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अभियान जिससे कुछ न सीखा हमने

हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकारPublished By: Manish Mishra
Sun, 06 Jun 2021 11:02 PM
अभियान जिससे कुछ न सीखा हमने

पोलियो की तुलना किसी भी तरह से कोरोना से नहीं की जा सकती, सिवाय इसके कि दोनों ही वायरस जनित रोग हैं। कोरोना वायरस की वजह से पूरी दुनिया में जिस तरह से जन-धन की हानि हुई है, वैसे उदाहरण मानव इतिहास में बहुत कम हैं। लेकिन पोलियो के उन्मूलन के लिए हमने जो लड़ाई लड़ी है, उसमें सीखने के लिए ऐसा बहुत कुछ है, जो कोरोना काल में हमारे काम आ सकता है। यह 1988 की बात है, जब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने यह तय किया कि बच्चों को जीवन भर की विकलांगता देने वाले इस संक्रामक रोग के पूरी दुनिया से सफाए की कोशिश की जानी चाहिए। अभी तक चेचक ही ऐसी महामारी है, जिसका हम दुनिया से उन्मूलन कर चुके हैं। चेचक का सफाया एक मुश्किल लड़ाई जरूर थी, लेकिन पोलियो के उन्मूलन का प्रयास इससे कहीं ज्यादा कठिन साबित होने वाला था। गली-गली, गांव-गांव और घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो की वैक्सीन देना कोई सरल काम नहीं था, लेकिन किसी संक्रामक रोग को पूरी शिकस्त देने का तरीका कहीं से भी आसान नहीं हो सकता। इस काम को अंजाम देने का बीड़ा दुनिया की कुछ बड़ी स्वयंसेवी संस्थाओं ने उठाया और उन्हीं के साथ यह कार्यक्रम भारत भी आ गया।

बहुत जल्द यह स्पष्ट हो गया कि चुनौती जितनी बड़ी है, उससे स्वयंसेवी संगठन अकेले अपने बूते नहीं निपट सकते। यह ऐसा काम है, जिसे आगे जाकर सरकारों को अंजाम देना होगा। 1995 में भारत सरकार ने यह बीड़ा उठाया, जिसके साथ ही पूरे देश में पल्स पोलियो अभियान शुरू हुआ। इसके लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया। कभी यह नहीं कहा गया कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है, इसलिए इसे राज्यों पर छोड़ देना चाहिए। यह तर्क भी नहीं दिया गया कि इस कार्यक्रम को गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले के स्तर पर लागू करना है, इसलिए यह जिम्मेदारी नगर पालिकाओं, स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों को दी जानी चाहिए। यहां एक और चीज याद करने की जरूरत है कि जब इस अभियान की रूपरेखा तैयार हुई, तब केंद्र में नरसिंह राव की सरकार थी। सरकार किसकी थी, यह ज्यादा अहम नहीं है, महत्वपूर्ण बात यह है कि उसके बाद केंद्र में एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह की सरकारें आईं, लेकिन इस अभियान में किसी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ। बावजूद इसके कि इस अभियान को लेकर कुछ समुदायों में भ्रम फैलाने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन न तो राजनीतिक तौर पर किसी ने इस भ्रम को भुनाने की कोशिश की और न ही इसके खिलाफ किसी ने तलवारें भांजी। जबकि हमारा एक पड़ोसी देश इस भ्रम पर बने तनाव के नतीजे आज तक भुगत रहा है। भारत का सफल पल्स पोलियो अभियान यह बताता है कि यदि अतिशय प्रचार और श्रेय लेने की होड़ न मचे, तो बहुत सारी चीजों को दलगत राजनीति से बचाया जा सकता है।
पल्स पोलियो अभियान की सबसे बड़ी खासियत थी, इसे लागू करने का तरीका। पहले की तरह यह नहीं हुआ कि एक कार्यक्रम बना और उसे सरकारी व गैर-सरकारी स्वास्थ्य तंत्र के हवाले कर दिया गया। सरकार यह कह सकती थी कि इसे सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए पूरे देश में लागू किया जाएगा। अगर ऐसा किया जाता, तो पहले से ही भीषण तौर पर अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बनता। इसके बजाय दुनिया भर से मिल रही उन सिफारिशों को स्वीकार किया गया, जो कह रही थीं कि पोलियो उन्मूलन के लिए एक अलग व्यवस्था बनाए जाने की जरूरत है। जल्द ही इस अभियान के लिए 12 लाख वैक्सीनेटर्स और 1.8 लाख निरीक्षक नियुक्त किए गए, जिन्हें प्रशिक्षण के बाद बच्चों को पोलियो ड्रॉप देने के लिए देश भर में तैनात कर दिया गया।
वैसे, पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था से अलग सुबह से शाम तक सिर्फ वैक्सीन देने के लिए लोगों को नियुक्त करने का यह तरीका भारत में पहली बार पल्स पोलियो अभियान में नहीं अपनाया गया। देश में आधुनिक वैक्सीन का इतिहास ही इसी से शुरू होता है। भारत में सबसे पहले जो वैक्सीन लोगों को लगाई गई, वह चेचक की थी। 1802 में जब यह वैक्सीन भारत पहुंची, तो ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने पहले से ही इसके लिए देश में वैक्सीनेटर्स नियुक्त करके उन्हें टीका लगाने का प्रशिक्षण दे दिया था। यह वह तरीका था, जो कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए आसानी से अपनाया जा सकता था। भारत में इसके टीकाकरण की रणनीति बनाने की बातें पिछले साल सितंबर में ही शुरू हो गई थीं। तभी यह भी स्पष्ट हो गया था कि यह टीका हमें दिसंबर के बाद ही उपलब्ध हो सकेगा। यानी, इस बीच पर्याप्त समय था, जब लोगों को नियुक्त करके उन्हें प्रशिक्षण दिया जा सकता था। लेकिन इस काम को उस सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य तंत्र के हवाले करना ही बेहतर समझा गया, जो कोविड मरीजों की लगातार बढ़ती संख्या के कारण पहले से दबाव में था। अमेरिका और ब्रिटेन की टीकाकरण रणनीति को उस देश में भी जस का तस लागू करने की कोशिश की गई, जहां मरीजों के लिए अस्पतालों में बिस्तर उपलब्ध नहीं थे, न पर्याप्त वेंटिलेटर थे और न ही ऑक्सीजन सिलेंडर। देश में डॉक्टरों और नर्सों की कमी के चर्चे तो कोविड काल की शुरुआत से ही हो रहे हैं। और अब, इन्हीं सबके कंधों पर एक और बोझ डाल दिया गया- पूरे देश को टीके लगाओ। इसी का नतीजा था कि बुजुर्ग वैक्सीन लगवाने के लिए उन्हीं अस्पतालों में जाने को मजबूर थे, जो कोरोना संक्रमण के लिहाज से सबसे संवेदनशील जगह कहे जा सकते हैं।
इस वजह से कितने लोगों के लिए समस्या खड़ी हुई, हम यह ठीक से नहीं जानते, लेकिन इन सबसे बचा जा सकता था, यदि टीकाकरण की रणनीति देश की परिस्थितियों और स्वास्थ्य तंत्र की सच्चाइयों को स्वीकार करते हुए बनाई गई होती या पल्स पोलियो जैसे पिछले अभियानों से कुछ सबक ही ले लिया गया होता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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