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दिल्ली में निर्णायक होगी मध्य प्रदेश की हार-जीत

yatindra singh sisodia

मध्य प्रदेश की पहचान भारतीय जनता पार्टी के गढ़ के रूप में की जाने लगी है, हालांकि राज्य में कांग्रेस खत्म नहीं हुई है। चूंकि मध्य प्रदेश दो धु्रवीय राज्य है, इसलिए एक पार्टी का भाग्य दूसरी पार्टी के प्रदर्शन के लगभग विपरीत ही रहता है। यहां वर्ष 1996 से 2014 तक हुए लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के पास ही अधिकांश सीटें रही हैं, केवल 2009 लोकसभा चुनाव अपवाद है, जब कांग्रेस राज्य में 29 में से 12 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। बहरहाल, वर्तमान लोकसभा चुनाव विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह चुनाव विधानसभा चुनाव 2018 की पृष्ठभूमि में हो रहा है।

विगत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 15 वर्ष बाद भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया है। इस बार लोग ज्यादा मुखर नहीं हैं और इसलिए किसी परिणाम का अनुमान लगाने के लिए मतदाताओं के मूड को भांपना मुश्किल है। भाजपा चुनाव 2014 में 29 में से 27 सीटें जीतकर मध्य प्रदेश में मैदान मार ले गई थी, उसे कुल प्राप्त मतों में भी 20 प्रतिशत की भारी बढ़त हासिल हुई थी। कांगे्रस के केवल दो ही दिग्गज अपनी सीट बचा पाए थे। उस चुनाव में मोदी लहर थी और यूपीए की तत्कालीन केंद्र सरकार के खिलाफ असाधारण सत्ता विरोधी भावना भी थी। इसके अलावा, वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव मध्य प्रदेश में वर्ष 2013 में हुए विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में हुए थे। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था और राज्य में उसको लगातार तीसरी बार सरकार चलाने का जनादेश मिला था।

इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  के नेतृत्व में केंद्र सरकार की उपलब्धियों, विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और मुख्य कल्याणकारी योजनाओं के परिणामों को भुनाना भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान की रणनीति रही है। कांग्रेस की ओर से किसान समाज को लुभाने के लिए न्याय योजना की घोषणा हुई है। इसे बड़ी संख्या में मतदाताओं का ध्यान खींचने की कोशिश कहा जा सकता है। मध्य प्रदेश में किसानों को ऋण माफी का लाभ पहले ही मिल चुका है, जिसका वादा कांग्रेस ने वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के समय किया था। वर्तमान लोकसभा चुनाव बहुत आक्रामक और अप्रिय अभियानों का गवाह भी है। अभी मध्य प्रदेश से भाजपा के 26 सांसदों में से 14 को टिकट देने से इनकार कर दिया गया है, इन सांसदों की रिपोर्ट नकारात्मक थी। कांग्रेस ने अनेक नए चेहरों को मैदान में उतारा है। दोनों ही प्रमुख पार्टियों- भाजपा और कांग्रेस में स्वाभाविक ही टिकटों के बहुत प्रत्याशी रहे हैं।

मध्य प्रदेश में जिन सांसदों के टिकट काट दिए गए हैं, उनमें से ज्यादातर ने सार्वजनिक रूप से रोष का इजहार किया है। हालांकि लोकसभा चुनाव में ऐसा विरोध कोई खास काम नहीं करता, लेकिन जब करीबी या कांटे की टक्कर हो, तब यह पार्टी की संभावनाओं पर विपरीत असर डाल सकता है। मध्य प्रदेश मुख्य रूप से ग्रामीण राज्य है और पारंपरिक रूप से ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस के लिए समर्थन का भाव रहता है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव इस सच की ओर संकेत कर रहे हैं कि कांग्रेस ने ग्रामीण इलाकों में स्पष्ट रूप से अपना वर्चस्व प्राप्त कर लिया है। हालांकि यह देखना होगा कि वह संवेग बरकरार रहता है या नहीं? क्या यह तबका भाजपा के समर्थन में जाएगा?

हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्ष 1991 के बाद से भाजपा का मध्य प्रदेश में अच्छे प्रदर्शन का शानदार इतिहास रहा है, सिर्फ 2009 के चुनाव परिणाम ही अपवाद हैं। 2009 चुनाव में दोनों मुख्य पार्टियों के बीच सीट संख्या और मतदान प्रतिशत का अंतर करीबी रहा था। जमीनी हवा, स्वर, भाव और माहौल को देखकर लगता है कि सीट संख्या और मतदान प्रतिशत के मामले में मध्य प्रदेश वर्ष 2009 के परिणामों को दोहरा सकता है। प्रतिद्वंद्विता की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए यहां बड़ी संभावना है कि मध्य प्रदेश हार-जीत में बहुत कम अंतर का गवाह भी बन सकता है। हार-जीत का अंतर वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह नहीं रहेगा और अधिकतर जगह हार-जीत का अंतर 50,000 से नीचे रह सकता है। एनडीए और यूपीए की सीटों की गणना में मध्य प्रदेश के परिणाम निस्संदेह निर्णायक होंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on May 15