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सामाजिक न्याय की राजनीति का दूसरा चरण

सामाजिक न्याय की राजनीति का दूसरा चरण शुरू होने जा रहा है। उत्तर प्रदेश की सरकार ‘कोटा के भीतर कोटा’ का प्रावधान करने जा रही है। खबर है कि इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर सहमति लगभग बन गई है। सरकार ने अन्य पिछड़ी जातियों, यानी ओबीसी के ‘कोटा के भीतर कोटा’ के प्रावधानों को तय करने के लिए समिति बनाई थी। इस समिति ने ओबीसी का तीन भागों में वर्गीकरण किया। पहली श्रेणी में कुर्मी, यादव, चौरसिया जैसी जातियों को रखा गया, दूसरी श्रेणी में कुशवाहा, शाक्य, साहू, तेली, गुज्जर, माली आदि जातियों को रखा गया तथा तीसरी श्रेणी में राजभर, मल्लाह, बिंद, घोसी, इत्यादि अति पिछड़ी जातियों को वर्गीकृत किया गया है। इसके आधार पर ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण को विभाजित करते हुए पहली श्रेणी को सात प्रतिशत, दूसरी श्रेणी को 11 प्रतिशत और तीसरी श्रेणी को नौ प्रतिशत का सुझाव दिया गया है। इसी तरह, प्रदेश में हुकुम सिंह समिति की रिपोर्ट को आधार बनाकर अनुसूचित जातियों को दो वर्गों में विभाजित करके 21 प्रतिशत आरक्षण को बांटते हुए एक वर्ग को 10 प्रतिशत और दूसरे को 11 प्रतिशत आरक्षण का सुझाव दिया गया है। इस वर्गीकरण का आधार दो प्रकार का है। एक तो दलितों और पिछड़ों में उपेक्षित समूहों का निर्धारण और उनकी खोज, जिन तक आरक्षण का लाभ अभी नहीं पहुंचा है। 

दूसरा, अब ‘पोस्ट मंडल आयोग’ की प्रशासनिक और राजनीतिक स्थिति के सृजन की कोशिश हो रही है। मंडल आयोग की रिपोर्ट दलितों और पिछड़ों की होमोजिनियस कोटि की राजनीति विकसित हुई। इससे जो अस्मिता विकसित हुई, उसका रूपांतरण राजनीतिक गोलबंदी और जनतांत्रिक चुनावों में वोटिंग ब्लॉक के रूप में भी हुआ। अब ‘पोस्ट मंडल’ कहे जाने वाले सामाजिक न्याय के जो सरकारी प्रयास हो रहे हैं, उनसे एक नई राजनीति का आधार भी बनने लगा है। इससे विकसित पिछडे़ और उपेक्षित पिछड़े सामाजिक समूहों की अलग अस्मिताएं व राजनीतिक गोलबंदी शुरू होगी। इसी तरह, दलितों में गैर जाटव राजनीतिक गोलबंदी को कहीं ज्यादा धार मिलेगी। माना जा रहा है कि इससे सरकारी योजनाओं के लाभों का वितरण इन सामाजिक समूहों में ज्यादा न्यायपरक ढंग से हो पाएगा। साथ ही ये अति उपेक्षित समूह विकास, नौकरी और तुलनात्मक आर्थिक बेहतरी के साथ-साथ अपनी राजनीति भी विकसित कर पाएंगे। उत्तर प्रदेश अगर इसमें कामयाब रहा, तो अन्य प्रदेशों में ऐसी ही शुरुआत के दबाव बनेंगे। 

माना जाता है कि सामाजिक न्याय के अभी तक के प्रयासों के लाभ वही जातियां उठा पाई हैं, जिन्होंने अपने भीतर इनका लाभ लेने की क्षमता विकसित की। लेकिन हरेक राज्य में दलितों और पिछड़ों में एक बड़ी संख्या ऐसी है, जिनके पास आरक्षण के लाभ उठा पाने की क्षमता अब तक विकसित नहीं हो पाई है। उनमें शिक्षा, राजनीतिक नेतृत्व तथा अपने अधिकार को प्राप्त करने के लिए दबाव पैदा करने की ताकत नहीं बन पाई है। विभिन्न राज्यों में ऐसे अति पिछड़े, ओबीसी और अति उपेक्षित दलितों के बीच अपनी हिस्सेदारी प्राप्त करने के भाव पिछले कुछ साल में विकसित हुए हैं। कहते हैं कि राज्य अपनी जरूरत के लिए नई अस्मिताएं सृजित करता है। इन अस्मिताओं का लाभ एक ही साथ सत्ता की राजनीति करने वालों और सामाजिक समूहों, दोनों को मिलता है, पर विभाजित और विखंडित रूप में। मंडल रिपोर्ट लागू होने से ‘समग्र दलित’ और ‘समग्र ओबीसी’ की अवधारणा विकसित हुई थी।

मगर धीरे-धीरे यह साफ होने लगा कि दलितों और पिछड़ों के मध्य भी अनेक असमानताएं हैं। राजनीतिक शक्तियों ने इन असमान विकास के विविध धरातलों पर रुके और बसे सामाजिक समूहों की आकांक्षाओं को भांप लिया। कुछ ने तो इस गैर-बराबरी को अपने राजनीतिक प्रयासों से हवा दी। पिछले चुनाव में गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलित गोलबंदी की बातें खूब हुईं। अब लगता है कि सामाजिक न्याय की भविष्य की राजनीति ‘कोटा के भीतर कोटा’ के सरकारी प्रयासों से ही तय होगी। बिहार में महादलित की अवधारणा तो चर्चा में रही ही है। अब अन्य राज्यों में भी इसी रास्ते पर चलने का दबाव बढे़गा। इससे लगता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति का ‘पोस्ट मंडल दौर’ प्रारंभ हो गया है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on 22nd August