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8 दिसंबर, 2019|6:50|IST

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ताकि काम लोगों के पास जाए लोग काम के पास नहीं

pradeep s mehta

अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो शुरुआती फैसले लिए हैं, उनमें से एक है, परस्पर जुड़ी दो अलग-अलग समितियों का गठन। पहली समिति विकास और निवेश पर गठित की गई है, जबकि दूसरी रोजगार और कौशल विकास पर। सरकार का यह कदम बताता है कि 2024 तक अर्थव्यवस्था के 50 खरब डॉलर से पार जाने का सपना देख रहे भारत का मौजूदा संकट कितना गंभीर है। ज्यादातर भारतीयों को वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन से जोड़ने में हमारी अर्थव्यवस्था नाकाम रही है। हमारे अधिकांश कर्मियों की विशेषता कम आमदनी और निम्न से मध्यम कौशल है। यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक है, जो मुख्य रूप से उपभोग खर्च पर आधारित है। शीर्ष 10 करोड़ अमीर आबादी में मांग का स्थिर हो जाना इस तस्वीर को और स्याह बना रही है। 

केंद्र सरकार पहले ही गैर-जरूरी आयात को कम करने, अंतर पाटने के लिए घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहित करने और निर्यात बढ़ाने के कदम उठा चुकी है। खास इलाकों में मूल्य शृंखलाओं को पूरा करने के लिए देश भर के मैन्युफैक्र्चंरग यानी विनिर्माण कार्यों में जुटे उद्यमों की पहचान करना भी उसने शुरू कर दिया है। राज्य सरकारों को भी इस ओर बढ़ना चाहिए। इसके लिए उन्हें ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा दें और स्थानीय लोगों के लिए अच्छी आमदनी के अवसर पैदा करें। इस लिहाज से ‘अल्गोमेरेशन इकोनॉमी’ यानी  स्थानीय अर्थव्यवस्था काफी महत्वपूर्ण बन जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में कंपनियां, सेवाएं और उद्योग आस-पास हों और एक-दूसरे की नजदीकी की वजह से कम लागत और कार्य-कुशलता में वृद्धि के रूप में लाभान्वित हो सकें। मगर ‘अच्छी और बेहतर नौकरी’ के विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए हमने जो अध्ययन किया, उसमें यही पाया कि अपने देश में ऐसी व्यवस्था फिलहाल नगण्य है। मसलन, अध्ययन में हमने यही देखा कि राजस्थान के करघा और कपड़ा उद्योगों में शामिल ज्यादातर कामगार उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के प्रवासी हैं। इन श्रमिकों के कौशल का इस्तेमाल करने वाले उद्योग क्या इन लोगों के आसपास स्थापित नहीं किए जा सकते? ‘अल्गोमेरेशन इकोनॉमी’ का अभाव न्यूनतम मजदूरी को भी प्रभावित करता है, जिसका असर श्रमिकों की खपत क्षमता पर पड़ता है।

‘अल्गोमेरेशन इकोनॉमी’ का फायदा तभी मिलेगा, जब एक सक्षम नियामक व्यवस्था बनाने के अलावा, मैन्युफैक्र्चंरग गुटों को जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्थानीय कुशल श्रमिक और कारोबार से जुड़ी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। इसके लिए लोगों को अच्छी नौकरियां दे सकने वाली नीतियां बनानी होंगी, ताकि खपत की मांग बढ़ाई जा सके। जाहिर है, हमें देश के कई हिस्सों में आत्मनिर्भर समूह बनाने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि वे उद्योग की बेहतरी के साथ-साथ श्रमिकों की भलाई के लिए भी काम करें। इस तरह की नीतियों से स्थानीय कार्यबल की हिस्सेदारी बढ़ने की भी संभावना है और राज्य सरकारें श्रमिकों के हित में और अधिक संवेदनशील हो सकेंगी। इससे उद्योगों की लागत भी कम हो सकती है। हालांकि, सिर्फ खपत की मांग बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, पर्याप्त निवेश के बिना समाधान अधूरा होगा। आज भारत की जो हैसियत है, उसमें निवेश-आधारित विकास मॉडल की बजाय उपभोग-आधारित विकास मॉडल पर विश्वास करना उचित नहीं है। हमें दोनों की जरूरत है, खासतौर से यह देखते हुए कि आवश्यक वस्तुओं के निर्यात के रास्ते तंग होने लगे हैं।

भारत के नीति-निर्माताओं के सामने विकल्प कठिन है। विकास के निश्चित स्तर का आनंद उठाने के लिए बजट अनुशासन को बनाए रखने, महंगाई कम करने और चालू खाते के घाटे को रोकने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी होगी। हालांकि देश की संरचनात्मक मुश्किलों को दूर किए बिना यदि हम ऐसा करेंगे, तो फिर उन्हीं रास्तों पर आगे बढ़ेंगे, जो दीर्घावधि में चुनौतियों को दूर करने में सक्षम नहीं हैं। हमें ऐसे संरचनात्मक बदलावों की दरकार है, जो लोगों को अच्छी नौकरियां और आजीविका दे सकें  और आर्थिक रूप से सक्रिय समूहों की संख्या बढ़ा सकें। इसका अर्थ है कि हमें समान चश्मे से खपत और निवेश को देखना होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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