DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

भारत की साख और शक्ति के लिए जरूरी पहल 

भारत चंद्रयान-2 के जरिए अंतरिक्ष विज्ञान क्षेत्र में नई कहानी लिख रहा है। अमेरिका, रूस और चीन जैसे अन्य देश पहले चंद्रमा पर मानव और रोवर लैंडिंग कर चुके हैं। भारत पहले चंद्रमा और मंगल के लिए अभियान कर चुका है। यह बहुचर्चित तथ्य है कि चंद्रयान-2 यान को चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर उतरकर काम करना है, यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पहले कोई यान नहीं गया है। लैंडिंग से पहले सही स्थान का निर्धारण करना और उसके बाद सही लैंडिंग एक अत्यंत जटिल मिशन है। ध्यान रहे, चीन ने परिष्कृत अंतरिक्ष क्षमताओं का विकास किया है, चीन के यान ने चांद के निकटतम क्षेत्र में उतरने की कोशिश की थी, हालांकि वह इसी वर्ष चांद पर दूसरी ओर उतरने में कामयाब हुआ है। हालांकि इसरो चंद्रयान या मंगलयान जैसे जटिल या जटिल मिशनों को पारंपरिक रूप से नहीं देख रहा है, इसलिए भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अधिक परिपक्व रूप में विकसित नजर आता है।

यह दुनिया में बढ़ती हुई भू-राजनीतिक प्रतिस्पद्र्धा का भी प्रतिबिंब है, जिसकी शुरुआत अंतरिक्ष में हो चुकी है। शीत युद्ध के दौरान जो अंतरिक्ष प्रतिस्पद्र्धा देखी गई थी, वह 1980 के दशक की शुरुआत में कुछ हद तक फीकी पड़ गई थी, क्योंकि अमेरिका और सोवियत संघ, दोनों ही अपनी अलग-अलग उपलब्धियों के पीछे लग गए थे, उनकी प्राथमिकताएं बदल गई थीं। शीत युद्ध के दौर में दिखी डींगें हांकने की परंपरा एक समय बाद अपना महत्व खोने लगी थी। अंतरिक्ष विज्ञान में ऐसे प्रयासों को बहुत अधिक वैज्ञानिक या तकनीकी मूल्य से जोड़कर नहीं देखा जा रहा था। चांद पर इंसान के पहुंचने की जो उपलब्धि हासिल हुई थी, वह एक तरह से दो शक्तियों के बीच शीत युद्ध का नतीजा थी। 

लेकिन अब वैसी ही प्रतिस्पद्र्धा फिर शुरू हो गई है। इस दिशा में चीन और जापान भी बड़े खिलाड़ी के रूप में शामिल हैं और अंतरिक्ष विज्ञान क्षेत्र में अपने-अपने प्रयासों को सफल बनाने में जुटे हैं। अंतरिक्ष में ऐसी अनेक नई गतिविधियां हैं, जो प्रतिस्पद्र्धा को बढ़ा रही हैं। उदाहरण के लिए, अंतरिक्ष आधारित खोज में पश्चिम और एशिया के कुछ देश बहुत दिलचस्पी लेने लगे हैं। यहां तक कि लक्जमबर्ग भी इस संबंध में महत्वपूर्ण निवेश कर रहा है। ये देश अंतरिक्ष में अपनी खोज का व्यावहारिक महत्व देखने लगे हैं। इस स्पद्र्धा में ये देश अपने लिए सुरक्षा भी तलाश रहे हैं। शीत युद्ध के बाद हुई यह एक महत्वपूर्ण प्रगति है। नए सिरे से शुरू हुई अंतरिक्ष प्रतिस्पद्र्धा के केंद्र में चीन है और वह अमेरिका और रूस, दोनों से मुकाबले की महत्वाकांक्षा रखता है। चीन के प्रयासों से एशिया और उसके बाहर भी हलचल तेज हुई है। 

जनवरी 2007 में पहले सफल चीनी एंटी-सैटेलाइट (एएसएटी) परीक्षण ने एक नई प्रतियोगिता को जन्म दिया है, जिससे भारत को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिली और उसने इस वर्ष की शुरुआत में अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। चीन की ऐसी गतिविधियों की वजह से दूसरे देशों और भू-राजनीतिक समीकरणों पर असर पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, चीन के व्यवहार ने हाल के वर्षों में भारत-जापान रणनीतिक साझेदारी को बहुत अधिक मजबूत बना दिया है, जिसमें अंतरिक्ष विज्ञान में परस्पर सहयोग भी शामिल है। चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम विकास के कारण भारत के अलावा, अमेरिका और जापान सहित दूसरे देश भी प्रेरित हुए हैं। अन्य देशों की कोशिश है कि वे इस मोर्चे पर चीन से कहीं पिछड़ न जाएं। 

बेशक, दुनिया की सभी प्रमुख शक्तियों द्वारा सुरक्षा और सैन्य उद्देश्यों के लिए अंतरिक्ष में बढ़ती पैठ की अनदेखी भारत नहीं कर सकता है। चीन कई क्षेत्रों में आगे बढ़ चुका है, लेकिन भारत को द्विपक्षीय और क्षेत्रीय संदर्भ में सक्रिय रहना होगा। ऐसा करने के लिए भारत को चीन के साथ थोड़ा-सा तालमेल बैठाना होगा। वैसे तो चंद्रयान-2 मिशन का प्रत्यक्ष सामाजिक या आर्थिक लाभ नहीं हो सकता, लेकिन भारत की साख के लिए यह जरूरी है कि हम अपनी अंतरिक्ष आधारित क्षमताओं का अवश्य विकास करें। इसके अलावा यह भी ध्यान रखना है कि इस दिशा में भारत का सफल होना उसे उपग्रह प्रक्षेपण के मामले में और आकर्षक देश बनाएगा। अंतरिक्ष या उपग्रह के क्षेत्र में दुनिया के उभरते देशों के लिए भारत एक मुकाम बन जाएगा। ये सभी फायदे भारत के अंतरिक्ष उद्यम को जरूरी बना देते हैं। 

(ये लेखिका के विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:hindustan nazaria column on 07 September