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इस पर्वत शृंखला से ऊंची हो रही है उसकी पीर

दुनिया में ऐसी कोई पर्वत शृंखला नहीं है। अकेला हिमालय भारत और आसपास के 18 देशों के जनजीवन को संवारता है। इसका भूगोल सबसे अलग है। इसका आकार अपने आप में अद्भुत है। यही कारण है कि लगभग हर जगह इसे प्रभु का वास भी माना जाता है। बंगाल और अरब सागर में जो भी बरसाती बादल उठते हैं, उनका कारण यही है। हमारा मानसून हमेशा ही इसका कर्जदार रहता है। यह हिमालय ही है, जिसके कारण दूसरी तरफ से शीत लहर भारत के हिस्से में नहीं आती और साथ में मानसून के कारण आज हमें मरुस्थलीय परिस्थितियां नहीं झेलनी पड़तीं। आज अपना देश खुद को सुरक्षित पाता है, तो यह हिमालय की वजह से ही है, जिसने दुनिया के बडे़ पड़ोसी देशों से इसको जबरदस्त सुरक्षा मुहैया कराई है। पानी जो देश की बड़ी जरूरत है, वह हिमालय की ही देन है। इनमें गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, सिंधु जैसी बड़ी नदियां हैं। इसके ग्लेशियर भूखंड और तमाम नदियां सारे देश को पानी और इससे जुडे़ हुए तमाम उत्पाद देती हैं। हरित क्रांति हो या फिर श्वेत क्रांति, सबकी जननी यही नदियां हैं।

हिमालय उपजाऊ मिट्टी का एक बड़ा स्रोत है। यहां की मिट्टी से देश के नौ राज्यों में खेती लहलहाती है। हर साल तमाम खनिजों से युक्त 1,920 लाख टन उपजाऊ मिट्टी हिमालय से उतरकर पूरे उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सों में पसर जाती है। इसी पर खड़े होकर हमारी फसलें लहराती हैं। हिमालय सिर्फ हमारे भूगोल का मनोहर भूभाग ही नहीं, यह हमारी खाद्य सुरक्षा की गारंटी भी है। हिमालय के ऐसे उपकार अगर गिनाने लग जाएं, तो कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं।

लेकिन इतनी बड़ी सेवा करने वाला हिमालय आज खुद बेहतर स्थिति में नहीं कहा जा सकता। इससे भी अधिक दुख की बात यह है कि आज तक इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर न कभी गंभीर चिंतन हुआ और कोई न गंभीर चर्चा हुई। चाहे वह हिमालयी राज्यों की सरकारें हों या केंद्र की, सभी जगह इससे जुड़े मसले नजरंदाज होते रहे। कभी एक मिशन के रूप में हिमालय के स्वास्थ्य की चिंता नहीं की गई। इस बार की बाढ़ को ही देख लें, हिमालयवासियों ने ही नहीं, पूरे देश ने जान-माल का बड़ा नुकसान झेला है। उत्तराखंड, हिमाचल, असम, मेघालय समेत सभी पहाड़ी राज्यों में इस बार के मानसून ने काफी तबाही मचाई है। इसके मैदानी क्षेत्रों की भीषण बाढ़ का भी बड़ा कारण हिमालय की नदियां ही हैं। 

हमने जल संसाधन और इसके साथ ही ऊर्जा उत्पादन को जोड़ने के नाम पर जो कुछ किया, उसी का परिणाम है कि आज मानसून में हिमालय से लेकर समुद्र तट तक देश का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न की स्थिति में दिखता है या फिर गरमियों में हम सूखे की बड़ी मार झेलते हैं। एक और बात ध्यान देने की है कि हिमालय सिर्फ हमारी प्रकृति का रक्षक ही नहीं, यह नौ हिमालयी राज्यों की 3.8 करोड़ आबादी का घर भी है। कुदरत की रक्षा में ये लोग हिमालय के सहयोगी भी हैं।

हमारी समझ में कभी भी हिमालय का पारिस्थितिकी विज्ञान नहीं आया। हमारी यह बड़ी भूल हमें आज एक ऐसी स्थिति में पहुंचा चुकी है कि हम हर वर्ष सूखे की मार झेलते हैं या फिर बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं। अभी भी समय है कि हम हिमालय को समझें, क्योंकि यह अद्भुत पर्वत शृंखला, जो इस देश के लिए वरदान है, हमारा साथ छोड़ रही है। दुर्भाग्य यह है कि हम अपनी जिद में यहां के विकास की शैली को मैदानी क्षेत्रों जैसा ही ले रहे हैं। इसे देश की बड़ी संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए और केंद्र को गंभीरता के साथ यह मानना चाहिए कि हिमालय देश के जान-माल व अस्मिता से जुड़ी पर्वत शृंखला है। देश की हवा, मिट्टी और पानी की व्यवस्था हिमालय ही करता है। अगर यह नहीं रहा, तो देश की एक बड़ी आबादी इन सबके लिए तरस जाएगी। अभी भी हमारे हिस्से में एक अवसर बचा है कि हम सब मिलकर इसके संरक्षण के लिए आगे आएं। 

इस समय हमारी संसद में एक बड़ी बहस की आवश्यकता है, ताकि हिमालय को एक मिशन मोड के रूप में संरक्षण की पहल की जा सके। साथ ही अन्य क्षेत्रों में भी इसे लेकर चर्चा चलनी चाहिए। हिमालय का ध्यान नहीं दिया गया, तो अविरल नदियों का हमारा सपना कभी ठीक तरह से पूरा नहीं होगा। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan nazaria column on 09 September