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जाति, समाज के अंधेरे पर शानदार सिनेमाई रोशनी

swara bhaskar  film actress  file pic

पिछले कुछ वर्षों से मुख्यधारा मुंबइया सिनेमा (बॉलीवुड) का भारतीय राजनीति और समाज से संबंध विवादित रहा है। अपने समय के चुभते सामाजिक मुद्दों के प्रति सामूहिक चुप्पी साधने के लिए हमारी आलोचना होती रही है। भारतीय परंपराओं और रीति-रिवाजों के प्रतिगामी पक्षों का उत्सव मनाने और समस्यात्मक हिंसा को वैधता प्रदान के लिए हमें जाना जाता है। मजरूह सुल्तानपुरी के प्रकरण के बाद बॉलीवुड ने एक लंबा रास्ता तय किया है। मजरूह को जेल में समय बिताना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करने वाली नज्म पर खेद जताने से इनकार कर दिया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि विवाद की आंच मजरूह के फिल्मी करियर पर नहीं आई थी। 
 

पिछले सप्ताह बालीवुड की ओर से आश्चर्यजनक रूप से साहसी और बेबाक एक फिल्म आई है। फिल्म आर्टिकल 15 ने मुख्यधारा बॉलीवुड में अंतत: जाति के अंधेरे पर गौर किया है। हालांकि यह कोई ऐसी पहली फिल्म नहीं है, जिसने भारत में जातिगत सच से जुड़े अनुभव और मुद्दे को उठाया है। आक्रोश, सद्गति, दामुल  जैसी हिंदी फिल्में और संस्कार व चोमानाडुडी जैसी कन्नड़, फंद्री  व सैराठ जैसी मराठी फिल्म के अलावा भी अनेक फिल्में हैं। हालांकि ये फिल्में न्यू वेव और कला श्रेणी के सिनेमा के दायरे में रही हैं। सैराठ  को छोड़ दीजिए, तो इनमें किसी भी फिल्म को बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के लिए याद नहीं किया जाता। इसीलिए मैं आर्टिकल 15  को दशक की सबसे साहसी बॉलीवुड फिल्म मानती हूं। यह फिल्म वर्ष 2014 में बड़ौन में हुए बलात्कार मामले से प्रेरित है। यह विशेषाधिकार प्राप्त, कुलीन, नवनियुक्त, ईमानदार पुलिस वाले की कहानी है। यह पुलिसवाला भारत में प्रचलित जाति आधारित भेदभाव की भयावह गहराइयों को उजागर करता है। मसान  फिल्म ने जहां जाति के मनोवैज्ञानिक पक्ष को देखा था, वहीं आर्टिकल 15 जाति को केंद्र में रखते हुए सामाजिक संबंधों के सत्ता समीकरणों को उधेड़ती है। 
 

विरोधी वैचारिक समूहों ने इसकी आलोचना की है। दोनों ही तरह से आलोचना हो रही है। फिल्म को ब्राह्मण विरोधी ठहराया जा रहा है, तो दूसरी ओर, इसे पर्याप्त उग्र न मानते हुए ब्राह्मण उद्धारकर्ता का महिमामंडन करने वाली फिल्म बताया जा रहा है। मेरे लिए फिल्म इसलिए सफल है, क्योंकि वह इन दोनों में से कुछ नहीं करती। 
 

लेखक अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी एक ऐसे ब्राह्मण नायक अयान रंजन का उपयोग करते हैं, जो संभ्रांत शिक्षा प्राप्त, शहरी, विदेश यात्राएं कर चुका, उच्च मध्य वर्गीय, सवर्ण है। ऐसे नायक का उपयोग फिल्म में इसलिए किया गया है, क्योंकि ऐसा नायक किसी भी बड़े शहर में बहुत आसानी से, अपनी सहूलियत, शुभेच्छा, अच्छाई के साथ जिंदगी बिता सकता है और उसे जाति व्यवस्था का कतई अनुभव भी नहीं होगा। जाति से अनभिज्ञ होना आधुनिक भारत में अपने आप में एक ऐसी सहूलियत है, जिसका लाभ सवर्ण ही ले सकते हैं। जब बॉलीवुड ने ‘चुप्पी में सुरक्षा’ का फॉर्मूला खोज रखा है, तब यह लगभग अविश्वसनीय है कि एक व्यावसायिक फिल्म न केवल सामाजिक ढांचे की आलोचना प्रस्तुत कर रही है, बल्कि तटस्थता की उस अवधारणा को भी निशाना बना रही है, जो शक्तिशाली अपराधियों को छूट जाने देती है। यह फिल्म दर्शकों को याद दिलाती है कि केवल महान कवियों की रचना गुनगुनाना ही पर्याप्त नहीं है और हम रोज अपने चारों ओर अन्याय और अहिंसा देख आंखें मूंद लेते हैं। फिल्म एहसास कराती है कि हमारी व्यक्तिगत स्वच्छंद जीवन शैली किस पर निर्भर करती है और कौन वास्तव में स्वच्छ भारत का भार वहन करता है। फिल्म दलित नायक निषाद को बेजुबानों की आवाज के रूप में, एक नैतिक व जिम्मेदार आंदोलनकारी के रूप में आगे लाती है। ऐसा करते हुए फिल्म व्यावसायिक मुख्यधारा के बॉलीवुड के शायद पहले दलित नायक को खड़ा करती है। 
 

यह फिल्म मुख्यधारा व्यावसायिक बॉलीवुड के लिए उम्मीद बंधाती है। यह हर्ष की बात है कि अब भी व्यावसायिक बॉलीवुड ऐसी कला पेश करता है, जो अपने समय की सामाजिक असलियत के साथ नत्थी है। यह कला सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन से आगे निकलकर बदल देने की क्षमता को धारदार बनाती है। 

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  • Web Title:hindustan Najariya column July 11