DA Image
24 सितम्बर, 2020|12:53|IST

अगली स्टोरी

एक फिल्म जिसने बहुत कुछ बदला

प्रियदर्शन वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार

वह 1994-95 का दौर था। देश में होने वाली शादियों की धूम में सहसा कुछ नई चीजें जुड़ गई थीं- जूते चुराने की पुरानी समझी जाने वाली रस्म को अचानक एक नई व ग्लैमरस रंगत मिल गई और उत्तर भारत के शहरों में लेडीज संगीत में दीदी तेरा देवर दीवाना  गूंजने लगा था। यह 1994 में आई फिल्म हम आपके हैं कौन  का जादू था, जो उन दिनों तमाम भारतीय घरों में सिर चढ़कर बोल रहा था। लोग एक ऐसी भव्य, पारिवारिक और भावुक शादी देख रहे थ, जो इसके पहले उनकी कल्पनाओं में हुआ करती थी। एक ऐसा आदर्श परिवार देख रहे थे, जिसमें घर आई बहू के पक्ष में प्यारा सा कुत्ता तक अंपायरिंग कर लेता था। 

ऐसा नहीं कि हिंदी फिल्मों में इसके पहले शादियों या पारिवारिक रिश्तों की कहानियां नहीं हुआ करती थीं। लेकिन मूलत: वे राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले बनने वाली ग्रामीण भारत की कहानियां होती थीं या फिर बासु भट्टाचार्य या बासु चटर्जी या गुलजार जैसे निर्देशकों द्वारा बनाई गई शहरी मध्यवर्गीय जीवन की कशमकश की कथाएं। हम आपके हैं कौन  इस प्रक्रिया को एक नए स्तर पर ले गई और लोगों ने इसे हाथोंहाथ लिया। यह उदारीकरण की बिल्कुल ताजा हवा के बीच नई बनती उच्च मध्यवर्गीय महत्वाकांक्षाओं की फिल्म थी, जो पहली बार ऐसी भव्य शादियों को अपने अनुभव के स्तर पर महसूस कर रही थी। बेशक, इस दौर में इस फिल्म की भव्यता, इसमें पोषित कर्मकांडों और निहित परंपराओं के आभामंडन की कुछ बौद्धिक आलोचना की कोशिश की गई, लेकिन अंतत: उस नई बयार में इन आलोचनाओं के पांव उखड़ने थे। यह इत्तिफाक नहीं है कि हम आपके हैं कौन  की कामयाबी को एक साल बाद उस फिल्म ने चुनौती दी, जो सात समंदर पार से शुरू होती थी और जिसमें बड़े-बडे़ देशों में छोटी-छोटी बातों को बहुत अहमियत नहीं दी जाती थी। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे की कामयाबी भारत में ऐसी पारिवारिक फिल्मों का एक नया सिलसिला शुरू कर रही थी, जिसमें प्रेम के लिए बगावत नहीं, मेल-मिलाप को एक मूल्य की तरह स्थापित किया जा रहा था।

हम आपके हैं कौन  को आए हुए 25 साल हो गए। इन 25 सालों में देश भी बदल चुका है, दुनिया भी और सिनेमा भी। 1995 में जो लोग स्कूटर पर घूमते हुए सेकेंड हैंड कार खरीदने का सपना देखते थे, रेलवे के स्लीपर क्लास में पहली बार अपने छोटे शहरों से बाहर जाते थे, पांच हजार की नौकरी को अपना सौभाग्य मानते थे, वे इन वर्षों में नई कंपनियों की भारी-भरकम गाड़ियां खरीद चुके हैं। राजधानी और शताब्दी ट्रेनों से आगे जाते हुए विमानों की इकोनॉमी क्लास की सीटें पहचानने लगे हैं। लाख से नीचे की सैलरी को अपमानजनक पाते हैं और लंदन और सिडनी तक आने-जाने लगे हैं। इसी तरह, सिनेमा गांवों या छोटे शहरों में विकसित होने वाले प्रेम और प्रेमी-प्रेमिका व खलनायक के जाने-माने त्रिकोण से काफी दूर जाकर बिल्कुल ग्लोबल पटल कर अपने लिए ऐसी नई कहानियां चुन रहा है, जिसमें लंदन और अहमदाबाद एक हो जाते हैं, इस दौर में डॉन  का रीमेक भी बनता है, तो वह ग्लोबल शक्ल में नजर आता है।

लेकिन ये सतह पर दिखने वाले बदलाव हैं। ज्यादा गहरे उतरकर देखें, तो वह पारिवारिकता अब कुछ झीनी पड़ चुकी है, कहीं-कहीं तो तार-तार हो चुकी है, जिसका सपना हम आपके हैं कौन जैसी फिल्म देखती और दिखाती थी। इन तमाम वर्षों में एक अदृश्य आर्थिक-सामाजिक विस्थापन भारतीय मध्यवर्गीय घरों की नई हकीकत है और इसके नतीजों को ठीक-ठीक समझना अभी बाकी है। इन तमाम वर्षों में अपने-अपने गांव-देहात और शहर छोड़कर भारतीय महानगरों या विदेशी शहरों में जाकर नौकरी करती पीढ़ियां अब बिल्कुल नाभिकीय परिवारों में बदल चुकी हैं, जहां नौकरी-पेशा मां-बाप क्रेच या गरीब आया के सहारे बच्चों को छोड़़कर नौकरी पर जाने को मजबूर हैं। घर में सुबह-शाम जलने वाला चूल्हा अब महिलाओं की मजबूरी नहीं रहा, रेस्तरां जाकर खाने का नया चलन भारतीय घरों में घुसपैठ कर चुका हैै। अब तो एप से खाना मंगाने का विकल्प भी उन्हें एक नई आजादी और निजता दे रहा है।

कम ही लोगों को यह एहसास है कि इस जीवन शैली की कितनी तरह की कीमत हमारी सामाजिकता को चुकानी पड़ रही है। परिवार सिर्फ संख्या के स्तर पर नहीं टूटे, संवाद के स्तर पर भी बिखरे हैं। ऐसी संवादहीनता के बीच अपने भीतर सूख रहा संवेदना का पौधा बचाए रखने की जिद के साथ लंच बॉक्स  जैसी यादगार फिल्में कभी-कभी बन जाती हैं। इस कड़ी में बाइस्कोप  को भी याद कर सकते हैं, जहां एक टूटे हुए परिवार की अकेली बच्ची मिनी अपने बचपन के बाइस्कोप वाले को खोजती हुई काबुल तक जाती है। इस जीवन शैली का एक दूसरा सिरा भी है। इस दूसरे सिरे पर पुराने घरों में अकेले बैठे बूढ़े मां-बाप हैं, जो गरमी और पूजा की छुट्टियों में अपने नाती-पोतों का इंतजार करते हैं या फिर खुद उनसे मिलने चले जाते हैं- अपने ढहते मकानों की आखिरी देखभाल के लिए लौटने को अंतत: मजबूर।

बेशक, समाज और सिनेमा, दोनों स्तरों पर इस दौर में एक बहुत अच्छी बात हुई है। पहली बार स्त्री अस्मिता और सम्मान को ठीक से पहचाना गया है। दरअसल, हिंदी फिल्मों में बीते दो दशकों में आई सबसे बड़ी क्रांति यही है कि अब इन फिल्मों में ्त्रिरयां न गुंगी गुडि़या हैं, न नकली आक्रामक कठपुतलियां- वे गीता और सीता के स्टीरियोटाइप तोड़कर ऐसी जीती-जागती लड़कियों में बदल रही हैं, जो अपनी इच्छाओं को भी पहचानती हैं और अपने हिस्से की बगावत भी करती हैं। द क्वीन  या तनु वेड्स मनु  या ऐसी ढेर सारी फिल्मों में यह नई लड़की दिखाई पड़ती है। 

चाहें तो याद कर सकते हैं कि यह वही नई लड़की है, जो 25 बरस पहले हम आपके है कौन में अपनी पारिवारिकता के साथ प्रगट हुई थी। तब वह कुछ कम बोल पाती थी। वह यह नहीं बता पा रही थी कि उसका प्यार उससे अनजाने में छीना जा रहा है। आज वह बोलना सीख चुकी है- अब जो फिल्म बनेगी, वह एक नई माधुरी दीक्षित को जन्म देगी। लेकिन उसके सिरे उस पुरानी कड़ी से जुडे़ ही होंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on 12th August