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पक्के और अच्छे रोजगार पर संकट के बादल 

हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयूPublished By: Manish Mishra
Sun, 01 Aug 2021 09:31 PM
पक्के और अच्छे रोजगार पर संकट के बादल 

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने बीते सप्ताह की शुरुआत में रोजगार और बेरोजगारी के अनुमानों को लेकर तीसरी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की है। इसके आंकडे़ जुलाई 2019 से जून 2020 के हैं और इस शृंखला की यह तीसरी रिपोर्ट है। इसके पहले 2017-18 और 2018-19 की रिपोर्ट जारी की गई थी। 2017-18 के अनुमानों ने बेरोजगारी में तेज वृद्धि दिखाई थी। 2011-12 और 2017-18 के बीच श्रमिकों की संख्या में 1.5 करोड़ की गिरावट हमारे श्रम बाजार की अनिश्चित प्रकृति एवं रोजगार संरचना के बिगड़ते हालात की ओर इशारे करती है। 
पीएलएफएस-3 (2019-20) के शुरुआती नतीजे बताते हैं कि हालात बदतर हुए हैं। ये अनुमान उस अवधि के हैं, जब अर्थव्यवस्था विकास में सुस्ती और वास्तविक मजदूरी में गिरावट के दौर से गुजर रही थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलनात्मक रूप से साप्ताहिक अनुमानों पर भले ही बेरोजगारी दर 8.8 प्रतिशत में कोई बदलाव न दिखता हो, लेकिन 2018-19 से बेरोजगारों की संख्या 40 लाख तक बढ़ गई है। बेरोजगारी दर केवल एक संकेतक है। किसी भी ऐसी अर्थव्यवस्था में, जहां आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी में रह रहा हो, बेरोजगारी एक बोझ है, जिसे बहुत कम लोग सह सकते हैं। ऐसा क्यों है कि आधिकारिक बेरोजगारी अनुमान अर्थव्यवस्था में निठल्ले बैठे लोगों को मापने का उपयुक्त पैमाना नहीं है। एक बेहतर संकेतक काम करने के घंटे हैं। इनमें सभी जगह तेज गिरावट दिखी है, जो पुख्ता संकेत है कि जिन्हें कुछ काम मिला भी, उनके रोजगार के मौके कम हुए हैं। 
 
आर्थिक गतिविधियों के कमजोर होने से कई लोग तकलीफदेह काम की तलाश के लिए मजबूर हुए हैं। नतीजतन, 2019-20 में कुल रोजगार संख्या में एक साल पहले की तुलना में चार करोड़, 30 लाख की वृद्धि हुई। चूंकि यह ऐसे समय हुआ, जब अर्थव्यवस्था सुस्त हो रही थी, अन्यथा इस संख्या की विवेचना करना इसे गलत तरीके से पढ़ने के बराबर होता। बहरहाल, संख्या से परे, रोजगार अनुमान एक बड़ी चिंता की ओर इशारा करते हैं : भारत का रोजगार ढांचा बदतर होता जा रहा है। तेजी से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की एक महत्वपूर्ण विशेषता रोजगार की बदलती संरचना होती है, जिसमें श्रमिक कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों, जैसे खेती से अन्य क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं। वैसे तो भारत में 1970 के दशक से ही समग्र रोजगार में कृषि की भागीदारी घटी है, 2004-05 के बाद श्रमिकों की संख्या में बड़ी गिरावट आनी शुरू हुई। यह गिरावट काफी तेज थी और 2017-18 तक जारी रही। 2018-19 में कृषि श्रमिकों की संख्या एक वर्ष पहले की तुलना में अपरिवर्तित रही, पर 2019-20 में तीन करोड़ 20 लाख की तेज वृद्धि दर्ज की गई है। दूसरे शब्दों में, उस वर्ष श्रमिकों में हुई वृद्धि के लगभग तीन-चौथाई हिस्से का आधार कृषि बनी। यह पांच दशकों में पहली बार है, जब 2004-05 से जारी अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव के उलट कृषि में श्रमिकों की हिस्सेदारी बढ़ी। यह चिंता का विषय है।
संकटपूर्ण रोजगार आमतौर पर महिलाओं, बच्चों व वृद्धों की उच्च रोजगार स्थिति को दर्शाते हैं, यानी परिवार के लोग वास्तविक आय बनाए रखने के लिए आरक्षित श्रम-बल को श्रम बाजार में भेजते हैं। 1999-2000 से 2004-05 तक यही हुआ था, जब अर्थव्यवस्था में इसी तरह के संकटपूर्ण हालात थे। भारत के रोजगार ढांचे में इस समय भी वही स्थिति दिखी। नीचे से ऊपर तक, ज्यादा महिलाओं के रोजगार में आने के साथ ही कृषि में मजदूरों की वापसी हुई। यह रोजगार घटने का स्पष्ट संकेत है। इसका अर्थ यह है कि कृषि ने अन्य क्षेत्रों से बेरोजगार हुए लोगों को अपनाया है, लेकिन कृषि क्षेत्र भी संकट में है। कृषि आय में गिरावट हुई है और यह क्षेत्र उनको शरण देने में असमर्थ है, जिन्हें कहीं और नौकरी नहीं मिली है।
पीएलएफएस का अनुमान प्रारंभिक चेतावनी है। 2019-20 की चार तिमाहियों में से पहली तीन लॉकडाउन से अप्रभावित थीं। इसका अर्थ यह भी है कि महामारी से पहले भी अर्थव्यवस्था में ढांचागत रुकावटें थीं। आर्थिक गतिविधियां फिर बहाल हो सकती हैं, लेकिन आर्थिक विकास (उपयोगी और लाभकारी नौकरियों के सृजन) के बिना किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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