DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

वीरता और कायरता का एक विराट सबक

आखिर हुआ क्या था? पवेलियन में विराट कोहली और महेंद्र सिंह धौनी बल्ला हिला-हिलाकर आजमा रहे थे। सुनने की कोशिश कर रहे थे कि वह रहस्यमय आवाज आई कहां से? रविवार को पाकिस्तान के खिलाफ 77 रन बनाने के बाद एक बाउंसर को डीप-फाइन-लेग पर उड़ाने के फेर में कोहली आउट होकर पवेलियन लौट आए थे। टीवी पर दिख रहा था कि गेंद कोहली के बल्ले से काफी दूर थी। इसी के बाद कोहली और धौनी को बल्ले के हत्थे पर शक हुआ होगा कि कहीं वह ढीला तो नहीं पड़ गया? ढीले हत्थे से निकली आवाज से यह भ्रम हो सकता है कि बल्ले से गेंद टकराई है।

जब कैच की अपील हुई, तब कोहली ने अंपायर के निर्णय की प्रतीक्षा नहीं की। बस, जाते-जाते गरदन घुमाकर अंपायर की ओर देखा। वह अपना सिर हिलाकर कोहली के निर्णय को सही ठहरा रहे थे, पर उन्हें अपनी उंगली उठाने की जरूरत नहीं पड़ी। आजकल क्रिकेट में कोई बल्लेबाज गेंद पर बल्ले का बारीक किनारा लगने पर खुद पवेलियन नहीं लौट जाता। पहले यह रस्म हुआ करती थी, जब क्रिकेट को भद्र लोगों का खेल कहा जाता था। वह भी कोहली, जो प्रतिद्वंद्विता की ऐंठ में बौराए रहते हैं। जिनके लिए प्रतियोगी से गाली-गलौज आम बात रही है। कुछ समय पहले जब एक खेल समर्थक ने उनकी आलोचना की, तो उन्होंने उसे देश छोड़कर जाने के लिए कहा।

इस विश्व कप में कोहली का एक अलग रूप निखरकर आ रहा है। दक्षिण अफ्रीका के तेज गेंदबाज कागीसो रबाडा ने उन्हें हाल में ‘अपरिपक्व’ कहा। जब पत्रकारों ने प्रतिक्रिया मांगी, तो कोहली ने रबाडा की तारीफ की और कहा कि वह व्यक्तिगत मामले को तूल देने के लिए मीडिया का उपयोग नहीं करेंगे। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुकाबले में जब बाउंड्री के पास बैठे भारतीय समर्थक पूर्व कप्तान स्टीव स्मिथ को धत्कार रहे थे, क्योंकि वह धोखेबाजी के लिए एक साल का प्रतिबंध काटकर लौटे हैं, तो कोहली ने उन समर्थकों का विरोध किया, स्मिथ से क्षमा भी मांगी।

यह विराट परिपक्वता कोहली में नई आई है। अटकलें लगाने वाले शायद कहें कि यह धौनी की शांत प्रवृत्ति में गहरे डूबने का असर है। या शायद इसका श्रेय उनकी पत्नी अनुष्का शर्मा को दें, यह कहकर कि शादी रचाने के बाद व्यक्ति में संपूर्णता आ जाती है। मगर ऐसा होता, तो यह असर दूसरों पर भी दिखता। परंतु ऐसा बदलाव बहुत कम खिलाड़ियों में दिखता है। संभवत: यह खेल-कूद और प्रतियोगिता का असर है। जिस खिलाड़ी को कमर कसके जूझना आता है, अपने भीतर के हर अंश को खेल की बाजीगरी में झोंकना आता है, उसी को यह महसूस हो सकता है कि हार क्या होती है। इसे बड़प्पन कहते हैं। इसी से हम अपना छुटभय्यापन छोड़ अपने आप से बड़े बन सकते हैं। कलिंग युद्ध के बाद यही आभास सम्राट अशोक को हुआ था।

आज इसके उदाहरण कम होते जा रहे हैं। खासकर सोशल मीडिया पर जिस अभद्रता और अहंकार से बातचीत होती है, उससे लगता है कि हमारे देश में कोई अध्यात्म, कोई सामाजिक संस्कार कभी रहा ही नहीं। मनोविज्ञान में इसका एक अंग्रेजी नाम है- ‘ऑनलाइन डिसइनहिबिशन इफेक्ट’, यानी जब दूर बैठे हुए लोगों से हम बिजली के यंत्रों के सहारे ही बात करते हैं, तब हमारी सहज संवेदना चली जाती है। अगर किसी को बहुत बुरा-भला कह दें, उसका अपमान कर दें, तो उसे होने वाले दुख का हमें आभास नहीं होता। सोशल मीडिया पर कायर व्यक्ति में भी झूठी वीरता आ जाती है। आलोचना और अपमान का अंतर चला जाता है। बस, फोन पर उंगली घुमाकर अपने मत को श्रेष्ठ, दूसरों के मत को बकवास बताना आसान हो जाता है। यह झूठी वीरता हमारे समाज के एक हिस्से को आज अंधा बना रही है।

कल कोहली ने अंपायर की उंगली उठने का इंतजार नहीं किया। उनके कान में एक रहस्यमय आवाज पड़ी, जिसे उन्होंने सुन लिया। यह रहस्यमय आवाज हम सबके भीतर से आती है, लेकिन हम सब उसे सुनते नहीं हैं। शायद इसलिए, क्योंकि किसी प्रतियोगिता में हमने अपना सर्वस्व झोंका नहीं होता। न सच्ची जीत देखी होती है, न सच्ची हार। उस एक क्षण में विराट कोहली किसी एक क्रिकेट टीम के नहीं, हर खेल-प्रेमी के मन के कप्तान थे। चाहे एक क्षण के लिए ही।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on 18th June