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15 दिसंबर, 2019|6:41|IST

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मंजिल के करीब पहुंचकर ठिठका नगा समझौता

सरकार ने नगा विद्रोहियों से चल रही शांति-वार्ता के लिए 31 अक्तूबर की जो समय-सीमा तय कर रखी थी, वह तो बीत गई, अब क्या होगा? वार्ता जारी है, क्योंकि यह जरूरी है। अभी कागज पर कोई समझौता नहीं है। स्थिति फिर बातचीत-फिर खींचतान तक लौट आई है।

पिछले 22 वर्षों से यही ढर्रा रहा है। सबसे बडे़ नगा विद्रोही समूह नेशनल कौंसिल ऑफ नगालिम (आइजक-मुइवा) या एनएससीएन(आईएम) ने जब 1997 में युद्ध-विराम समझौते पर हस्ताक्षर किया था, तब से यही चल रहा है। मैं समझता हूं, नगा पेशेवरों और उद्यमियों के कई समूहों ने नगा विद्रोही गुटों को किसी प्रकार का टैक्स न देने का फैसला कर लिया है। पहले यह टैक्स नगा विद्रोहियों को फिरौती या दान की तरह ही देना पड़ता था। नगा उद्यमियों और लोगों का यह फैसला इस बात की गवाही दे रहा है कि नगा विद्रोहियों का प्रभाव घट रहा है। 


इस क्षेत्र में जो विकास हुआ है, वह चौंकाता है। यह वार्ता-प्रक्रिया का ही एक परिणाम है। सरकार का एक लक्ष्य विद्रोहियों को यह दिखाना था कि हथियार डाल देने के अलावा उनके पास बच निकलने का दूसरा रास्ता नहीं है। यह एहसास करा दिया गया है कि विद्रोही काडर और उनके नेताओं का अद्र्धसैनिक ढांचे में समावेश होगा और एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था बनेगी, जो नगा गौरव का ध्यान रखेगी।

साथ ही, तीन राज्यों- मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश की सीमाएं नगा समझौते से प्रभावित नहीं होंगी। शांति समझौता पूरी नगा भूमि पर लागू होगा, पर इसका असर नगा आबादी वाले पड़ोसी राज्यों पर नहीं होगा। कमोबेश सरकार ने एनएससीएन(आईएम) के नेताओं को यह भी आभास करा दिया है कि 1960 या 1990 के दशक की तरह चीन से मदद मांगने पर भारत शांत नहीं बैठेगा। इसके अलावा, भारत सरकार की जो नीतियां रही हैं, उनके तहत म्यांमार भी अब नगा विद्रोहियों के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है। अब वहां शरण लेना या शिविर चलाना आसान नहीं है। पहले मणिपुर और असम में अपनी जड़ें रखने वाले नगा विद्रोही म्यांमार की जमीन का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते थे। 


केंद्र सरकार एनएससीएन(आईएम) और अन्य सात नगा विद्रोही समूहों के साथ समांतर बातचीत कर रही है और इस प्रयास में है कि इन दोनों ही वार्ताओं को आगे चलकर एक साथ लाया जाए। सात नगा विद्रोही समूह में ऐसे गुट भी शामिल हैं, जो एनएससीएन (आईएम) से टूटकर अलग हुए हैं। जाहिर है, कोई व्यापक शांति समझौता तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि हर विद्रोही गुट उस पर हस्ताक्षर न करे।


अभी बहुत कुछ करना बाकी है। एनएससीएन (आईएम) आकार के मुताबिक अपना अधिक महत्व दिखाना चाहता है। भारत सरकार की ओर से वार्ताकार आर एन रवि (जो अब नगालैंड के राज्यपाल भी हैं) ने एनएससीएन (आईएम) को अलग सलाह दी है। इसके बाद भी अखिल नगा संगठन का नेतृत्व करने की टी मुइवा की इच्छा खत्म नहीं हुई है। एनएससीएन (आईएम) महासचिव मुइवा का दावा है कि वह जातीय-सांस्कृतिक नगा संगठन के मुखिया हैं और पूरे नगालैंड व दूसरे राज्यों की नगा बहुल धरती पर अपनी बड़ी राजनीतिक भूमिका देखते हैं। हालांकि ऐसा होना मुश्किल है। मुइवा व्यापक नगा नेता की हैसियत नहीं रखते हैं।

अंगामी जापू फिजो ऐसी हैसियत रखते थे, वह विद्रोही नेतृत्व का वास्तविक चेहरा थे और नए आजाद हुए भारत के 1940 और 1950 के दशक में उन्होंने नगाओं का नेतृत्व किया था। बाद में वह शांत पड़ गए थे, और विरोधाभासों के बावजूद कुछ नगा नेताओं ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और 1963 में नगालैंड राज्य अस्तित्व में आया था। लेकिन मुइवा को गैर-नगा समूह ही नहीं, कई छोटे नगा समूह भी तोड़ने-बांटने वाले नेता के रूप में देखते हैं। 


शांति समझौते के तहत विद्रोही नेताओं को वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में शामिल करने का भी प्रस्ताव है, इसके लिए वहां की विधायिका को दो सदनों वाली बनाया जा सकता है, या विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्सीमांकन करके सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, ताकि नगा विद्रोही नेताओं को मुख्यधारा में आने का मौका मिले। पुनर्सीमांकन की यह प्रक्रिया तीन पड़ोसी राज्यों में भी चलेगी। आज इस पूरे क्षेत्र को खुले दिल और दिमाग की जरूरत है, वरना संघर्ष पहले की तरह जारी रहेगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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