड़ी भी छूट मिले, तो उन्हें अन्य कथित मिलनसार लोगों से मिलने जाना ही है। ठीक ऐसा ही दूसरी लहर के पहले भी हुआ था। मिलनसार या मिलने-जुलने के शौकीन लोगों ने भारतीयों को विशेष घोषित कर रखा है। वे शादियों, पार्टियों और रात्रिभोज में शामिल हुए और निश्चित रूप से खूब हंसे थे। अगर आप कभी इस बात की पड़ताल करें कि एक रेस्तरां में दस लोगों का समूह इतना क्यों हंसता है, आखिर वह कौन-सा मजाक था, जिसने उन्हें हंसाया और क्यों, आप कभी नहीं जान पाएंगे। 
खैर, जब दूसरी लहर आई, तो भारत ने वही किया, जो कर सकता था। इसने कुछ भी नहीं करने की योजना बनाई, लेकिन अपनी निष्क्रियता के तर्कसंगत परिणामों पर चकित दिखा। सभी ने राजनेताओं को दोषी ठहराया। अब फिर से वही लोग निकल रहे हैं। उन्हें बाहर जाकर भीड़-भाड़ वाली जगहों पर लोगों से मिलना है; वे यही दावा करते हैं कि इसी में जीवन और आनंद है, और यहां तक कि अर्थव्यवस्था भी।
मैंने ट्विटर पर यह भी पढ़ा, ‘आप अपना पूरा जीवन अपने अंतिम संस्कार के लिए मेहमानों को इकट्ठा करने में लगा देते हैं।’ लोग सोचते हैं, जिसकी अंत्येष्टि में अधिक मेहमान एकत्र नहीं हुए, तो इसका मतलब वह अकेला था। एक पक्ष यह भी है कि मिलनसार लोगों द्वारा शुरू की गई विनाशकारी दूसरी लहर के परिणामस्वरूप मेहमानों के बिना ही बड़ी संख्या में अंतिम संस्कार हुए।
आधुनिक जीवन मिलनसार लोगों के चलते होने वाला एक अंतहीन उपद्रव है। उपद्रव या परेशानी अन्य लोगों से मिलने की क्रिया में नहीं है, दिक्कत आवश्यकता पड़ने पर मिलने में भी नहीं है, दिक्कत जरूरत से ज्यादा मिलने में है। लोग मिलने की अति कर देते हैं, जबकि न मिलना बचाव में उनकी मदद करता है। मिलने की अधिकता घातक है। समूह में रहना पसंद करने वाले लोग न केवल बीमारियों को अधिक कुशलता से फैलाते हैं, वे रेस्तरां और हवाई जहाजों में भी भीड़ लगाते हैं। अत्यधिक मिलने-जुलने से न केवल चीनी का सेवन ज्यादा होता है, बल्कि नींद के चक्र में भी व्यवधान आता है। नतीजतन, किसी महामारी के बिना भी, अत्यधिक मिलनसार लोग अंतत: किसी न किसी रोग के जनक या वाहक बन जाते हैं। साथ ही, ऐसे लोग खाने-पीने और धन व समय खर्च करने के आधार पर एक सामाजिक व्यवस्था बनाते हैं। अब जब इस तरह की सामाजिक व्यवस्था लागू हो गई है, तब अस्वस्थ जीवन जीने के व्यापक पेशेवर और भावनात्मक लाभ हैं। स्वस्थ जीवन शैली जीने में कुछ नुकसान हैं, जैसे जल्दी उठना और सोना, केवल उन लोगों से मिलने जाना, जो ज्यादा मायने रखते हैं। दरअसल, शारीरिक स्वास्थ्य को भूल जाइए, भले ही आपके पास बातचीत का उच्च स्तर हो, आप इस दुनिया में नुकसान में हैं। तो मैं दुनिया से क्या करने के लिए कह रहा हूं? शादियों में शामिल होना बंद करो, रेस्तरां में भीड़ लगाना बंद करो, लोगों से ज्यादा मिलना बंद करो और जोर से हंसना छोड़ दो? मुझे पता है, ऐसा करके आप नाटकीय लगेंगे। मैं यहां केवल अतिरेक की बात कर रहा हूं, जिससे हमें हर हाल में बचना है। कोई यह तर्क दे सकता है कि अधिकांश दुनिया मिलनसार है, पर यह सच नहीं है। ऐसे कई लोग हैं, जो अतिरेक में शामिल नहीं होना चाहते हैं, लेकिन उन्हें एक शक्तिशाली मनोरंजन व्यवस्था के तहत अतिरेक में शामिल होने के लिए मजबूर किया जाता है। क्या आपने साथ बैठकर खाने-पीने के बजाय लोगों से टहलते हुए मिलने की कोशिश की है? कई लोगों को यह अजीब लगेगा, लेकिन आप ब्रिटेन में आधुनिक विज्ञान के इतिहास को पढ़ते हैं, तो आप दो युवा वैज्ञानिकों से मिलते हैं, जो घंटों जंगल में घूमते हुए वास्तविक प्रकृति पर चर्चा करते हैं। लेकिन आज विशेष रूप से भारत में लोगों से मिलने के स्वस्थ और सुंदर तरीकों का समर्थन करने के लिए कोई प्रभावी नेटवर्क नहीं है। ऐसे में, अत्यधिक मिलने-जुलने वाले लोग कभी न खत्म होने वाले उपद्रव लाते हैं। एक हवाई जहाज जोखिम भरा माध्यम नहीं है, यदि आप बार-बार अपना मुंह नहीं खोलते हैं, तो सुरक्षित हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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