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फिल्म बनाने वालों के लिए नई चुनौतियों का अंबार

व्यवसाय प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर का एक मॉडल है फाइव फोर्सेज, जिसका उपयोग कंपनी या उद्योग के आपूर्तिकर्ताओं और खरीदारों की ताकत जानने के लिए होता है। भारत में मनोरंजन सामग्री बनाने वाले उद्योग...

फिल्म बनाने वालों के लिए नई चुनौतियों का अंबार
Amitesh Pandeyस्वानंद केलकर, आर्थिक सलाहकारFri, 01 Dec 2023 10:47 PM
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व्यवसाय प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर का एक मॉडल है फाइव फोर्सेज, जिसका उपयोग कंपनी या उद्योग के आपूर्तिकर्ताओं और खरीदारों की ताकत जानने के लिए होता है। भारत में मनोरंजन सामग्री बनाने वाले उद्योग को भी इस मॉडल पर कसा जा सकता है। यह जरूरी भी है, क्योंकि यह उद्योग बड़े बदलावों से गुजर रहा है। 
कुछ साल पहले तक यह कारोबार दो हिस्सों में बंटा था- बड़ा परदा, यानी फिल्में बनाना, और दूसरा, छोटा परदा, यानी टीवी धारावाहिक, रियलिटी शोज आदि तैयार करना। पहले निर्माताओं की संख्या सीमित थी और उनके पास इन दोनों के अलावा विकल्प नहीं था। मगर अब ओटीटी प्लेटफॉर्म से लेकर सोशल मीडिया के लिए छोटे प्रारूप में सामग्री बनाने तक इसका विस्तार हो चुका है।
बेशक इस बदलाव को बखूबी समझा जा रहा है, पर निर्माताओं के एक वर्ग के लिए हालात मुश्किल हैं। एक फिल्म अमूमन तीन तरह से कमाई करती है- सिनेमा हॉल से, टीवी चैनलों को सैटेलाइट अधिकार बेचकर और ओटीटी प्लेटफॉर्म को डिजिटल अधिकार देकर। आज इन खरीदारों के बीच अभूतपूर्व संगम दिख रहा है, जिससे सौदेबाजी की उनकी ताकत बढ़ने लगी है।
शुरुआत सिनेमा हॉल से होने वाली कमाई से करते हैं। दो सबसे बड़ी मल्टीप्लेक्स शृंखला पीवीआर और आईनॉक्स के विलय के बाद हिंदी फिल्मों के समग्र बॉक्स ऑफिस बाजार पर इनकी संयुक्त हिस्सेदारी 43 फीसदी हो गई है। इसका अर्थ है कि फिल्म स्क्रीनिंग के लिए प्राइम स्लॉट पाने की जंग बढ़ सकती है, और मल्टीप्लेक्स कम भुगतान करने या अन्य सहायक सेवाओं के लिए फिल्म-निर्माताओं को अधिक शुल्क देने के लिए मजबूर कर सकते हैं। इसका खामियाजा छोटे व स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं को भुगतना पड़ सकता है।
सैटेलाइट कमाई की कहानी भी इससे अलग नहीं है। फिलहाल चार बड़े खिलाड़ी मैदान में हैं- जी एंटरटेनमेंट, सोनी इंडिया, वायकॉम18 और डिज्नी स्टार। हालांकि, हम नहीं जानते कि कौन-किसके साथ जाने वाला है, पर यह तय है कि दो खिलाड़ी अन्य दो में विलय करने वाले हैं, जिसके बाद कुल दो खिलाड़ी ही मुकाबले में रहेंगे। इससे सौदेबाजी की शक्ति इन्हीं खिलाड़ियों के हाथों में रहेगी, जिससे खासकर छोटे व स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं को नुकसान हो सकता है। 
रही बात डिजिटल अधिकारों से होने वाली कमाई की, तो कोरोना-महामारी के दौरान निस्संदेह ओटीटी प्लेटफॉर्म फिल्म निर्माताओं की कमाई का महत्वपूर्ण स्रोत बन गए, क्योंकि लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन सामग्री देखने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ। इसी वजह से इन प्लेटफॉर्म ने दर्शकों की मांग को पूरा करने के लिए नई सामग्रियों में अपना निवेश बढ़ाया, मगर बाद में हालात बदल गए। जैसे, कोविड प्रतिबंधों के हटने के बाद से अधिकांश प्लेटफॉर्म पर दर्शकों की संख्या प्रभावित हुई है। इससे भी खास बात यह है कि वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में काफी वृद्धि हुई है। लिहाजा यह आश्चर्य नहीं कि नेटफ्लिक्स, जो कभी पांच प्रमुख अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों के शेयर को बताने वाले ‘फैंग’ का हिस्सा था, अब इस समूह से बाहर हो गया है। साल 2021 में हुई 52 फीसदी की भारी वृद्धि के बाद 2022 में सामग्रियों पर नेटफ्लिक्स के खर्च में 11 फीसदी की गिरावट आई है, जिसके 2023 में भी बने रहने का अनुमान है। यह संकेत है कि आने वाले दिनों में ओटीटी प्लेटफॉर्म खर्च करने में कंजूसी कर सकते हैं और दर्शकों को जोड़े रखने के लिए वे बड़े बैनरों या निर्माताओं पर भरोसा करेंगे। जाहिर है, यह स्थिति भी छोटे व स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं के लिए प्रतिकूल होगी।
स्पष्ट है, भारत में कंटेंट-निर्माण के क्षेत्र में आ रहे इस बदलाव के कारण छोटे व स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं का पलायन हो सकता है, या उन्हें बड़े निवेशकों की तलाश करनी पड़ सकती है। शहर, गांव में कंटेंट निर्माण में लगे तमाम लोगों के लिए चुनौतियां बहुत बढ़ जाएंगी। इस बदलाव का एक प्रभाव फिल्म-निर्माण की पूरी शृंखला पर पड़ सकता है। अभिनेताओं को भुगतान करने से लेकर प्रचार-प्रसार, विज्ञापन, सिनेमा हॉल के टिकट आदि सबकी कीमतें प्रभावित हो सकती हैं। यह नया संतुलन कैसा रूप लेगा, यह कहना तो अभी कठिन है, पर ऐसे बदलावों का विश्लेषण करते रहना जरूरी है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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