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आर्थिक रफ्तार के लिए कुछ बुनियादी सुधार

अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के पारंपरिक समाधान जब ज्यादा कारगर होते नहीं लग रहे हैं, तब कोई भी व्यक्ति हालात में बदलाव लाने के लिए बुनियादी या जमीनी आवाजों को सुनना पसंद करेगा। आज चंद लोगों में आय का वितरण करने की बजाय लाखों लोगों की हाथों में धन पहुंचाने की व्यवस्था करना ज्यादा फायदेमंद सिद्ध हो सकता है। ज्यादा लोगों के हाथों में नकदी आएगी, तो खर्च बढ़ेगा। यह जाना-पहचाना आर्थिक सिद्धांत है। लेकिन सुधार पर चिंतन करने वालों में से ज्यादातर ने धन के वितरण जैसे समाधान को नजरंदाज ही किया है। आइए, हम कोशिश करते हैं। 

सरकार अपने सभी कर्मचारियों को अग्रिम भुगतान कर दे, ताकि वे अनाज, दाल, तेल, चीनी, मसालों, कपड़ों आदि की वार्षिक खरीद कर सकें। समाज खुद सुनिश्चित करे कि अग्रिम भुगतान का किसी और मकसद में इस्तेमाल नहीं होगा। ऐसी आय के वितरण की लागत कम होती है, इसमें गड़बड़ी भी कम होती है, यह ज्यादा समय तक टिकती है और बाजार में नकदी बढ़ाने में मदद करती है। निजी क्षेत्र को इलेक्ट्रॉनिक वाहन खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। दिवाली या दशहरे पर आवश्यक सामान, घरों के अन्य सभी दीर्घकालिक उपयोग के सामान की खरीद को प्रोत्साहन देना चाहिए। बड़े पैमाने पर पूंजी लगाने के साथ कर संबंधी प्रोत्साहन देने से भी मांग में तेजी आएगी। 

बता दें कि कुछ रेलवे स्टेशनों पर भोजन आपूर्ति के लिए नाबार्ड द्वारा शुरू किए गए प्रयोग को कम से कम आधे रेलवे स्टेशनों पर लागू करना चाहिए। अभी कुछ ऐसे रेलवे स्टेशन हैं, जहां महिला स्व-सहायता समूह यात्रियों को घर जैसा भोजन उपलब्ध कराने के विस्तृत कार्य में लगे हैं। नाबार्ड ऐसे समूहों को अग्रिम धन का भुगतान कर सकता है, ताकि बाजार में सक्रिय पूंजी की जरूरतें पूरी करने में मदद मिले। एक वर्ष तक देश के सभी भोजों, उत्सवों, कार्यक्रमों में बाजरे या ज्वार के कम से कम दो व्यंजन अवश्य परोसे जाएं। पूर्वोत्तर, जम्मू-कश्मीर और मध्य भारत के कुछ व्यंजन, जूस, जैम परोसे जा सकते हैं। बाजार को मुश्किलों की निगरानी करने दें। हर व्यवसाय को संभावित मांग से जोड़कर देखा जाए। 

पर्यटन के लिए एलटीसी (अवकाश यात्रा रियायत) दी जाए। संभावनाशील पर्यटन स्थलों पर टैंट-आधारित आवास सुविधा को प्रोत्साहन मिले। ठीक इसी तरह कंपनी सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) निवेश को विज्ञान, तकनीकी, शैक्षणिक नवाचार के क्षेत्र में प्रोत्साहन दिया जा सकता है। सभी आवासीय कॉलेजों, स्कूलों और सार्वजनिक अस्पतालों में मेस या रसोईघरों को सेहतमंद बहु-अनाजीय खाद्य, ऑर्गेनिक सब्जियां सप्ताह में कम से कम एक बार परोसने के लिए कहा जा सकता है।  

स्वास्थ्य सुधार, टिकाऊ कृषि, गैर-कृषि उद्यम के बेहतर तरीकों के बारे में समाचार पत्रों में प्रकाशन होते रहना चाहिए। इसके पीछे लक्ष्य उत्पादन और सेवा करने की सीमित क्षमता वाले छोटे-मझोले उत्पादकों की मांग को प्रोत्साहित करना है। सभी रेडियो स्टेशनों को यह सलाह दी जा सकती है कि वे लोकप्रिय विविध भारती सेवा में स्थानीय उद्यमियों और सेवा प्रदाताओं के विज्ञापन रियायती दर पर कम से कम तीन घंटे प्रसारित करें। 

ग्रामीणों को ई-मार्केट के अनुकूल बनाने के लिए प्रत्येक पेट्रोल पंप स्टेशन पर व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए। डाक नेटवर्क डेढ़ लाख ग्रामीण केंद्रों तक पहुंच रखता है और 6,50,000 गांवों की सेवा करता है। इस नेटवर्क का इस्तेमाल अधूरी मांगों और अबाध आपूर्ति के लिए किया जा सकता है, इसके लिए सहयोग करने के लिए अनेक संगठन तैयार हैं। आज स्वयं सहायता समूहों के लाखों-करोड़ों रुपये की बचत जमा है, लेकिन ये समूह परस्पर एक-दूसरे के उत्पाद व सेवा खरीदने-बेचने के अभ्यस्त नहीं हैं। 

बारिश के तत्काल बाद कुओं, कुंडों को गहरा करने, निजी और सार्वजनिक भूमि पर जलाशय तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर सार्वजनिक कार्यक्रम शुरू होने चाहिए। मनरेगा के तहत बड़े पैमाने पर जल संचयन, संरक्षण और वृक्षारोपण किया जा सकता है। इससे छोटे-छोटे जंगल बनाए जा सकते हैं। सुधार के ऐसे अनेक विचार हो सकते हैं और समाधान की दिशा में हर किसी को सोचना होगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan nazaria column on 10 september