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चिकित्सा उपकरण निर्माण में हमें खरा उतरना होगा

दीपक श्रीवास्तव, प्रोफेसर, आईआईएम, तिरुचिरापल्लीPublished By: Naman Dixit
Thu, 03 Jun 2021 11:45 PM
चिकित्सा उपकरण निर्माण में हमें खरा उतरना होगा

चिकित्सा उपकरणों की स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका है। कोविड-19 महामारी ने चिकित्सा उपकरण निर्माण सहित अधिकांश उद्योगों की वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है। टेस्टिंग किट, ऑक्सीजन कंसंटेटर, वेंटिलेटर एवं अन्य जीवन रक्षक उपकरणों की महामारी के खिलाफ लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दूसरी लहर के दौरान देश  ने अत्यंत कठिन स्थिति का सामना किया है। 
अब संभावित तीसरी कोरोना वायरस लहर को लेकर भय और चिंताएं हैं। निसंदेह, इससे सामना करने के लिए एक ठोस रणनीति की जरूरत है। महामारी की स्थिति में स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु रूप से उपलब्ध कराने में चिकित्सा उपकरणों की बड़ी भूमिका होती है। आयातित चिकित्सा उपकरणों पर निर्भरता के कारण देश को महामारी में कठिन दौर का सामना करना पड़ा है। भारत में चिकित्सा उपकरण निर्माण क्षेत्र में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ-साथ छोटे और मध्यम आकार के उद्योग भी शामिल हैं। चिकित्सा उपकरण के उपभोग्य और डिस्पोजेबल श्रेणी में ज्यादातर घरेलू कंपनियां, जिसमें सुई, सीरिंज, चिकित्सकीय दस्ताने, मास्क का उत्पादन शामिल है, जो मुख्य रूप से सीमित निर्यात के साथ घरेलू खपत को पूरा करती हैं। बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चिकित्सा उपकरण उच्च-प्रौद्योगिकी श्रेणी में गिने जाते हैं। घरेलू चिकित्सा उपकरण निर्माण उद्योग में अनुसंधान एवं विकास की काफी संभावनाएं हैं। महामारी के बाद भी चिकित्सा उपकरण की मांग में तेजी आने की संभावना है। उम्रदराज लोगों की बढ़ती संख्या, आय में वृद्धि, जीवन शैली में परिवर्तन आदि के कारण घरों में स्वास्थ्य उपकरणों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम के तहत चिकित्सा उपकरणों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर देने की जरूरत है। विभिन्न राज्यों में चिकित्सा उपकरण निर्माण समूहों या पार्कों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। घरेलू उत्पादन के बढ़ने से इन उपकरणों की लागत में भी कमी आएगी। भारत सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ पहल इसके लिए उपयुक्त है, इसका पूरी तरह से लाभ लेना चाहिए। आज एक मजबूत चिकित्सा उपकरण निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत है। यह विदेशी पूंजी और अत्याधुनिक तकनीक को आकर्षित करने में कारगर सिद्ध होगा। इसके अलावा नई नौकरियों के सृजन के साथ-साथ चिकित्सा उपकरणों के निर्यात को भी बल मिलेगा। हमें गौर करना चाहिए, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में प्रगति के परिणामस्वरूप दुनिया भर में चिकित्सा उपकरणों में उल्लेखनीय प्रगति व नवाचार हुए हैं। दुनिया के अच्छे उदाहरणों से भारत को सीखना चाहिए। उपकरणों का अभाव दूसरे देशों में भी रहा होगा, लेकिन जिस तरह से भारत में लोग तरसे हैं, वह स्थिति दुबारा नहीं बननी चाहिए। नवीन उद्योग के 4.0 तकनीक (आईओटी, एआई, 3डी-प्रिंटिंग, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग) के चिकित्सा उपकरण निर्माण को प्रोत्साहन देना चाहिए। इन तकनीकों के माध्यम से उत्पादन को स्वचालित किया जा सकता है। चिकित्सा उपकरण प्रौद्योगिकी में प्रगति का सेवा की समग्र गुणवत्ता पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। यह सस्ती सेवाओं को भी सुनिश्चित करेगा। ध्यान रहे, हमारे देश में छोटे और मध्यम आकार के उद्योग के लिए वित्त एक समस्या है। अत: एक मजबूत वित्त सहायता तंत्र बनाना चाहिए। देश में कुशल कार्यबल की कम लागत पर उपलब्धता है। भारत की सूचना प्रौद्योगिकी और फार्मास्युटिकल्स उद्योग विश्व स्तर पर प्रतिस्पद्र्धी है। भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग भी बढ़ते क्षेत्रों में से एक है। इसका लाभ चिकित्सा उपकरण क्षेत्र को मिल सकता है। चिकित्सा उपकरण उत्पादन से संबंधित विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जा सकते हैं। आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचे की जरूरत है। इसके लिए ऐसे नीतिगत बदलाव भी करने होंगे, ताकि इस क्षेत्र को उत्पादन की दृष्टि से आकर्षक बनाया जा सके। हमें ध्यान देना चाहिए कि भारत को न केवल अपनी जरूरतों को पूरा करना है, बल्कि दूसरे देश भी हमसे उम्मीद लगाए हैं। वक्त आ गया है, हम सबकी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास करें। 
    (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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