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नजरिया

कहीं हमारी विशाल आबादी कमजोरी न बन जाए

एस पी गौड़, भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारीPublished By: Manish Mishra
Sun, 06 Jun 2021 11:06 PM
कहीं हमारी विशाल आबादी कमजोरी न बन जाए

दूसरी लहर में कोविड के रिकॉर्ड मामलों और मौतों के कारण भारत सरकार को देशी और पश्चिमी मीडिया में तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। हमारा स्वास्थ्य तंत्र 138 करोड़ आबादी की देखभाल कैसे कर रहा है? हमारी स्वास्थ्य सेवाएं असफल क्यों हुईं? क्यों ऐसी हालत हुई कि मरीज अस्पतालों में बेड ढूंढ़ते घूमते रहे और परिजन उनके लिए ऑक्सीजन व दवाइयां? इसका एक जवाब देश की योजनाओं में चिकित्सा और शिक्षा की  लगातार अनदेखी से मिलता है। भारत स्वास्थ्य सेवा पर जीडीपी का केवल 1.3 प्रतिशत खर्च करता है और शिक्षा पर 3.0 प्रतिशत। यह हमारी राजनीति की असफलता है कि बढ़ती आबादी के अनुरूप दोनों महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान नहीं दिया गया। बड़ी संख्या में भारत में डॉक्टर बने नौजवान पश्चिमी देशों में सेवा के लिए चले जाते हैं, यह भी हमारे लिए नुकसानदायक ही साबित हुआ है। 
हकीकत यह भी है कि इतनी बड़ी आबादी की सेवा भागीरथ कार्य है। कम आबादी होती, तो शायद कई स्वास्थ्य सेवाएं अपने आप बेहतर होतीं। डॉक्टर एहलरिख के शब्दों में अपनी आबादी को हम पॉपुलेशन बम न भी समझें, तब भी बड़ी आबादी को अधिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, खाद्यान्न व रोजगार चाहिए। इनके अभाव में यही आबादी जिसे बहुत से जनसंख्या विशेषज्ञ परिसंपत्ति मानते हैं, बोझ बन जाती है। कम आबादी होती, तो कम टीकों में ही काम चल जाता। डॉक्टर-मरीज अनुपात और बेड-आबादी अनुपात भी सही होता। प्रति व्यक्ति आय अधिक होने पर शायद कुपोषण और बीमारियां कम होतीं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के 83 जिलों के पिछले साल के सर्वे के अनुसार, शहरी मलिन बस्तियों में कोरोना का खतरा गांवों के मुकाबले दोगुना है। संक्रमण, स्वास्थ्य लाभ बाद की जटिलताएं और मौतें शायद कम होतीं, अगर भारत की जनसंख्या कम होती। देश के स्वास्थ्य तंत्र और इन्हीं साधनों में शायद हम महामारी से ठीक से निपट लेते। अब तो सबको रोजगार देने का काम भी कठिन नजर आ रहा है। अर्थव्यवस्था को कोरोना पूर्व स्तर पर लाने के लिए भारी संसाधन, उपाय और ज्यादा समय लगेगा। हालांकि, अमेरिकी प्रोफेसर जॉन हल्समेन जैसे अर्थशास्त्री भी हैं, जिन्होंने अरब न्यूज में दावा किया है कि भारत संतुलित राजनीति और दो तिहाई श्रम आबादी (15-64 वर्ष) के बूते तेज गति से तरक्की करेगा। परंतु इस लेखक की राय में देश शायद एक अधिकतम जनसंख्या स्तर पर पहुंच चुका है, इससे अधिक वृद्धि देशहित में नहीं होगी।

चीन और भारत की जनसंख्या तुलनीय होने के कारण चीन का ख्याल एकदम से आता है। भारत की मीडियन आयु 28.4 वर्ष और आधी जनसंख्या 38.4 वर्ष से कम है, यह चीन से 10 साल जवान है। चीन ने अपने को खूब संभाला, टेस्ट किए, बीमारों को ढूंढ़ा, उपचार किया और कोविड-19 को नियंत्रित कर लिया। चीन ने जिस तरह से कोरोना को संभाला, लगता है, उसे बीमारी के विस्तार व प्रकोप का पूर्वाभास था, उसने पहले से रणनीति बना रखी थी, वैसे तंत्र की अपारदर्शिता के कारण चीन के सही हालात की जानकारी असंभव है। अब तो चीन दो के बजाय तीन बच्चों का मानक बनाकर आबादी में बच्चों की संख्या (अब 17 प्रतिशत) बढ़ाना चाहता है। इसका तात्पर्य यह है कि चीन बढ़ती जनसंख्या के बावजूद अपने को स्वस्थ और खुशहाल रखने में सक्षम है। इस कसौटी पर भारत पीछे खड़ा नजर आता है, कोरोना के कारण एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है। गनीमत है, अब देश में संक्रमण की रफ्तार घट गई है। आवश्यक वैक्सीन, दवाएं और ऑक्सीजन का इंतजाम देश-विदेश से अब युद्ध स्तर पर किया जा रहा है। कोविशील्ड, कोवैक्सीन, स्पूतनिक के बाद, हैदराबाद की नई बायो लॉजिकल-ई एवं मॉडर्ना फाइजर, जॉनसन वैक्सीन की अनुमति व शर्तें तय की जा रही हैं। जरूरी दवाओं की पूरी आपूर्ति भी होने लगेगी। पूरा विश्वास है कि तीसरी लहर यदि आती भी है, तो उसका सामना करने के लिए एक सक्षम कार्य योजना बना ली जाएगी। नागरिकों का कर्तव्य है कि वे सावधान रहें, टीकाकरण कराएं, भीड़ से दूर रहें, मास्क लगाकर रहें और साफ-स्वच्छ रखें अपने को, घर को और अंतर्मन को।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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