DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बाढ़ के मूक शिकार, जिनकी चर्चा भी नहीं होती

पंकज चतुर्वेदी

एक सींग के गेंडे और रॉयल बंगाल टाइगर, यानी बाघ के सुरक्षित ठिकानों के लिए मशहूर, यूनेस्को द्वारा संरक्षित घोषित काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के लगभग 95 फीसदी हिस्से में इस समय पानी भर गया है। जानवर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में गहरे पानी में हरसंभव थककर हताश होने की हद तक तैरते हैं, दौड़ते हैं, दलदली जमीन पर थककर लस्त हो जाते हैं। या तो पानी उन्हें आगोश में ले लेता है या फिर भूख। कुछ बचकर बस्ती की तरफ दौड़ते हैं, तो कुछ सड़क पर तेज गति वाहनों की चपेट में आ जाते हैं। कई जानवर अपने पारंपरिक मानसून के सुरक्षित ठिकानों की ओर कार्बी आंगलांग पहाड़ी की तरफ जाते हैं, तो उनके लिए घात लगाए शिकारी उन्हें नहीं छोड़ते। केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात के साथ ही इस बार असम की बाढ़ भी भयावह है। बाढ़ ने लगभग पूरे असम में 32 जिलों के 56 लाख लोगों के जीवन को प्रभावित किया है।

असम की राजधानी से 225 किलोमीटर दूर गोलाघाट व नगांव जिले के 884 वर्ग किलोमीटर में फैले काजीरंगा उद्यान की खासियत यहां मिलने वाला एक सींग का गेंडा है। सारी दुनिया में उपलब्ध इस प्रजाति के गेंडों की दो-तिहाई संख्या इसी क्षेत्र में मिलती है। इसके अलावा, बाघ, हाथी, हिरण, जंगली भैंसा, जंगली बनैला जैसे कई जीव यहां की प्रकृति का हिस्सा हैं। यहां की जैव-विवधिता विलक्षण है। 41 फीसदी इलाके में ऊंची घास है, जो हाथी, हिरण के लिए मुफीद आसरा है। 29 फीसदी पेड़, 11 प्रतिशत छोटी झाड़िया हैं। आठ फीसदी इलाके में नदियां व अन्य जल-निधियां और चार प्रतिशत में दलदली जमीन। अर्थात हर तरह के जानवर के लिए उपयुक्त पर्यावास, भोजन और परिवेश। तभी हालिया गणना में यहां 2,413 गेंडे; 1,089 हाथी; 104 बाघ, 907 हॉग हिरण; 1,937 जंगली भैंसे आदि पाए गए थे। पिछले कुछ वर्षों में यहां चौकसी बढ़ी है, सो शिकारी अपेक्षाकृत कम सफल रहे।

पर विशाल ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी बाढ़ प्रभावित इलाके में बसे काजीरंगा के जानवरों के लिए बाढ़ काल बनकर आई है। वैसेे तो यहां सन 2016 में कोई डेढ़ हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले 140 ऐसे ऊंचे टीले बनाए गए थे, जहां वे पानी भरने की स्थिति में सुरक्षित आसरा बना सके। ये टीले चार से पांच मीटर ऊंचे हैं। इस बार पानी ने इनमें से अधिकांश को डुबो दिया है। अभी तक की आधिकारिक सूचना के अनुसार, 20 गेंडे मारे गए हैं, जबकि एक को वन विभाग ने बचा लिया है। बाढ़ में एक हाथी मारा गया व एक को बचा लिया गया। सबसे ज्यादा संख्या में हॉग हिरण (124) की मृत्यु हुई है और ऐसे 49 हिरणों को वन विभाग ने बचाया भी है। ऐसे 16 हिरण, काजीरंगा से सटे राष्ट्रीय राजमार्ग 37 पर दौड़ते तेज गति वाहनों की चपेट में आ गए हैं। नौ जंगली सुअर, इतने ही सांभर और तीन अन्य जानवर इस जल-विप्लवके शिकार हुए हैं। कई भयभीत जानवर बस्ती की तरफ भी आ रहे हैं। हाल ही में एक वीडियो बहुत वायरल हुआ था, जिसमें एक विशाल रॉयल बंगाल टाइगर हारमोती इलाके में एक घर के बिस्तर पर शरण लिए हुए था।

इस संरक्षित पार्क में जानवरों के विचरण के आठ पारंपरिक मार्गों को संरक्षित रखा गया है, लेकिन बाढ़ के पानी ने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है। इस संरक्षित वन के दूसरे छोर पर कार्बी आंगलांग का पठार है। सदियों से वन्य जीव ब्रह्मपुत्र के कोप से बचने के लिए यहां शरण लेते रहे हैं और इस बार भी जिन्हें रास्ता मिला, वे वहीं भाग रहे हैं। दुर्भाग्य है कि वहां उनका इंतजार दूसरे किस्म का काल करता है। इस पूरे इलाके में कई आतंकी गिरोह सक्रिय हैं, जिनका एक धंधा जानवरों के अंगों की तस्करी करना भी है।

बहुत ज्यादा बरसात, और इसकी वजह से आने वाली बाढ़ तो प्राकृतिक आपदा है, लेकिन इसमें फंसकर इतनी बड़ी संख्या में जानवरों का मरना तंत्र की नाकामी है। बेशक इस दौरान देश के कुछ दूसरे हिस्सों में आई बाढ़ में हुआ जान-माल का नुकसान शायद ज्यादा बड़ा है। खासकर केरल और महाराष्ट्र में जो जनहानि हुई है, उसके सामने इन मूक वन्य जीवों की हानि पर शायद ध्यान उतना न जाए, उन्हें तो खबरों में भी जगह नहीं मिल रही। पर सच यही है कि ऐसी आपदाओं से हम अपनी किसी भी संपदा को नहीं बचा पा रहे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on 14th July