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जल संकट के इस दौर में जैव-विविधता की बात

लगातार गरम होती धरती हमारी चुनौतियों को कई तरह से बढ़ा रही है। एक तरफ तो हमें इस धरती को और अधिक गरम होने से बचाना है, दूसरी ओर अभी तक जो बदलाव हो रहे हैं, उसके बुरे असर से मानव समुदाय को बचाना है, तो तीसरी व सबसे कठिन चुनौती है, ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में धरती की जैव-विविधता को बचाने की। गरमी के लगातार बढ़ते प्रकोप का असर मनुष्यों के लिए तो बढ़ ही रहा है, अन्य जीव-जंतु भी उससे कम व्याकुल नहीं हैं। हाल ही में देवास (मध्य प्रदेश) के वनों में प्यास से तड़पकर 15 बंदरों की मृत्यु की त्रासद घटना सामने आई है।

पक्षियों को पानी पिलाने की विशेष व्यवस्था तो हमारी परंपरा में रही है, लेकिन भीषण गरमी और जल-संकट के इन दिनों में बड़े पशुओं के लिए पानी सुनिश्चित करना आसान नहीं है। पहले शहरों में घोडे़, बैल जैसे मवेशियों के पानी पीने के लिए चरही की व्यवस्था हुआ करती थी। यह ऐसे जीवों के लिए थी, जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी थे। बैलगाड़ियों और घोड़ागाड़ियों की विदाई के साथ ही अब ऐसी व्यवस्थाएं भी खत्म हो चुकी हैं। हालांकि अभी भी हमारे नगरों में तरह-तरह के पशु और पक्षी हैं, लेकिन उनकी गरमी और प्यास के बारे में ज्यादा सोचा भी नहीं जाता। इसकी वजह से ये गंदी नालियों और प्रदूषित नालों वगैरह से पानी पीने को मजबूर होते हैं।

हालांकि गांवों में इस समस्या का समाधान शहरों जितना कठिन नहीं है। यदि जल-संरक्षण व वर्षा जल संग्रहण पर अधिक ध्यान दिया जाएगा तो इसका लाभ गांववासियों के साथ उनके पशुओं को भी मिलेगा। पर इसके साथ यह भी सुनिश्चित कर लिया जाए कि कुछ चेक डैमों या तालाबों का पानी केवल पशुओं के लिए सुरक्षित रखा जाएगा, तो इससे भीषण गरमी के दिनों में पशुओं के लिए पानी मिलने की संभावना और बढ़ जाएगी। सिंचाई के लिए पानी की कमी वैसे भी रहती है। तिस पर अतिरिक्त पानी देखकर अधिक जल-सघन फसलें उगाने की प्रवृत्ति भी अपनी जगह है। इसलिए कई बार जल-संग्रहण से जो भी पानी उपलब्ध होता है, वह सिंचाई में ही खर्च हो जाता है। इस स्थिति में गांव के पशुओं के लिए कम से कम एक अच्छा जल-स्रोत पूरी तरह बचा लिया जाए, तो यह पशुओं की प्यास बुझाने के लिए  अच्छा योगदान हो सकता है, लेकिन हमने इस बारे में ज्यादा सोचना शुरू नहीं किया है।

इसके अतिरिक्त वन्य जीवों की पानी की जरूरत पर भी ध्यान देना चाहिए। वनों में हो रहे बदलाव कई बार छिपे ही रह जाते हैं। यदि वृक्षों की कटाई अधिक हुई है या आसपास के क्षेत्र में अनियंत्रित खनन हुआ है, तो वन के प्राकृतिक जल-स्रोत बहुत कमजोर पड़ जाते हैं या सूख जाते हैं। इससे कई वन्य जीव प्यास बुझाने के लिए गांवों की ओर जाने लगते हैं, जिससे गांववासियों की तरह-तरह की क्षति भी होती है। जैव-विविधता को बचाना है, तो गांवों के साथ वनों के लिए भी जल-संग्रहण व संरक्षण के कार्य होने चाहिए, ताकि वन्य जीव-जंतुओं को पानी की उपलब्धि बनी रहे। किसी वन में कितने जल-स्रोत हैं व उनकी मौजूदा स्थिति कैसी है, इसकी जानकारी वन विभाग को एकत्र करनी चाहिए। हम यह मानकर चलते हैं कि वनों में जल स्रोतों और भूजल की स्थिति अच्छी होगी, लेकिन इस धारणा से आगे जाकर सही जानकारी हासिल करना काफी जरूरी है। वैसे जंगल का मामला वन विभाग का कार्यक्षेत्र है, पर इसके लिए जल विभाग से भी सहयोग लिया जा सकता है। 

अक्सर हमारा ध्यान किसी नदी के उस भाग पर ही केंद्रित होता है, जहां घनी आबादी रहती है। पर नदी के अन्य क्षेत्र में प्रदूषण या खनन से क्या क्षति हो रही है, इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं जाता है। इस कारण नदी के बहाव के बहुत से क्षेत्र में जीव-जंतु पानी से वंचित हो जाते हैं। इसी तरह, बड़ी नदियों की छोटी-छोटी सहायक नदियों और गाद-गदेरों पर भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है, जबकि अनेक जीव-जंतुओं के लिए पानी का मुख्य स्रोत यही होते हैं। जहां बांध व बैराज से नदी के बहाव के बड़े हिस्से को मोड़ दिया जाता है, वहां नदी के पूर्व बहाव के क्षेत्र में बहुत ही कम पानी बचता है, जबकि वहां के जीव-जंतुओं की जीवनचर्या नदी से सहज पानी उपलब्ध होने के बीच ही विकसित हुई होती है। इन्हें भी हमें प्यास बुझाने के विकल्प देने होंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on 13th June