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एक जरूरी विमर्श से मुंह मोड़े बैठा समाज

भवेश झा,  लोक-स्वास्थ्य विशेषज्ञNeelesh Singh
Wed, 22 Dec 2021 10:06 PM
एक जरूरी विमर्श से मुंह मोड़े बैठा समाज

एक बेहतर शासन-व्यवस्था में आंकड़े काफी अहमियत रखते हैं। इनके संग्रह का उद्देश्य किसी समस्या का ठोस समाधान ढूंढ़ना होता है। लेकिन कुछ आंकड़े लोक-स्वास्थ्य के नजरिये से काफी महत्वपूर्ण होने के बावजूद सामाजिक विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाते। आत्महत्या एक ऐसी ही उपेक्षित समस्या है। हाल ही में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने सुसाइड्स ऐंड एक्सीडेंटल डेथ्स इन इंडिया  नाम की रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष आत्महत्या से होने वाली मौतों की संख्या डेढ़ लाख को पार कर गई। यह एक साल में खुदकुशी से होने वाली मौत का सबसे बड़़ा आंकड़ा है। 2019 के मुकाबले 2020 में आत्महत्या से मृत्यु के आंकड़े में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। जाहिर है, कोरोना और लॉकडाउन की वजह से उपजी विपरीत आर्थिक परिस्थितियों ने असंगठित क्षेत्र और व्यापारी वर्ग को काफी प्रभावित किया है। साल 2019 की तुलना में 2020 में व्यापारियों की खुदकुशी में 50 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। 
आत्महत्या की इस बढ़ती दर को सिर्फ कोविड या लॉकडाउन के परिप्रेक्ष्य में देखना सही नहीं होगा, क्योंकि महामारी से पहले भी खुदकुशी एक बड़ी जन-स्वास्थ्य समस्या रही है। साल 2019 के ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज’ (जीबीडी) अध्ययन के अनुसार, 15 से 39 आयु वर्ग में आत्महत्या मौत का सबसे बड़ा कारण है। इसका मतलब यह है कि आत्महत्या हमारे नौजवानों के लिए सबसे बड़ा अदृश्य खतरा बनती जा रही है। लेकिन हाल के कुछ चर्चित व्यक्तियों की खुदकुशी से जुड़ी बहसों को देखें, तो पता चलता है कि ऐसी चर्चाएं सनसनीखेज आरोप-प्रत्यारोपों तक सिमटकर रह जाती हैं। यही नहीं, इसे सामाजिक कलंक के रूप में देखने की रूढ़ि परिजनों को खुलकर शोक प्रकट करने भी नहीं देती। पीड़ित परिवारों को किसी प्रकार का समर्थन नहीं मिलता। आत्मग्लानि व पीड़ा उन्हें अकेले ही भोगनी पड़ती है। 
हमारे देश में आत्महत्या को एक निजी समस्या के तौर पर पेश किया जाता है। इसे मानसिक कमजोरी या रोग से जोड़कर देखा जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि लगभग 50 प्रतिशत मामले ही ऐसे होते हैं, जिनमें किसी प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य-समस्या रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि आत्महत्या को रोकना संभव है और इसकी रोकथाम के कारगर तरीके भी मौजूद हैं। इसके लिए बहुआयामी प्रयास करने होंगे। आत्महत्या की रोकथाम में जागरूकता कार्यक्रम चलाने, मानसिक स्वास्थ्य सेवा को मजबूत करने, आपात हेल्पलाइन, सामाजिक सुरक्षा व राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम जैसे प्रयास महत्वपूर्ण हैं। इस रोकथाम में विभिन्न क्षेत्रों के बीच की साझेदारी अहम है। जैसे, विद्यार्थियों में इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग को मिलकर काम करना होगा। छात्रों में तनाव के बिंदुओं को पहचानकर शैक्षणिक परिसरों को खुशनुमा बनाने के प्रयास करने पड़ेंगे। 
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग आत्महत्या से ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। पाया गया है कि लगभग 95 फीसदी आत्महत्या के शिकार लोग सालाना पांच लाख रुपये से कम आय वाले वर्ग से आते हैं। नीति आयोग द्वारा हाल ही में जारी बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार, हर चार में से एक भारतीय गरीब है। इससे साफ है, गरीबी उन्मूलन व सरकार की अन्य कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से भी आत्महत्या की रोकथाम में मदद मिल सकती है।  
खुदकुशी को रोकने की मुहिम में सामाजिक भागीदारी काफी अहम है, क्योंकि इसको लेकर हमारे समाज में कलंक, अपमान का बोध बहुत गहरा है। इसी वजह से लोग मदद मांगने आगे नहीं आते। वास्तव में, परिवार और आस-पड़ोस में कठिन हालात से गुजर रहे लोगों से जुड़कर, उनका हौसला बढ़ाकर हताशा में डूबने से उन्हें बचाया जा सकता है। यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि समुदाय के लोग ही स्थानीय जरूरतों व प्राथमिकताओं की बेहतर पहचान करके समाधान खोज सकते हैं। इसलिए आत्महत्या की रोकथाम के विमर्श में ज्यादा से ज्यादा जन-भागीदारी से सुखद परिणाम हासिल करने की कोशिश होनी चाहिए, वरना यह मुद्दा सरकारी रिपोर्टों और शोध पत्रों से बाहर नहीं निकल पाएगा।  
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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