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अन्य राज्यों को मिले विशेष अधिकारों का क्या होगा?

पहले से ही लग रहा था कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ऐसा कोई कदम उठा सकती है। सितंबर 2016 में आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद प्रदर्शन हुए थे और जून 2018 में भाजपा ने पीडीपी से समर्थन वापस ले लिया था, तब भी मैंने यह चर्चा की थी। अनुच्छेद 370 और 35-ए पर जिस तरह से झकझोर देने वाला फैसला हुआ है, उसके कारण भाजपा व पीडीपी के बीच हुआ सुविधा का गठबंधन और अविश्वसनीय लगने लगा है। 

इस मामले में पृष्ठभूमि को देखना उचित होगा। संसदीय बहस के हो-हल्ले और राष्ट्रवादियों की गौरवान्वित मुद्राओं ने राज्य-विभाजन के मसले को बहुत पीछे धकेल दिया है। वर्ष 2002 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने छोटे दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों के गठबंधन- जम्मू राज्य मोर्चा को निर्देशित किया था कि वह जम्मू क्षेत्र को अलग राज्य बनाने की मांग करे। उस समय चुनावी कवरेज के लिए मैं जम्मू में आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश कुमार से मिला था, जिन्होंने इस कदम के तार्किक होने का दावा किया था। 

वैसे यहां यह मांग कई वर्षों से दक्षिणपंथी दायरे से परे भी मौजूद रही है। जम्मू-कश्मीर के विभाजन की वकालत की जाती रही है। जम्मू और लद्दाख को कश्मीर घाटी से अलग करने के प्रयास चलते रहे हैं। अब वाकई जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अलग-अलग केंद्रशासित क्षेत्र के रूप में बदल दिए गए हैं। इसके लिए भाजपा ने पहले ही गैर-भाजपा राष्ट्रवादियों और भाजपा के धुर समर्थकों का समर्थन समान रूप से जुटा रखा था। 

राज्य का दो भागों में विभाजन जहां लोगों में विखंडन पैदा कर सकता है, वहीं इसे विकास के लिए जरूरी भी माना जा रहा है। भाजपा के अनुसार, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के अस्थाई निवासियों और महिलाओं के साथ भेदभाव के कारण अनुच्छेद 35-ए को रद्द कर दिया गया है, यह अनुच्छेद विकास में एक बाधा था। कुछ विश्लेषकों ने संकेत दिए हैं कि अनुच्छेद 370 का अंत कुछ राज्यों के लिए चिंता का विषय बन गया है। विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत के लिए यह चिंता का विषय है। अनुच्छेद 370 के प्रावधान नहीं, बल्कि अनुच्छेद 35 -ए के तहत मिलने वाले प्रावधान चिंता के कारण बन गए हैं। दरअसल, 35-ए से मिलते-जुलते प्रावधानों का लाभ अनेक राज्य ले रहे हैं।

अनुच्छेद 35-ए में विभिन्न प्रावधानों के तहत जम्मू-कश्मीर के स्थाई निवासियों को कुछ विशेष अधिकार दिए गए थे : राज्य सरकार के तहत रोजगार का अधिकार, राज्य में अचल संपत्ति अधिग्रहण का अधिकार, राज्य में बसावट का अधिकार। अनुच्छेद 35-ए से मिलते-जुलते प्रावधान अनुच्छेद 371-ए में हैं, जिसके तहत नगाओं को अपनी धार्मिक या सामाजिक प्रथाओं को बनाए रखने का अधिकार प्राप्त है। न्याय संबंधी प्रशासन में भी नगा प्रथा के कानूनों को तरजीह देना है। नगाओं को अपनी भूमि व संसाधनों पर स्वामित्व और हस्तांतरण के अधिकार भी मिले हुए हैं, इसके अलावा सरकारी रोजगार व अन्य अधिकार भी हैं। 

ऐसे ही अनुच्छेद 371-सी मणिपुर के आदिवासी पहाड़ी क्षेत्रों को प्रशासनिक सुरक्षा प्रदान करता है। आदिवासी लोक की भूमि और प्रथागत अधिकारों की रक्षा करता है। मिजोरम पर लागू अनुच्छेद 371-जी नगालैंड के प्रावधानों का ही एक दर्पण है। अरुणाचल प्रदेश भी बाहरी लोगों की राज्य में पहुंच, प्रवास और संपत्ति पर स्वामित्व को नियंत्रित करता है। विशेष प्रावधानों द्वारा आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों की रक्षा होती है। वर्तमान केंद्र सरकार की नीतियों के कारण असम व मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों के वनवासी भी बहुत दबाव में हैं। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी संपत्ति पर स्वामित्व आरक्षित है। झारखंड व छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में भी ऐसा ही संरक्षण है। 

यदि अनुच्छेद 35-ए जम्मू-कश्मीर के विकास को रोक रहा था, तो ऐसे ही प्रावधान कुछ दूसरे राज्यों में विकास को कैसे बल दे सकते हैं? पूर्वोत्तर भारत में ऐसे मामलों में चिंताएं पहले से ही मुखर रही हैं। वहां स्वायत्तता, संपत्ति और आजीविका में कमी आ रही है। आव्रजन संबंधी मुद्दे अपनी जगह हैं, और अनेक विद्रोही समूहों के साथ शांति-वार्ताएं भी प्रगति पर हैं। ऐसे में, जवाब केंद्र सरकार को देना होगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on 9th August