Hindustan Nazaria Column on 20th July - सूरत पहचानने वाली तकनीक का असली चेहरा DA Image
19 नबम्बर, 2019|1:29|IST

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सूरत पहचानने वाली तकनीक का असली चेहरा

gautam bhatia  supreme court advocate

इस महीने की शुरुआत में एक स्वतंत्र जांच-रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि लंदन मेट्रोपॉलिटन पुलिस की चेहरा पहचानने वाली तकनीक द्वारा पहचाने गए पांच संदिग्ध अपराधियों में से चार यानी 80 फीसदी लोग निर्दोष थे। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही ब्रिटेन के लोग गुस्से से उबल पड़े हैं। यह रिपोर्ट तब आई है, जब दो महीने पहले ही अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर ने, जो नई तकनीक से अत्याधुनिक होने की वजह से देश-दुनिया में अपनी पहचान रखता है, अपने यहां चेहरे से पहचान की तकनीक को प्रतिबंधित कर दिया है। फैसले पर अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन का कहना था कि चेहरे से पहचान स्थापित करने जैसी निगरानी तकनीक दरअसल सरकार को आम लोगों के दैनिक जीवन की निगरानी का अभूतपूर्व अधिकार देती है।

मगर ऐसा लगता है कि भारत के नीति-निर्माता इस तकनीक पर विश्वास करने लगे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा ‘ऑटोमेटेड फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम’ (एएफआरएस) के लिए टेंडर जारी करना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। यह निविदा इस भरोसे के साथ जारी की गई है कि एएफआरएस चेहरे को सटीक तरीके से पहचान लेगा, इसीलिए इसका इस्तेमाल अपराध से लड़ने और गुमशुदा व्यक्तियों की पहचान में बखूबी हो सकेगा। हालांकि यह भी कहा गया है कि इस तकनीक में सीसीटीवी फीड से प्राप्त डाटा का इस्तेमाल होगा, और उसका मिलान पासपोर्ट डाटा, विभिन्न मंत्रालयों में मौजूद डाटा जैसे डाटाबेस में दर्ज सूचनाओं से किया जाएगा।

जाहिर है, अपराध से निपटने के नाम पर यह निविदा असल में अलग-अलग डाटाबेस में मौजूद डाटा को आपस में मिलाने और फिर पूरे डाटा के इस कदर विश्लेषण की बात कहती है कि हर आदमी की प्रोफाइलिंग की जा सके। इस तरह के सिस्टम में हर चेहरा संदिग्ध है और उससे जुड़े रिकॉर्ड भविष्य के संभावित अपराध की जांच के लिए एकत्र किए जा सकते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है कि आपके ई-मेल का पासवर्ड इस आधार पर पुलिस मांग रही हो कि बाल पोर्नोग्रार्फी को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए सरकार के पास सभी के ई-मेल होने चाहिए। बेशक इस प्रयास का उद्देश्य प्रशंसनीय है, लेकिन जो तरीका अपनाया जा रहा है, वह बताता है कि निजी अधिकारों के प्रति सरकार उपेक्षा का भाव रखती है। यही वजह है कि डाटा सुरक्षा विशेषज्ञ चेहरा-पहचान तकनीक को निजता के लिए बुनियादी खतरा मानते हैं। अगर हम इस तर्क को मान भी लें कि अपराध-मुक्त समाज के लिए हमें अपनी निजता से थोड़ा-बहुत समझौता कर लेना चाहिए और सरकार डाटा-चोरी व निजता की रक्षा के तमाम प्रभावी कदम उठाएगी (जबकि डाटा सुरक्षा को लेकर फिलहाल हमारे यहां कोई कानून नहीं है), फिर भी इस सिस्टम की अपनी गड़बड़ियां हैं, जिसका जिक्र इस लेख की शुरुआती पंक्तियों में किया गया है। आंकड़े तो यह भी हैं कि भारत में इस तकनीक की सफलता दर दो फीसदी से भी कम है।
चेहरा पहचानने वाली तकनीक की अन्य दिक्कतें भी हैं।

जैसे, कई मामलों में यह भेदभाव करने वाली तकनीक साबित हुई है। दुनिया भर में हुए कई प्रयोगों से यह साबित हुआ है कि यह पद्धति नस्लीय और लैंगिक भेदभाव करती है। यह महिलाओं और श्याम वर्ण के लोगों की तुलना में गोरे इंसानों और पुरुषों की विशेषता कहीं बेहतर तरीके से पहचानती है। यानी महिलाओं और गहरे रंग वाले लोगों के लिए यह तकनीक कहीं ज्यादा दोषपूर्ण है। इसका अर्थ है कि इस तकनीक से न्याय के प्रभावित होने का जोखिम (तकनीक की अक्षमता के कारण) रहेगा, जिससे समाज में पहले से मौजूद सामाजिक-आर्थिक भेद गहरा जाएगा।

सरकार और जांच एजेंसियां बेशक अपराध-नियंत्रण तकनीक को बेहतर बनाएं, लेकिन जब तकनीक उन्हीं लोगों को अशक्त बनाती हो, जिन्हें अपराध से सुरक्षित रखने के लिए तकनीक लाई गई हो, तो हमें निश्चित तौर पर अपने प्रयास पर विचार करना चाहिए। एक कदम पीछे हटकर हमें यह सोचना चाहिए कि प्रभावी व बेहतर तकनीक के लिए हम क्या कर सकते हैं। चेहरा-पहचान तकनीक प्रभावी तौर पर काम नहीं करती, भेदभाव करती है और निजता भी भंग करती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो को इस बाबत जरूर सोचना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on 20th July