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नजरिया

सिर्फ सवाल उठाने से ज्यादा जरूरी समाधान खोजना

सुधांशु त्रिवेदी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाजपाPublished By: Naman Dixit
Fri, 04 Jun 2021 11:37 PM
सिर्फ सवाल उठाने से ज्यादा जरूरी समाधान खोजना

आज विश्व मानव जाति के ज्ञात इतिहास की सबसे व्यापक त्रासदी का सामना कोरोना महामारी के रूप में कर रहा है। भारत के लिए चुनौती और बड़ी थी, क्योंकि यहां विशाल जनसंख्या है और अपेक्षाकृत उपयुक्त स्वास्थ्य संरचना का अभाव था। स्वास्थ्य सुविधाएं व मूलभूत ढांचा तो तत्काल नहीं बन सकता, क्योंकि इसमें दशकों लगते हैं। मोदी सरकार ने आने के बाद अनेक मेडिकल कॉलेज, एम्स खोले, मेडिकल की सीटें बढ़ाईं, पर परिणाम आने वाले वर्षों में दिखेंगे।
तात्कालिक रूप से वैक्सीन की जरूरत थी, सारे विश्व के साथ भारत के वैज्ञानिक वैक्सीन के अनुसंधान में दिन-रात लगे थे। यह समय था, जब भारत के जन-जन को मन से इस अभियान का साथ देना था, परंतु यह विडंबना है कि भारत में जन-प्रतिनिधियों ने ही, जो विपक्ष में थे, अपने आचरण से इस संपूर्ण प्रक्रिया को हतोत्साहित किया। सर्वप्रथम 15 अगस्त, 2020 को प्रधानमंत्री ने कहा कि वैक्सीन का अनुसंधान अच्छी गति से चल रहा है और अगले वर्ष के प्रारंभ (यानी जनवरी 2021) तक वैक्सीन प्राप्त हो सकती है। तब विपक्ष के ज्यादातर लोग, जो शायद जैविक व रसायन विज्ञान का ककहरा भी नहीं जानते, अचानक विशेषज्ञ-वैज्ञानिक बन गए कि इतने कम समय में हो ही कैसे सकता है। पर हम सबने देखा कि इसी अवधि में भारत में वैक्सीन बनी। जब जनवरी में टीकाकरण प्रारंभ हुआ, तब एम्स के निदेशक समेत देश के अनेक नामचीन डॉक्टरों ने टीका लगवाकर स्वास्थ्य व सुरक्षाकर्मियों के लिए अभियान का प्रारंभ किया। विपक्ष ने फिर एक बार नकारात्मकता का दूसरा चेहरा दिखाया। उसके बयान आम जनता में भ्रम और भय पैदा कर रहे थे। सरकार ने व्यवस्थित और क्रमबद्ध ढंग से स्वास्थ्यकर्मी, फ्रंटलाइन वर्कर, सुरक्षाकर्मी, 60 वर्ष और फिर 45 वर्ष से अधिक आयु वालों का टीकाकरण शुरू कराया। पर उसी क्रमबद्ध तरीके से अनेक नेताओं ने राजनीति का स्तर गिराया। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने राज्य के मुखिया होते हुए भी वैक्सीन को लेकर भ्रामक बयान दिए, अखिलेश यादव ने यह तक कह दिया, ‘भाजपा की वैक्सीन हम नहीं लगवाएंगे।’ अनेक नेता व राज्यों के स्वास्थ्य मंत्री अनर्गल संदेह की बातें करने लगे। राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र व बंगाल के नेता मानो संदेह के कोहरों की सियासत में अपनी राजनीति की चमक देख रहे थे। जब यह दूसरी लहर कहर बनकर गिरी, तब अचानक सब वैक्सीन और स्वायत्तता की मांग करने लगे। जब खरीदने की स्वायत्तता दी गई, तब फिर विरोध करने लगे कि केंद्र ही खरीदे। ध्यान दीजिए, भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार 29 प्रतिशत लोग अभी भी निरक्षर हैं, उनमें से दो-तिहाई से अधिक ग्रामीण हैं, वहां टीकाकरण को लेकर भ्रम पैदा करना कितना घातक है? यदि भ्रम और भय नहीं पैदा होता, तो जनवरी से टीकाकरण तेज गति से होता, तो उत्पादन भी तेज होता, क्योंकि वैक्सीन बिना खपत के बहुत लंबे समय तक बहुत बड़ी मात्रा में संरक्षित नहीं की जा सकती। भय, भ्रम न होता, तो शायद आज कहीं अधिक लोग टीका लगवा चुके होते। जब आया ऑक्सीजन का संकट। 1अप्रैल से पहले भारत के अस्पताल में ऑक्सीजन की जितनी खपत थी, वह प्रथम सप्ताह में छह गुना और अप्रैल मध्य आते-आते 15 गुना तक पहुंच गई। इतनी अप्रत्याशित वृद्धि पर भी देश-विदेश से लेकर भारत के उद्योगपतियों तक के सहयोग से सरकार ने आपूर्ति की कोशिश की। सारे विश्व में चिकित्सा जगत के आंकडे़ जब से उपलब्ध हैं, तब से 15 दिन में 15 गुना जरूरत किसी चीज की नहीं बढ़ी है। दिल्ली सरकार के पास प्राप्त होने वाली ऑक्सीजन के भंडारण की समुचित व्यवस्था तक नहीं थी, पर मुख्यमंत्री रोज टीवी पर आकर मांग करते रहे। यहां तक कह दिया गया कि वैक्सीन का फॉर्मूला सभी कंपनियों को दे दें। वैक्सीन जैसी उच्च गुणवत्ता की चीज का उत्पादन सिर्फ फॉर्मूला ही नहीं, प्रोसेसिंग, उपकरण, भंडारण इत्यादि अनेक मानकों पर निर्भर करता है। अमेरिका ने भी पैरासिटामोल जैसी सामान्य दवा पिछले वर्ष भारत से आयात की थी, वैक्सीन कोई चूरन का फॉर्मूला नहीं है। यह भी कह दिया गया कि बच्चों की वैक्सीन विदेश भेज दी गई। अब ‘कोविड को मोविड’ कहना राजनीतिक विद्वेष की पराकाष्ठा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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