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महिलाओं और नौनिहालों की कैसे बढ़ाई जाए सुरक्षा

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के नए आंकड़े महिला और बाल अपराध की स्याह तस्वीर दिखाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 में महिलाओं के खिलाफ विभिन्न अपराधों से जुड़े कुल 4,45,256 मामले दर्ज किए गए...

महिलाओं और नौनिहालों की कैसे बढ़ाई जाए सुरक्षा
Amitesh Pandeyरंजना कुमारी, निदेशक, सेंटर फॉर सोशल रिसर्चMon, 04 Dec 2023 10:57 PM
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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के नए आंकड़े महिला और बाल अपराध की स्याह तस्वीर दिखाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 में महिलाओं के खिलाफ विभिन्न अपराधों से जुड़े कुल 4,45,256 मामले दर्ज किए गए, जो साल 2021 और 2020 में क्रमश: 4,28,278 और 3,71,503 थे। इनमें से भी अधिकांश मामले पति या परिजनों द्वारा की गई क्रूरता (31.4 फीसदी) के हैं, जिसके बाद अपहरण (19.2 प्रतिशत) के मामले दर्ज किए गए। बलात्कार के प्रयास से जुड़े 18.7 फीसदी और बलात्कार के 7.1 प्रतिशत मामले पिछले साल सामने आए हैं। प्रति एक लाख महिला जनसंख्या पर अपराध की जो दर वर्ष 2021 में 64.5 प्रतिशत थी, वह 2022 में बढ़कर 66.4 हो गई है। इसी तरह, बच्चों के खिलाफ अपराध में भी 2021 की तुलना में करीब आठ फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिनमें से अधिकांश मामले अपहरण (45.7 प्रतिशत) और पॉक्सो ऐक्ट (39.7 प्रतिशत) के हैं।
इन आंकड़ों से बहुत हैरानी नहीं होती। पूरे वर्ष जिस तरह से मीडिया में खबरें आती रहीं, उससे यह अंदाजा था ही कि महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं। हालांकि, इस वृद्धि की एक वजह कोविड-प्रतिबंधों की विदाई भी है। साल 2021 तक कोरोना महामारी के कारण कई तरह के प्रतिबंध आयद थे और लोग सीमित संख्या में घरों से बाहर निकल रहे थे। ऐसे में, महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध भी दबे रह गए थे, लेकिन 2022 में जैसे ही पूरा तंत्र व्यवस्थित हुआ, दर्ज मामलों की संख्या में उछाल आ गया। 
आखिर इन पर कैसे लगाम लगे? सबसे पहले, लंबित मुकदमों का जल्द निपटारा होना चाहिए। कानून होने के बावजूद महिला या बच्चों से जुड़े अपराध इसलिए कम नहीं हो रहे, क्योंकि लोगों को न्याय मिलने में देर हो जाती है। इससे कानून बेअसर साबित होने लगता है। ऐसा नहीं है कि अभी महिलाओं से जुड़े जो कानून हैं, उनमें सुधार की गुंजाइश नहीं है, लेकिन उनके उचित क्रियान्वयन के अभाव में वे पूरी तरह से प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं। इसी तरह, महिला-सुरक्षा को सामाजिक-राजनीतिक मुद्दा बनाने की भी जरूरत है। अभी जितना ध्यान अन्य मसलों पर दिया जाता है, या महिलाओं को लेकर ही जितनी योजनाएं बनाई जाती हैं, उतनी अगर उनकी सुरक्षा पर भी बात होती, तो तस्वीर कुछ अलग होती। महिलाओं की हत्या, मारपीट, घरेलू अपराध आदि पर राजनीतिक सवाल उठने चाहिए, लेकिन इसकी कम ही चर्चा होती है। 
जन-जागरूकता बढ़ाने की दिशा में भी गंभीरता से काम होना चाहिए। महिलाओं से जुड़ी जानकारी का दायरा बढ़ाना होगा, खासकर लड़कों व पुरुषों को यह पता होना चाहिए कि औरतों से जुड़े कौन से मसले अपराध के दायरे में आते हैं। सूचना जनसंपर्क जैसे विभागों को महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को रोकने के उपाय गांव-गांव में प्रसारित करने चाहिए। सच यही है कि आज जितने मामले दर्ज हो रहे हैं, उनमें बमुश्किल 10 फीसदी हिस्सेदारी ग्रामीण भारत की है, शेष 90 फीसदी मामले महानगरों या बड़े शहरों में दर्ज हो रहे हैं। जाहिर है, पुलिस-प्रशासन को कहीं अधिक संवेदनशील बनाना होगा, विशेषकर छोटे कस्बों और गांवों में महिला अथवा बाल अपराध के मामले बिना किसी रुकावट के दर्ज हो सकें, इसकी व्यवस्था हमें करनी होगी। 
जरूरी यह भी है कि महिलाओं अथवा बच्चों को लेकर काम कर रही संस्थाओं को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। संसाधनों के अभाव में ऐसी संस्थाओं की संख्या अब घटने लगी है। इसके लिए सामाजिक क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की दरकार है। इसे महज कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीपीआर) के रहमोकरम पर छोड़ना गलत होगा। आज समाज कल्याण बोर्ड, महिला आयोग जैसी तमाम संस्थाओं के बजट बढ़ाने के प्रयास होने चाहिए। दिक्कत यह भी है कि सरकारों को जितनी पहल करनी चाहिए, उतनी वे नहीं कर रही हैं। अगर वे आगे नहीं आएंगी, तो सुधार के प्रयास परवान नहीं चढ़ सकेंगे। महिला व बाल विकास जैसे मंत्रालयों को अहम भूमिका निभानी होगी। महिला व बाल अपराधों की दर निस्संदेह कम हो सकती है, पर इसके लिए जरूरी है कि सार्वजनिक व निजी क्षेत्र समग्रता में काम करें। क्या ऐसा होगा?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) 

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