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बहु-आयामी गरीबी की बढ़ती चुनौती से मुकाबला

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री Neelesh Singh
Tue, 30 Nov 2021 09:38 PM
बहु-आयामी गरीबी की बढ़ती चुनौती से मुकाबला

बहु-आयामी गरीबी की चुनौती से संबंधित नीति आयोग की 26 नवंबर की रिपोर्ट इन दिनों गंभीरतापूर्वक पढ़ी जा रही है। इस बहु-आयामी गरीबी सूचकांक (मल्टी-डायमेंशनल पोवर्टी इंडेक्स या एमपीआई) में यह तथ्य सामने आया है कि देश में गरीबी सबसे बड़ी आर्थिक-सामाजिक चुनौती बन गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश देश के सर्वाधिक गरीब आबादी वाले राज्य हैं। बिहार में 51.91 प्रतिशत, झारखंड में 42.16 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 37.79 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 36.65 प्रतिशत और मेघालय में 32.67 प्रतिशत आबादी गरीब है। इस सूचकांक के तहत केरल में 0.71 प्रतिशत, गोवा में 3.76 प्रतिशत, तमिलनाडु में 4.89 प्रतिशत और पंजाब में 5.59 प्रतिशत जनसंख्या गरीब पाई गई है। 
इसमें दो मत नहीं है कि कोविड-19 ने भारत में गरीबी और भूख की चुनौती को बढ़ाया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2005-06 में भारत में 51 फीसदी लोग गरीब थे, 2015-16 में यह 27.9 फीसदी रह गया और इसमें लगातार कमी आ रही थी। कोरोना के एक साल ने देश को गरीबी के मामले में कई वर्ष पीछे धकेल दिया। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2020 में कोविड-19 संकट के पहले दौर में करीब 23 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जा चुके थे। ये वे लोग हैं, जो प्रतिदिन राष्ट्रीय न्यूनतम पारिश्रमिक 375 रुपये से भी कम कमा रहे हैं। इसी तरह अमेरिकी शोध संगठन प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि कोरोना महामारी ने भारत में बीते साल 7.5 करोड़ लोगों को गरीबी के दलदल में धकेल दिया है। 
यदि कोरोना काल में सरकार ने गरीबों को राहत देने के सफल अभियान नहीं चलाए होते, तो देश में बहु-आयामी गरीबी और बढ़ी हुई दिखाई देती। स्थिति यह है कि देश की दो तिहाई आबादी को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के दायरे में लाया गया है। अप्रैल 2020 से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना लागू की गई और इससे देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मिल रहा है, यह योजना मार्च 2022 तक के लिए बढ़ाई गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक, जनधन, आधार और मोबाइल के कारण गरीब व कमजोर वर्ग के करोड़ों लोग डिजिटल दुनिया से जुड़कर प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हो रहे हैं। वर्ष 2020 में सरकार द्वारा घोषित आत्मनिर्भर भारत अभियान से 40 करोड़ से अधिक गरीब वर्ग के लोगों तक उनके खातों में सीधी राहत पहुंचाई गई। यह भी महत्वपूर्ण है कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिये अगस्त 2021 तक 90 करोड़ से अधिक लाभार्थी फायदा ले चुके हैं। 
निश्चित रूप से इस समय देश में लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार के साथ-साथ उनके जीवन-स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में लंबा सफर तय करना है। 15वें वित्त आयोग ने पहली बार स्वास्थ्य के लिए उच्च-स्तरीय कमेटी गठित की थी। इस कमेटी ने स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने की जो रिपोर्ट दी है, उसे क्रियान्वित करना होगा। चूंकि कोविड-19 के कारण देश में डिजिटल शिक्षा की जरूरत बढ़ गई है और इसकी अहमियत रोजगार में भी बढ़ गई है, इसलिए वंचित वर्ग के युवाओं के लिए रोजगार के मौके जुटाने के लिए एक ओर सरकार द्वारा डिजिटल शिक्षा के रास्ते की कमियों को दूर करना होगा, तो दूसरी ओर, कौशल प्रशिक्षण के साथ नई योग्यता अर्जित करनी पड़ेगी। 
राज्यों में बहु-आयामी गरीबी कम करने के लिए विशेष रणनीतिक उपाय किए जाने जरूरी हैं। हम उम्मीद करेंगे कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सामुदायिक रसोई की व्यवस्था को मजबूत बनाकर उन जरूरतमंदों के लिए भोजन की कारगर व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी, जिन्हें पीडीएस का लाभ नहीं मिल पा रहा है। सामुदायिक रसोई योजना से गरीब महिला, बच्चों, बेघरों, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों और औद्योगिक व निर्माण स्थलों पर काम करने वाले कमजोर वर्ग के लोगों तक इसका सीधा लाभ पहुंचाया जाएगा। साथ ही,  वन नेशन-वन राशन कार्ड की योजना को कारगर बनाया जाएगा। उम्मीद है कि देश में गरीबी, भूख और कुपोषण खत्म करने के लिए पोषण अभियान-2 को पूरी तरह सफल बनाया जाएगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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