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अच्छी क्रिकेट के पीछे कुछ खराब नियम-कायदे

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने क्रिकेटर दिनेश कार्तिक को कारण बताओ नोटिस थमाकर सबको चकित कर दिया। नोटिस में उनके वार्षिक अनुबंध को रद्द करने की धमकी दी गई थी। हवा उल्टी देख कार्तिक ने तत्काल बिना शर्त माफी मांगते हुए जवाब दाखिल कर दिया। इसी में बुद्धिमानी थी, क्योंकि बीसीसीआई के साथ विवाद होने पर उसके सामने पूर्ण समर्पण कर देना सबसे सुरक्षित नीति है। एक खराब पिच पर यही सही बल्लेबाजी कला है। खिलाड़ी जानते हैं, यह एक ऐसा ‘खेल’ है, जिसे वे जीत नहीं सकते। तत्काल एक माफी से ही राहत हासिल होती है। एक कड़ी चेतावनी जारी होती है और उसके बाद सब कुछ ठीक हो जाता है। 

बताया जाता है, वेस्ट इंडीज में एक टी-20 टूर्नामेंट में दिनेश कार्तिक की उपस्थिति मात्र से बीसीसीआई आग-बबूला हो गया। यह जाहिर बात है, जिस निर्णायक ने नोटिस जारी किया है, उसे ही फैसला देने का अधिकार है। केंद्रीय रूप से अनुबंधित कोई भी खिलाड़ी किसी भी वन-डे लीग का अनुमोदन-समर्थन नहीं कर सकता। यदि  यही आरोप है, तो कार्तिक ने लक्ष्मण-रेखा पार की है। तब भी यह पूछना गलत नहीं कि क्या मात्र उपस्थिति से किसी विदेशी लीग का समर्थन हो जाता है। ऐसा होता भी है, तो क्या इसी आधार पर किसी का अनुबंध रद्द कर देना तार्किक है? खिलाड़ियों पर कड़ी पाबंदियां लगाई जाती हैं और उन्हें सब स्वीकार करना पड़ता है। 

एक खिलाड़ी किसी अनुबंध की तुलना में भारतीय क्रिकेट के प्रति ज्यादा जवाबदेह होता है। सामान्यत: अनुबंध ऐसे होते हैं, जिन पर खिलाड़ी बिना पढ़े हस्ताक्षर कर देते हैं। केवल भत्ते-भुगतान वाले खंड को ही खिलाड़ी देखते होंगे। बहुत कम लोग होते हैं, जो लागू होने वाली शर्तों को पूरा पढ़ते हैं। अनेक ऐसी शर्तें बहुत छोटे आकार में मुद्रित रहती हैं, जिन्हें पढ़ना दुष्कर कार्य होता है। ठीक इसी तरह से खिलाड़ी भी बीसीसीआई/ आईसीसी की डोपिंग, नस्लभेद, भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों को सावधानीपूर्वक नहीं पढ़ते हैं। बीसीसीआई ने हाल ही में इन तमाम मसलों पर खिलाड़ियों को शिक्षित करने के लिए एक पुस्तिका का प्रकाशन किया है, लेकिन खिलाड़ियों को भी क्या यह पता है? त्रासद यह कि जो अधिकारी इन दिशा-निर्देशों को जारी करते हैं, वे भी उसकी बातों-तथ्यों को लेकर भ्रम में रहते हैं। बीसीसीआई का अनुबंध सख्त व बाध्यकारी होता है, इसमें खिलाड़ियों को होने वाले भुगतान-फायदा, उपलब्धता, प्रदर्शन, क्षमता, फिटनेस संबंधी तकनीकी बातें होती हैं। अनुबंध में आचार-व्यवहार, पेशेवर रवैया, क्रिकेट के मूल्य व बीसीसीआई की छवि की रक्षा के बिंदु भी होते हैं। मुख्य अनुबंध में व्यावसायिक जिम्मेदारियों की सूची होती है। प्रायोजक से जुड़ी प्रतिबद्धताएं, बीसीसीआई का प्रचार, आधिकारिक भागीदारों के हित में प्रतिस्पद्र्धा विरोधी शर्त, मीडिया भागीदारी, अनेक खतरनाक खेलों से बचने की शर्त, गैर-अनुमोदित मैचों में न शामिल होने संबंधी शर्तें भी अनुबंध में होती हैं। 

कई बार मामूली उल्लंघनों को नजरंदाज भी कर दिया जाता है। कई स्टार खिलाड़ी वेश-भूषा संबंधी शर्तों का उल्लंघन करते रहे हैं। कई बार अपने वस्त्र पर गैर-आधिकारिक लोगो लगा लेते हैं। महेंद्र सिंह धौनी ने बलिदान का लोगो लगाया था, यह आचार संहिता का उल्लंघन था, लेकिन उन्हें न केवल छोड़ दिया गया, बल्कि राष्ट्रहित के नाम पर उनका समर्थन भी किया गया। बिना मंजूरी मीडिया से बात करने पर पाबंदी है, लेकिन अपने व्यक्तिगत प्रायोजक द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में इसका उल्लंघन हो जाता है। टीम चयन को लेकर किसी भी टिप्पणी की पूरी तरह मनाही है, पर मीडिया के जरिए खिलाड़ियों की बातें सामने आ जाती हैं। मनोज तिवारी, शेल्डन जैक्सन और जलज सक्सेना ने घरेलू क्रिकेट में प्रदर्शन संबंधी सवाल उठाए थे। मुरली विजय ने चयन  मामले में संवाद के अभाव का रोना रोया था। अंबाती रायडू ने थ्रीडी प्लेयर और थ्रीडी ग्लासेस वाली प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर जाहिर की थी। यहां तक कि शुभमन गिल ने भी चयन न होने पर निराशा का इजहार किया था। दिनेश कार्तिक तो आगे बढ़ गए, पर किसी को तो सवाल खड़ा करना पड़ेगा? जो व्यवस्था युवराज जैसे रिटायर्ड खिलाड़ी को बाध्य करती है कि वह खेलने के लिए अनुमति लें, उस पर एक बार फिर गौर करना चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan nazaria column on 12 September