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बगैर समझौता किए अब हमें पीछे नहीं हटना चाहिए

मोहन भंडारी, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड)Published By: Naman Dixit
Wed, 04 Aug 2021 12:10 AM
बगैर समझौता किए अब हमें पीछे नहीं हटना चाहिए

वार्ता का बारहवां दौर भारतीय सेना और चीनी पीएलए के कोर कमांडर के बीच संपन्न हुआ है। जिस जगह शनिवार सुबह बातचीत हुई है, उसका नाम मोल्डो है, यह जगह चुशुल के पास है, जहां मैंने कभी पलटन कमांड की थी। अभी तक कोर कमांडर की जितनी बैठकें हुई हैं, उनमें यह सबसे छोटी बैठक थी। करीब साढे़ आठ घंटे की यह बातचीत हुई है। गलवान घाटी में झड़प को साढे़ चौदह महीने बीत गए हैं। अभी तक हमारी और उनकी सेना वहां तैनात है। मैं समझता हूं कि आज के दिन लगभग 55 हजार सैनिक वहां तैनात हैं। बंदूकें, टैंक, मैकेनाइज्ड इनफेंट्री, मिसाइलें, वायुयान तैनात हैं, लेकिन यहां सेनाएं एकदम आमने-सामने नहीं हैं। पाकिस्तान के साथ लाइन ऑफ कंट्रोल पर तो हमलोग बिल्कुल आमने-सामने हैं, लेकिन चीन के साथ अभी ऐसा नहीं है, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे को देख सकती हैं, दोनों के बीच एक-दो किलोमीटर की दूरी कायम है। 
भारत का मुद्दा था कि हॉट स्प्रिंग, घोघरा और देपसांग, इन तीनों इलाकों से हम कैसे पीछे हटें? असली समस्या इन्हीं तीन जगहों पर है। इसका कारण यह है कि एक तो अक्साई चिन में चीन की सड़क देपसांग के पूर्व से जाती है, दूसरी बात, दौलत बेग ओल्डी जैसा क्षेत्र उनके लिए भी और हमारे लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, खास तौर पर हमारे लिए। यह देपसांग के बिल्कुल नजदीक है और दौलत बेग ओल्डी की ऊंचाई 18,176 फीट है। दौलत बेग ओल्डी में हमने पिछले दिनों अपने हवाई जहाज भी उतारे हैं। चीन इस इलाके में बहुत सतर्क है, क्योंकि दौलत बेग ओल्डी के पश्चिम की ओर सियाचिन ग्लेशियर पड़ता है। 
यह मुकाम सामरिक रूप से नाजुक है। भारत यहां से बगैर समझौता किए हटना नहीं चाहता है और न हटना चाहिए। इस बार की बातचीत में संयुक्त बयान सोमवार को जारी हुआ है। बातचीत सौहार्दपूर्ण रही है। दोनों पक्षों ने कहा कि जो बचे हुए विवाद हैं, घोघरा, हॉट स्प्रिंग और देपसांग से जुडे़, हम कोशिश करेंगे कि जैसे प्रोटोकॉल हम निभाते आए हैं, उसे निभाते रहेंगे। बातचीत का क्रम तेज होगा। लक्ष्य यही है कि हम लाइन ऑफ कंट्रोल पर स्थिरता चाहते हैं। वैसे मुझे चीन की इन बातों का विशेष महत्व नहीं लगता है। ये सब बस समय बिताने की बातें हैं। अंताक्षरी खेलने जैसा काम है। चीन तो बैठा हुआ है, उसे कोई जल्दी नहीं है। 
मैं यहां कहूंगा कि एक सैन्य कूटनीति होती है, जिसके तहत बातचीत भी होती है, सहमति बनती है और दस्तखत होते हैं। इस बार यही हुआ है। घोघरा और हॉट स्प्रिंग पर पहले भी बात हुई है, चीन घोघरा में कुछ पीछे हटा था। हालांकि, उसने पूरे सैनिक वापस नहीं लिए, बल्कि यहां उसने तंबू की जगह अद्र्ध-स्थायी ठिकाने बना लिए हैं। उसने मंशा जाहिर कर दी थी कि हम यहां से नहीं हटेंगे।  
जो बातचीत चल रही है, शायद वह संकेत है कि घोघरा और हॉट स्प्रिंग पर कोई बात बने, लेकिन देपसांग से चीन जाएगा, नहीं जाएगा, बड़ा प्रश्न यह है। हां, पहले पीएलए का जो नकारात्मक व्यवहार था, वह इस बार नहीं दिखा है। चीन इस बार चीजों को स्वीकार करने के प्रति थोड़ा लचीला था कि आइए, बात करते हैं। हम अपनी ओर से जोड़ सकते हैं कि बातचीत जरूरी है, क्योंकि चीन अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। एक और बात, संयुक्त बयान का यह भी अर्थ है कि आज पूरा विश्व चीन की हरकतें देख रहा है। हमारे साथ ही नहीं, वह विश्व के साथ ज्यादती कर रहा है। चीन शायद यह दिखाना चाहता होगा कि वह बातचीत को तैयार है और कम से कम दोनों देश साथ आकर विश्व को बता दें कि हम शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में हैं। लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि पहले दौर की बातचीत पिछले साल जून में हुई थी, लेकिन उससे अभी तक कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली है। हां, जब हमारे सैनिक पहाड़ियों पर चढ़ गए, तब कुछ जगहों से चीन पीछे हटने को मजबूर हुआ, लेकिन वह देपसांग से हटना नहीं चाह रहा। दरअसल, इन इलाकों से चीन के स्थायी शिविर पास हैं। जब आप सैनिक तैनात करते हैं, तब यह देखा जाता है कि किसकी सेना जल्दी पहुंच सकती है। तभी हमारे पचपन हजार सैनिक वहां तैनात हैं। अगर हम पीछे हटेंगे, तो गलती करेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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