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बदलाव के बुरे दौर से गुजरती हमारी परिवार संस्था

भारत डोगरा, सामाजिक कार्यकर्ताPublished By: Naman Dixit
Wed, 01 Sep 2021 03:41 AM
बदलाव के बुरे दौर से गुजरती हमारी परिवार संस्था

परिवार को समाज की सबसे बुनियादी इकाई माना गया है, पर पिछले कुछ दशकों में आश्चर्यजनक तेजी से विश्व के अनेक देशों में परिवार संबंधी बदलाव हुए हैं। हालांकि, यह स्थिति धनी और पश्चिमी देशों में कहीं अधिक तेजी बदली है, पर कुछ विकासशील देशों में भी ये बदलाव देखे जा सकते हैं। इन बदलावों का एक महत्वपूर्ण पक्ष संबंधों का टूटना है। तलाक की दर कितनी प्रतिशत है? इसे प्राय: इस आधार पर नापा जाता है कि 100 या 1,000 विवाहों में कितने विवाह का अंत तलाक में हुआ। जहां भारत, पेरू, श्रीलंका जैसे देशों में यह दर अभी तक एक प्रतिशत से कम है, वहीं यूरोप के अनेक देशों व अमेरिका जैसे विकसित देशों में यह दर 40 से 60 प्रतिशत के बीच है। वैसे विश्व स्तर पर देखें, तो पिछले लगभग 60 वर्षों में तलाक दर में लगभग 250 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।
एक दूसरा बड़ा बदलाव यह है कि अनेक देशों में बड़ी संख्या में बाल-जन्म वैवाहिक संबंधों से बाहर हो रहा है व इस प्रवृत्ति में पिछले कुछ दशकों में तेज वृद्धि हुई है। वर्ष 1990 में अमेरिका में 28 प्रतिशत बाल-जन्म वैवाहिक संबंध के बाहर हो रहे थे, जबकि हाल के समय में यह प्रतिशत 40 तक पहुंच गया है। ओईसीडी धनी देशों का समूह है। इसमें औसतन वैवाहिक संबंध से बाहर का जन्म 40 प्रतिशत है। मैक्सिको में यह 69 प्रतिशत है, आयरलैंड में 71 प्रतिशत व चिली में 74 प्रतिशत है। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी धनी देशों में यह प्रवृत्ति है। इजरायल, जापान और कोरिया में मात्र दो से तीन प्रतिशत जन्म विवाह के बाहर हैं। अनेक विकासशील देशों में इससे भी कम है।
एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अकेले रहने की प्रवृत्ति में तेज वृद्धि हुई है। पिछले 50 वर्षों में मात्र एक व्यक्ति के परिवार में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। स्वीडन व नॉर्वे में 50 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जो मात्र एक व्यक्ति (पुरुष या स्त्री) की इकाई हैं। पारिवारिक बदलावों में तेज वृद्धि के आधुनिक दौर में इस बारे में अधिक सावधानी व सजगता की जरूरत है। समाज व देश में इस बारे में पर्याप्त व सुलझा हुआ विमर्श होना चाहिए कि हम किस दिशा में जा रहे हैं और हमें किस दिशा में जाना चाहिए। सही स्थिति की जानकारी प्राप्त करने के लिए इस विषय पर सुलझे हुए अध्ययन व सर्वेक्षण होने चाहिए।
हालांकि, जो अकेले या एक व्यक्ति के परिवार में रहना चाहते हैं, उनकी स्वतंत्रता का सम्मान भी करना चाहिए, पर कुल मिलाकर समाज की दिशा यह होनी चाहिए कि पारिवारिक संबंधों की प्रगाढ़ता को बढ़ाना है, परिवारिक संबंधोें को मजबूत करना है। तलाक की आशंका को न्यूनतम करना चाहिए, पर केवल यह पर्याप्त नहीं है। जरूरी बात तो यह है कि वैवाहिक संबंधों में खुशहाली हो और यह लैंगिक समानता पर आधारित हों। दूसरी ओर, जहां प्रयास करने पर भी यह संबंध खुशहाली और न्याय पर आधारित न हो, वहां तलाक की राह को खुला रखना भी जरूरी है। अत्याचार किसी भी स्थिति में सहनीय नहीं है व अत्याचार, अन्याय आधारित संबंधों में घुटते रहने से तो तलाक ही बेहतर है।
बच्चों को यथासंभव माता-पिता, दोनों का भरपूर प्यार व साथ मिले, इसके लिए प्रयास करने चाहिए। बच्चों के सही व स्वस्थ विकास के लिए पारिवारिक संबंधों की प्रगाढ़ता बहुत जरूरी है। परिवार की मजबूती, खुशहाली और प्रगाढ़ता के लिए सभी पारिवारिक संबंधों में जोर-जबरदस्ती, शारीरिक व भावनात्मक हिंसा को पूरी तरह समाप्त करना जरूरी है। नशे को परिवार से पूरी तरह दूर रखने का प्रयास करना चाहिए। परिवारों में वृद्ध सदस्यों की भली-भांति देखरेख होना और उन्हं सम्मानजनक स्थिति देना भी परिवार के लिए बहुत जरूरी है। परिवार में उनका उपयोग बच्चों को अच्छे संस्कार प्रदान करने के लिए होना भी बहुत जरूरी है। परिवार के माध्यम से बच्चों में सभी भेदभाव समाप्त करने, सद्भावना और एकता, ईमानदारी, न्याय, मेहनत, कर्तव्यनिष्ठा जैसे महत्वपूर्ण संस्कारों की नींव मजबूत करनी चाहिए। जैसा कि अनेक देश के अध्ययनों से सामने आ रहा है, बचपन के अनुभवों का भावी नागरिकों के गुण-अवगुण पर बहुत असर पड़ता है। परिवार की इस व्यापक और दूरगामी भूमिका को देखते हुए परिवार सुधार पर समुचित ध्यान देना बहुत जरूरी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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