DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कंपनियां दोहरा रवैया छोड़ें तो साइबर अपराध घटे

अबाध अभिव्यक्ति में सक्षम बनाने वाले सोशल मीडिया का अपना स्याह पहलू है। सुप्रीम कोर्ट में चल रहा चेन्नई का एक मामला इसकी बानगी है। एनिमल वेलफेयर बोर्ड द्वारा जल्लीकट्टू मामले में नियुक्त दो पर्यवेक्षकों को सोशल मीडिया पर धमकियां दी गईं। इस संदर्भ में दर्ज कराई अपनी शिकायतों पर कोई कार्रवाई न होते देख उन्होंने दो जनहित याचिकाएं दायर कर सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने के लिए ‘आधार’ को अनिवार्य बनाने की मांग की। लेकिन मेरी नजर में आधार/केवाईसी को अनिवार्य बनाए जाने की मांग अदूरदर्शिता भरी है, क्योंकि ऐसे अपराधी देश की सीमा तक महदूद नहीं होते हैं। फिर सुरक्षित डाटा साझा करने के गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। 

बहरहाल, नुकसानदेह सामग्रियों और उनके मनमाने सर्कुलेशन के नियमन की आवश्यकता है। जिस तरह कोई भी एजेंसी किसी गैर-कानूनी गतिविधि के वास्ते अपनी जगह के इस्तेमाल की इजाजत देने के लिए उत्तरदायी होती है, उसी प्रकार मध्यवर्ती संस्थाएं (तकनीकी कंपनियां) भी यदि आपत्तिजनक पोस्ट के खिलाफ कोई सुधारपरक कदम नहीं उठातीं, तो वे भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। विकल्पों की तलाश में हाईकोर्ट के उचित हस्तक्षेप ने निजता पर आक्रमण, अभिव्यक्ति की आजादी में कटौती, न्यायिक अतिरेक और अति-नियमन से जुड़े कई सवालों को जन्म दिया है। पर इन तमाम दलीलों के पीछे एक ही बात छिपी है, गैर-कानूनी सामग्रियों के किसी बाहरी नियमन का विरोध। 

साल 2015 से ही मैं एक जनहित याचिका (प्रज्वला मामला) के जरिए बाल यौन उत्पीड़न से जुड़ी सामग्रियों और रेप व गैंगरेप से जुड़ी तस्वीरों-वीडियो के सोशल मीडिया पर मानमाने और बेलगाम प्रसारण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जिरह करती रही हूं। इस मुकदमे के तहत और ऐसी सामग्रियों पर प्रसारण पूर्व कारगर रोक के तकनीकी समाधान तलाशने के लिए गठित कमिटी की सदस्य के तौर पर भी मैंने तकनीकी कंपनियों के साथ काम किया है। किसी भी नियमन का विरोध और शून्य जिम्मेदारी की वकालत करने वाली ये कंपनियां निजता व अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देती हैं। श्रेया सिंघल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बिना पर ये (तकनीकी कंपनियां) दावा करती हैं कि उनकी कोई जवाबदेही नहीं है। लेकिन यह दलील पूरी तरह से गलत है। आईटी कानून की धारा 79 कुछ मामलों में तकनीकी कंपनियों को रियायत देती है, मगर यह छूट स्पष्टत: अपवाद स्वरूप है और केंद्र सरकार इस संदर्भ में अलग से दिशा-निर्देश लागू कर सकती है। 

सोशल मीडिया पर निगरानी नदारद है और गोपनीयता एक विकल्प है। यहां यूजर की निजता की अनदेखी कर उसकी निजी रुचि जानने के लिए अल्गोरिद्म के विकास में अधिकतम संसाधन झोंके जाते हैं, ताकि विज्ञापनों को अधिक समर्थ बनाया जा सके। कथित तौर पर सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए इसे विकसित किया जाता है, वास्तव में यह उनके आर्थिक हितों को बढ़ावा देने की चाल है। यह सचमुच भयावह है कि ये कंपनियां ऐसे किसी कदम में निवेश करने से बचती हैं, जो गैर-कानूनी सामग्रियों की उत्पत्ति की पहचान कर सकें। 

प्रज्वला केस के अध्ययन के सिलसिले में हमने यह पाया कि दुनिया भर में कम से कम बाल यौन शोषण से संबंधित नुकसान को कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। अमेरिका में यह अनिवार्य है कि अपने पोर्टल पर इस तरह की सामग्री प्रकाशित करने वाली तमाम तकनीकी कंपनियां ‘नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग ऐंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रेन’ को सूचित करेंगी। कनाडा में तो माइक्रोसॉफ्ट द्वारा विकसित क्रॉलर तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि बाल यौन उत्पीड़न से जुड़ी सामग्रियों को अलग किया जा सके। पर भारत में ये किन कारणों से कोई ठोस कार्रवाई करने से इनकार करती हैं, कहना मुश्किल है। जैसे, फोटो डीएनए टेक्नोलॉजी (तस्वीरें पहचानने की तकनीक) का लाइसेंस नि:शुक्ल देने वाली माइक्रोसॉफ्ट  ने भारत को यह लाइसेंस देने से मना कर दिया और वह इसे वैसा ही सॉफ्टवेयर बेच रही है। ये कंपनियां अमेरिका में जो कदम अनिवार्य रूप से उठाती हैं, वही भारत में उठाने से इनकार कर देती हैं। वक्त आ गया है कि तकनीकी विकास से जुड़ी कंपनियां अपना दोहरापन छोड़ें और कारगर कदम उठाएं।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:hindustan nazaria coluumn on 11 september