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मौजूदा प्रयासों से शायद ही खत्म हो सकेगी गरीबी

अपने देश में, खासतौर से 1991 के बाद के उदारीकरण के दौर में आर्थिक असमानता काफी ज्यादा बढ़ी है। 2018 की ऑक्सफैम रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि 1993-94 से 2011-12 के दरम्यान शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में खपत से जुडे़ जिनी सूचकांक (असमानता मापने का सांख्यिकी माध्यम) में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट भी बताती है कि 2002 और 2012 के बीच देश की कुल संपदा में आबादी के निचले आधे हिस्से ( 50 फीसदी जनसंख्या) की हिस्सेदारी  8.1 फीसदी से घटकर 4.2 फीसदी रह गई, जबकि इसी अवधि के दौरान कुल संपदा में एक फीसदी शीर्ष संपन्न आबादी की हिस्सेदारी 15.7 प्रतिशत से बढ़कर 25.7 प्रतिशत हो गई।

असमानता में हुई इस उल्लेखनीय वृद्धि को देखते हुए यह जरूरी है कि भारत में आर्थिक गतिशीलता की सीमा सही ढंग से मापी जाए, ताकि यह पता चल सके कि समय के साथ कितने लोग आर्थिक पायदान पर ऊपर उठे हैं और कितने नीचे की ओर लुढ़के हैं। इस बाबत मैंने प्रोफेसर डैनियल एल मिलिमेट (सदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी, अमेरिका) और हाओ ली (नानजिंग ऑडिट यूनिवर्सिटी, चीन) के साथ मिलकर एक अध्ययन किया और भारतीय मानव विकास सर्वे (आईएचडीएस) के 2005-12 के आंकड़ों के इस्तेमाल से देश की आर्थिक गतिशीलता की सीमा मापने का प्रयास किया। आईएचडीएस एक बहु-विषयी सर्वे है, जिसमें देश भर के 40,000 परिवारों को शामिल किया जाता है।

अपने अध्ययन में हमने पाया कि समग्रता में पूरी आबादी के लिए गतिशीलता दर आश्चर्यजनक ढंग से कम है। इन सात वर्षों में 10 गरीब परिवारों में कम से कम सात परिवार या तो गरीब ही रहे या उससे बाहर निकलने के बावजूद उनका जोखिम समान रूप से कायम रहा, जबकि दस परिवारों में से महज दो ने इन वर्षों में गरीबी को ठीक से मात दी। दूसरी तरफ, इन सात वर्षों में गरीबी रेखा के ऊपर जीने वाले10 परिवारों में से दो परिवार गरीबी रेखा के नीचे चले गए। अध्ययन में हमने विभिन्न उप-आबादी की गतिशीलता दर की तुलना की, जिसमें हमें पर्याप्त विविधता के प्रमाण मिले। पहला अंतर तो यह मिला कि हिंदुओं या अन्य धार्मिक समूहों की तुलना में मुसलमान इन सात वर्षों में सबसे अधिक गरीबी रेखा के नीचे लुढ़के। यही नहीं, गरीबी रेखा से बाहर निकलने के बाद जोखिम रहित नया दर्जा बरकरार रखने की इनकी संभावनाएं भी कम रहती हैं।

दूसरी विविधता यह दिखी कि उच्च-जाति समूहों (ब्राह्मण या सवर्ण) और अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की तुलना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों में गरीबी दूर करने की संभावना कम दिखती है और उनके लिए गरीबी रेखा में शामिल होने की आशंका भी अधिक होती है। उच्च जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों की यदि तुलना करें, तो ओबीसी के गरीबी रेखा में शामिल होने की आशंका अधिक रहती है, और गरीबी रेखा से बाहर निकलकर जोखिम रहित गैर-गरीब की हैसियत पाने या इस नए दर्जे को बरकरार रखने की संभावना कम। और आखिरी अंतर, शहरी परिवारों की तुलना में ग्रामीण परिवारों के गरीबी में बने रहने की आशंका कहीं अधिक होती है। वे गरीबी से निकलने के प्रयास भी अपेक्षाकृत कम करते हैं और उनके साथ शहरी परिवारों की तुलना में गरीबी रेखा के नीचे जाने का जोखिम भी अधिक होता है।

हमारे नतीजे बताते हैं कि भारत में विषमता की स्थिति गंभीर है, क्योंकि आर्थिक सीढ़ी के आखिरी पायदान के परिवार गरीबी के दुश्चक्र में बुरी तरह फंसे हुए हैं। इसीलिए हमारे अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि गरीबी दूर करने के प्रयास इस रूप में किए जाएं कि वे गरीब परिवारों की आर्थिक हैसियत को अस्थाई नहीं, बल्कि स्थाई रूप से सुधारें। अस्थाई प्रभाव रखने वाले प्रयासों की बजाय  संपत्तियों के अधिग्रहण की क्षमताबढ़ाने वाले उपायों से गरीबी स्थाई रूप से दूर करने के प्रयास किए जा सकते हैं। हमारा अध्ययन उन पारंपरिक धारणाओं को भी चुनौती देता है, जिनमें कहा जाता है कि वंचित तबके अन्य समूहों के साथ समान गति से आगे बढ़ रहे हैं। अलबत्ता, यह अध्ययन खासतौर से उन सभी सामाजिक योजनाओं और कार्यक्रमों पर सवाल उठाता है, जो हाशिये की आबादी की आर्थिक उन्नति के लिए चलाए जा रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on 13th August