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इंसानी जज्बे का इम्तिहान और बंदों के हक की ईद

सूर्यकांत द्विवेदी, स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, मुरादाबाद

धर्म के साथ पहली शर्त है- भावना। भावना के बिना धर्म को न तो जाना जा सकता है और न ही धर्म पर चला जा सकता है। इस्लाम में दो पर्व ज्यादा महत्वपूर्ण हैं- पहला, ईद-उल-फितर और दूसरा, ईद-उल-अजहा। हिजरी के अंतिम महीने में ईद-उल-अजहा का मुबारक त्योहार पड़ता है। इससे पहले हज होता है, जो इस्लाम के पांच अरकानों में से एक है। हज करने की ख्वाहिश हरेक मुसलमान की होती है। यह अल्लाह का घर है और वहां लब्बैक कहने की ख्वाहिश सबकी होती है। रमजान मुबारक के सत्तर दिनों के बाद ईद-उल-अजहा का पर्व आता है। इसके बाद हिजरी का नया साल शुरू हो जाता है- मोहर्रम। यह महीना हजरत इमाम हुसैन की शहादत से जुड़ा महीना है।

रमजान से मोहर्रम तक के तारीखी सफर की बात करें, तो इसमें कुर्बानी का जज्बा ही महत्वपूर्ण है। रमजान में हम अपनी भूख और प्यास की कुर्बानी देते हैं, तो ईद-उल-अजहा पर हम कुर्बानी की सुन्नत अदा करके अल्लाह के प्रति अपने जज्बे का इजहार करते हैं। मोहर्रम में हम अपने गम का इजहार करते हुए शहादत को याद करते हैं, यानी जज्बा मुख्य शिक्षा है। इस्लाम कहता भी है कि अल्लाह के पास तुम्हारा जज्बा जाएगा। यह जज्बा क्या है? प्रचलित परंपराओं को दोहराने का नाम जज्बा नहीं है। यह कुर्बानी करने का नाम भी नहीं है।

ईद-उल-अजहा के साथ हजरत इब्राहीम (अ.) का एक वाकया जुड़ा है। हजरत इब्राहीम ने ख्वाब देखा कि वह अपने बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी दे रहे हैं। अगले दिन उन्होंने अपने बेटे को यह वाकया बताया। हजरत इस्माइल ने कहा कि आप अपना ख्वाब और अल्लाह का हुक्म पूरा कीजिए। आप मुझे खरा पाएंगे। हजरत इब्राहीम ने हुक्म का पालन किया, पर क्या देखते हैं कि उनके बेटे सलामत हैं और दुंबा हलाल पड़ा है। यह वाकया दुंबा को हलाल करने का नहीं है। यह दरअसल उस जज्बे की परीक्षा है, जिसमें उनसे कहा जा रहा था कि अब तुम मेरे हो जाओ।

नसीहतें इशारतन दी जाती हैं। धर्मोपदेश भी संकेतों में होते हैं। कोई समझ जाता है और कोई नहीं समझता। ईद-उल-अजहा भी जज्बा-ए-तौहीद और जज्बा-ए-इंसानियत का पैगाम लेकर आता है। पैगाम एक ही है- अल्लाह को मानो। अल्लाह के बताए रास्तों पर चलो और उसकी राह में अपना सब कुछ कुर्बान कर दो। दीन के साथ दुनियावी कुर्बानी को भी इसमें अहमियत दी गई है। कहते हैं कि इबादत में खुशी के वे लम्हे अहम होते हैं, जब बंदा अल्लाह के बंदों को उनका हक देता है। उनकी मदद करता है। उनके साथ नाइंसाफी नहीं करता। वह सच्चाई के साथ व्यापार करता है, सच्चाई और ईमानदारी के साथ लोगों की हक अदायगी करता है, बेईमानी का पैसा न लेता है और न खर्च करता है। इसलिए हलाल की कमाई ( यानी मेहनत की कमाई) से ही धार्मिक कार्य करने को कहा गया है।

दूसरी बात, इस्लाम यह नहीं कहता कि कर्ज लेकर धार्मिक कार्य करो। जिनकी माली हालत अच्छी है, वे कुर्बानी की रस्म अदा करें और जो मोहताज हैं, उनमें तकसीम करें। उनको ईद की खुशी में शामिल करें, यानी कुर्बानी हरेक पर अनिवार्य नहीं है। इसी तरह, हज करने के साथ दूसरों को हज कराने का सवाब भी कई गुना है। आपने कितनी बार हज किया, अच्छा किया, लेकिन कितने लोगों को अल्लाह के घर की जियारत कराई, यह भी अहम है। सामाजिक जिम्मेदारियों से बचने का नाम इस्लाम नहीं है। दीन के साथ दुनियावी जिम्मेदारियों के लिए दी गई आपकी कुर्बानियां महत्वपूर्ण हैं। अकेले खुशी मनाने का नाम ईद नहीं। लेकिन नसीहतों के बावजूद विसंगतियां भी कम नहीं हैं।

कुर्बानी की रस्म अदा करना लगातार महंगा होता जा रहा है। कुछ ऐसी भी बातें सामने आती हैं, जिनकी सख्त मनाही है। पैगाम है, कुदरत की कायनात से मोहब्बत करो। सबके लिए दुआ करो तो ऐसे, जैसे तुम अपने लिए करते हो। जब उससे मांगो, तो जायज मांगो। नेकियां मांगो, खुशियां मांगो और जज्बा मांगो। सामाजिक मूल्यों, जिम्मेदारियों को पूरा करने, पूरी कायनात का ख्याल रखने और मजलूमों से मोहब्बत का इससे बढ़कर क्या संदेश हो सकता है! प्यार-मोहब्बत, खुलूस, मखलूक से मोहब्बत ही तो ईद है। कहा भी गया है कि हर उस चीज से मोहब्बत करो, जिससे अल्लाह मोहब्बत करता है।

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  • Web Title:Hindustan Nazaria Column on 12th August