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6 दिसंबर, 2019|4:15|IST

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संन्यासी तो यहां बहुत हैं, पर महापुरुष वह एक ही थे

आध्यात्मिक संत स्वामी सत्यमित्रानंदजी काया के बंधनों से मुक्त होकर परमसत्ता के चरणों में विलीन हो गए। उन्होंने निरंतर संघर्ष किया और जीवन कैसे जिया जाए, इसका संदेश शिष्यों के साथ-साथ आम मनुष्यों को भी दिया। मैं उनसे 1962 से जुड़ा रहा हूं। मेरे पिता तत्कालीन नीमच, मध्य प्रदेश में जज थे, स्वामीजी उनके पास आते थे। उस समय मेरी आयु 12 वर्ष थी। उसके बाद तो निरंतर उनका आशीर्वाद मिलता रहा। यह स्वामी सत्यमित्रानंदजी की ही भविष्यवाणी थी कि तुम गंगा तट पर आकर रहोगे और मैं 1977 में गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा के चरणों में समर्पित हो गया। गृहस्थ आश्रम में रहते हुए आध्यात्मिक स्तर का जीवन कैसे जिया जाए, यह मार्गदर्शन भी उनसे मिलता रहा।

स्वामी सत्यमित्रानंदजी का व्यवहार सबके साथ अत्यंत आत्मीयतापूर्ण होता था और संत समाज के अलावा आम जनता में भी उनकी काफी प्रतिष्ठा थी। हमारे गुरुदेव तो उनके बारे में अक्सर कहते कि भगवान ने एक संन्यासी के रूप में उन्हें हमें गिफ्ट किया है। सत्यमित्रानंदजी एक श्रेष्ठ वक्ता थे। युवावस्था से ही सनातन धर्म का अलख जगाते रहे। वह भानुपुरा पीठ के शंकराचार्य और विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक न्यासी भी रहे। भानुपुरा पीठ के नौ वर्षों तक शंकराचार्य रहने के बाद उन्होंने 1969 में यह आसन छोड़ दिया था। लेकिन आम जनता से उन्हें भारतमाता मंदिर ने जोड़ा। धर्मध्वजधारी इस विराट व्यक्तित्व को पता था कि देश के जनमानस में भारतमाता के प्रति जो अगाध श्रद्धा और प्रेम है, उसके लिए एक धाम जरूर होना चाहिए। और हरिद्वार से उत्तम स्थल इसके लिए और क्या हो सकता था। 1983 में उन्होंने अपने उस स्वप्न को साकार रूप दिया। इस मंदिर में देव प्रतिमाओं के अलावा विभिन्न तलों में धर्मगुरुओं और राष्ट्रनायकों की भी प्रतिमाएं हैं। यह मंदिर आज हरिद्वार का एक प्रमुख आकर्षण है और यहां देश-दुनिया के बड़े-बड़े लोग आते रहे हैं। 

उनकी राष्ट्रव्यापी प्रतिष्ठा और आत्मीय व्यवहार को देखते हुए ही तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के निपटारे के लिए उनसे दोनों पक्षों में सहमति बनाने का अनुरोध किया था। स्वामी सत्यमित्रानंदजी ने इस दिशा में गंभीर प्रयास किए थे, और काफी सकारात्मक माहौल बन भी गया था, लेकिन राजनीति की अपनी गति होती है। तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों ने उनके समस्त प्रयासों पर पानी फेर दिया। बाद के दिनों में राममंदिर निर्माण में देरी से उनका धैर्य चूकने लगा था। 2017 में उन्होंने इसके लिए अनशन तक का एलान कर दिया था। 

एक पिता की तरह उन्होंने मुझ पर निरंतर प्रेम बरसाया। चाहे वह कुंभ के मेले हों, अन्य प्रकल्पों का शुभारंभ हो या ध्वजारोहण, उन्होंने मुझे सम्मान दिया। अभी दो माह पूर्व मैं और शैल जीजी उनके दर्शन करने गए थे। उस समय वह बिस्तर पर थे। इसके बावजूद वह खड़े हुए और उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया। हरिद्वार वह भूमि है, जिसको सत्यमित्रानंदजी अतिपावन बना गए हैं। अभी भी मुझे याद है कि सिंहस्थ उज्जैन के महाकुंभ शिविर में मैं अपने 30 शिष्यों के साथ उनके दर्शन करने गया, तो उन्होंने अपने हाथ से सबको भोजन कराया और सबको भेंट, उपहार में चित्र दिए।

संन्यासी तो हरिद्वार में बहुत हैं, विशेषकर सप्तऋषि क्षेत्र में, पर सब पर प्यार लुटाने वाले महापुरुष वह एक ही थे।  अपने गुरुदेव, माताजी के बाद हमने उस परंपरा को जारी रखा, जिसमें संन्यासी को भोजन कराते हैं और वह भिक्षा-रूप में निरंतर भोजन ग्रहण करते रहे। साल 2011 के शताब्दी समारोह में अपने पावन आशीर्वाद से उन्होंने पूरे गायत्री परिवार को लाभान्वित किया था, जिसमें लाखों की संख्या में परिजन मौजूद थे। दुनिया भर से उन्हें न्योते मिलते रहे, और उन्होंने सबको मान दिया। साल 2015 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया था।

हरिद्वार आज पीड़ा में है। उसने एक ऐसे रत्न को खो दिया है, जिसकी वजह से भी इस नगर की शान थी। परमपिता परमात्मा ने अपने चरणों में उन्हें स्थान दिया है। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए धर्मसेवा और समाज-कल्याण के कार्य निरंतर चलते रहें, इसके लिए हम निरंतर परिश्रम करते रहेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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